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इतना बड़ा ‘खेल’ हो रहा, और ‘डीएम’ को ‘भनक’ तक नहीं!स्वास्थ्य विभाग के ‘सिंडिकेट’ ने जिला प्रशासन की आंखों में झोंकी धूल; भ्रष्टाचार की मलाई खा रहे जिम्मेदार

बस्ती स्वास्थ्य विभाग में 'दान' के नाम पर 'डाका': 18 लाख की मशीन देकर डकारे करोड़ों रुपये!

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती स्वास्थ्य विभाग में ‘दान’ की आड़ में करोड़ों का रिएजेंट घोटाला; डीएम बेखबर, अफसर मस्त!

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • साहब की नाक के नीचे ‘महा-घोटाला’: बस्ती के स्वास्थ्य अफसरों ने डीएम को बनाया रबर स्टैंप!
  •  सीएमओ और सीएमएस की जुगलबंदी से फल-फूल रहा अवैध कारोबार; क्या ‘कमीशन’ के खेल में अंधे हो गए जिम्मेदार?
  •  सरकारी अस्पताल या निजी तिजोरी? POCL लैब और स्वास्थ्य विभाग के ‘नेक्सस’ ने सरकार को लगाया चूना!
  •  नियम ताक पर, गाइडलाइन की धज्जियां; बिना रेट अप्रूवल के सीटीओ ने कैसे लुटाया सरकारी पैसा?
  •  स्वास्थ्य विभाग का ‘रिएजेंट सिंडिकेट’ बेनकाब, ‘मलाई’ खा रहे अफसर!

बस्ती। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में स्वास्थ्य विभाग के भीतर भ्रष्टाचार का एक ऐसा “कॉरपोरेट मॉडल” फल-फूल रहा है, जिसने सरकारी खजाने को दीमक की तरह चाटना शुरू कर दिया है। ताज्जुब की बात यह है कि जिले के आला अधिकारी और जिलाधिकारी (डीएम), जो हर महीने विकास कार्यों और स्वास्थ्य समितियों की समीक्षा करते हैं, उनकी नाक के नीचे इतना बड़ा खेल हो गया और उन्हें भनक तक नहीं लगी। सवाल यह उठ रहा है कि क्या डीएम को जानबूझकर अंधेरे में रखा जा रहा है या फिर विभाग के ‘सिंडिकेट’ ने प्रशासन की आंखों पर पट्टी बांध दी है?प्रदेश की योगी सरकार भले ही भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा करे, लेकिन बस्ती जिले का स्वास्थ्य विभाग इन दावों को ठेंगा दिखा रहा है। विभाग में इन दिनों ऐसा ‘बड़ा खेल’ चल रहा है, जिसकी भनक तक जिले के मुखिया यानी डीएम को नहीं है। हैरानी की बात यह है कि हर महीने डीएम की अध्यक्षता में जिला स्वास्थ्य समिति की बैठक होती है, लेकिन विभाग के ‘शातिर’ खिलाड़ी अपनी चालाकी से भ्रष्टाचार की फाइलें दबाने में माहिर हो चुके हैं।

‘मुफ्त मशीन’ का असली जाल: समझिए कैसे बुना गया ताना-बाना

अस्पतालों में मशीनों की कमी का फायदा उठाकर पीओसीओएल (POCL) लैब के संचालक शिवम अग्रवाल ने जिला महिला अस्पताल और 100 बेड एमसीएच (हर्रैया) अस्पताल को मशीनें ‘दान’ में दीं। पहली नजर में यह समाजसेवा लगती है, लेकिन इसके पीछे छिपी साजिश बेहद गहरी है।क्या

‘फ्री’ के नाम पर करोड़ों की लूट का नायाब तरीका

एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर पीओसीओएल (POCL) लैब के शिवम अग्रवाल ने जिला महिला अस्पताल और 100 बेड एमसीएच हर्रैया अस्पताल को मशीन ‘दान’ क्यों की?

साजिश का खुलासा: भारत सरकार की गाइडलाइन कहती है कि ‘ओपन मशीन’ खरीदी जाए ताकि किसी भी कंपनी का रिएजेंट (Reagent) इस्तेमाल हो सके। लेकिन, POCL लैब ने जानबूझकर ‘क्लोज मशीन’ दान की।

इस दान के पीछे का असली खेल यह है कि क्लोज मशीन में किसी दूसरी कंपनी का रिएजेंट लग ही नहीं सकता। अब अस्पताल को मजबूरी में उसी कंपनी से महंगा रिएजेंट खरीदना पड़ रहा है। इस ‘अनैतिक’ कारोबार में दोनों अस्पतालों के सीएमएस की भूमिका संदिग्ध है, जो निजी लाभ के लिए सरकार को चूना लगा रहे हैं।

भारत सरकार की स्पष्ट गाइडलाइन है कि सरकारी अस्पतालों के लिए हमेशा ‘ओपन सिस्टम’ वाली मशीनें खरीदी जाएं, ताकि उनमें किसी भी कंपनी का सस्ता और मानक रिएजेंट (Reagent) इस्तेमाल हो सके। लेकिन POCL लैब ने जानबूझकर ‘क्लोज सिस्टम’ वाली मशीनें दान कीं। इन मशीनों की खासियत यह है कि इनमें केवल उसी कंपनी का महंगा रिएजेंट लग सकता है जिसे मशीन निर्माता चाहता है। इस तरह ‘दान’ के नाम पर करोड़ों रुपये के रिएजेंट सप्लाई का एक एकाधिकार (Monopoly) वाला रास्ता खोल लिया गया।

दो साल में डकारे गए करोड़ों रुपये

जांच का विषय यह है कि जब रिएजेंट का रेट आरसी (RC) कॉर्पोरेशन के पोर्टल पर अपलोड ही नहीं है, तो सीटीओ (CTO) साहब किस आधार पर करोड़ों का भुगतान कर रहे हैं? विभागीय सूत्रों और आंकड़ों पर गौर करें तो इस अनैतिक खेल के परिणाम चौंकाने वाले हैं:

  • जिला महिला अस्पताल: पिछले दो वर्षों में इस खेल के जरिए लगभग 2 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया।
  • हर्रैया अस्पताल: यहाँ भी लगभग 80 लाख रुपये का चूना सरकारी बजट को लगाया जा चुका है।

बिना किसी वैध आधार के हो रहे इस भुगतान ने विभाग की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। ऐसा लगता है कि सीएमएस और एसआईसी ने अपना ‘कमीशन’ सेट कर लिया है और व्यापारी को खुली छूट दे दी है कि वह ‘सरकारी मलाई’ काटता रहे। हैरानी की बात यह है कि जब अस्पताल में पहले से ‘पीओ सीटी लैब’ मौजूद थी, तो फिर डीएम की अनुमति के बिना या उन्हें गुमराह करके दूसरी लैब (POCL) का संचालन किसके आदेश पर शुरू हुआ?

पोर्टल पर रेट नहीं, फिर भी सीटीओ (CTO) ने लुटाया पैसा!

भ्रष्टाचार की इस बहती गंगा में सिर्फ अस्पताल प्रशासन ही नहीं, बल्कि भुगतान करने वाले अधिकारी भी हाथ धो रहे हैं। किसी भी सरकारी खरीद के लिए ‘आरसी कॉर्पोरेशन’ के पोर्टल पर रेट अपलोड होना अनिवार्य है। लेकिन चर्चा है कि POCL लैब के रिएजेंट का रेट पोर्टल पर है ही नहीं। इसके बावजूद सीटीओ साहब ने बिना किसी आधार और बिना किसी जांच के करोड़ों के बिल पास कर दिए। आखिर किस आधार पर यह भुगतान हुआ? क्या भुगतान करने के बदले ‘इच्छित कमीशन’ की सेटिंग पहले ही हो चुकी थी?

अफसरों की ‘फाइल बाजी’ के आगे प्रशासन बौना?

बस्ती जिले में चर्चा आम है कि यहाँ के सीएमओ, सीएमएस, एसआईसी और कुछ चुनिंदा एमओआईसी मिलकर एक ऐसा चक्रव्यूह रचते हैं जिसमें डीएम भी उलझ कर रह जाते हैं। जिस फाइल पर डीएम के हस्ताक्षर हो जाते हैं, उसे ये अधिकारी अपनी ढाल बना लेते हैं। जांच का विषय यह है कि क्या डीएम इन फाइलों की बारीकी से जांच करते हैं या फिर अधिकारियों के भरोसे पर ‘आंख मूंदकर’ हस्ताक्षर कर रहे हैं? चर्चा है कि डीएम से ज्यादा योग्य और ‘चतुर’ तो जिले के सीएमओ, सीएमएस और एमओआईसी बन बैठे हैं। ये अधिकारी मिलकर ऐसी बिसात बिछाते हैं कि डीएम को अंधेरे में रखकर अपने मन मुताबिक फाइलों पर हस्ताक्षर करा लेते हैं। विभागीय गलियारों में यह चर्चा आम है कि “डीएम साहब को अधिकारियों ने भ्रमित कर रखा है,” जिसके कारण डीएचएस (DHS) की समीक्षा मात्र एक औपचारिकता बनकर रह गई है। आखिर कौन सा ऐसा ‘जादू’ है कि डीएम साहब इन भ्रष्ट अधिकारियों की बातों में आ जाते हैं?

कड़वा सच: सरकारी डॉक्टर, सरकारी बिल्डिंग, सरकारी बिजली और गरीब मरीज… लेकिन मलाई पूरी तरह से एक ‘निजी व्यापारी’ और भ्रष्ट अधिकारियों की जेब में जा रही है। 17-18 लाख की मशीन दान देकर करोड़ों का मुनाफा कमाने का यह मॉडल आज बस्ती स्वास्थ्य विभाग की पहचान बन चुका है।

अब देखना यह है कि इस रिपोर्ट के बाद शासन और प्रशासन की नींद टूटती है या फिर ‘कमीशन का यह खेल’ इसी तरह बेखौफ जारी रहता है।

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