
जयपुर: राजस्थान हाई कोर्ट की गलियों में जब काला कोट पहनकर एडवोकेट मलखान चतुर्वेदी जी चलते हैं, तो साथ चलती है एक ज़िम्मेदारी – उस आखिरी उम्मीद की, जो एक आम आदमी कोर्ट के दरवाज़े पर लेकर आता है। वकालत उनके लिए सिर्फ तारीखें लेना और बहस करना नहीं है। उनके लिए हर फाइल एक कहानी है। किसी बूढ़ी माँ के बुढ़ापे की लाठी का सवाल, किसी किसान की ज़मीन का हक, किसी बेकसूर की आज़ादी की उम्मीद। और मलखान जी हर कहानी को अपना पहला केस मानकर लड़ते हैं _”कानून की किताबें तो बाजार में मिल जाती हैं, पर इंसाफ का जज़्बा जमीर में पैदा करना पड़ता है। मेरी कलम तब तक नहीं रुकेगी जब तक कमजोर को उसका हक न मिल जाए। क्योंकि अदालत में खड़ा होकर मैं सिर्फ मुवक्किल का केस नहीं, उसके भरोसे की लड़ाई लड़ रहा होता हूँ सुबह से शाम तक हाई कोर्ट की भागदौड़, मोटे-मोटे केस लॉ पढ़ना, और देर रात तक अगले दिन की तैयारी – ये मेहनत इसलिए कि किसी मुवक्किल को ये न कहना पड़े कि ‘वकील साहब ने ध्यान नहीं दिया’तर्क में धार, भाषा में शालीनता और नीयत में ईमानदारी – यही मलखान चतुर्वेदी जी की पहचान है। वो मानते हैं कि बड़ा वकील वो नहीं जिसके पास सबसे ज्यादा केस हों, बड़ा वकील वो है जिसके जाने के बाद मुवक्किल ये कहे कि ‘साहब ने रिश्ता निभाया था’।
राजस्थान हाई कोर्ट में न्याय की इस यात्रा में, एडवोकेट मलखान चतुर्वेदी एक नाम नहीं, एक भरोसा हैं।
*एडवोकेट मलखान चतुर्वेदी*
राजस्थान हाई कोर्ट, जयपुर









