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बस्ती के ‘लालजी’ का बड़ा खेल: DM की रिपोर्ट को दिखाया ठेंगा, ₹8 लाख के घोटालेबाज को दी क्लीन चिट!

रिटायरमेंट से पहले 'ईमान' का सौदा? डीएम की जांच को रद्दी मानकर गबन की आरोपी प्रधान को बचाया। DM से भी बड़े हुए समाज कल्याण अधिकारी! जिस प्रधान की पावर सीज हुई, उसे 'ईमानदार' बताकर किया बहाल।

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती में ‘साहब’ का रिटायरमेंट गिफ्ट: डीएम की रिपोर्ट को कूड़ेदान में डाल प्रधान को थमाई क्लीन चिट!

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश

  • साहब का ‘रिटायरमेंट गिफ्ट’: बैदोलिया के मेड़बन्दी घोटाले की फाइल पर डाला ‘सफेद’ पर्दा।
  • अजब-गजब बस्ती: ऊपर डीएम ने की कार्रवाई, नीचे समाज कल्याण अधिकारी ने धो दिए भ्रष्टाचार के दाग!
  • विदाई से पहले ‘वफादारी’: 8 लाख के गबन में दोषी प्रधान को साहब ने थमाया ‘मुक्ति पत्र’।
  • बस्ती: भ्रष्टाचार पर भारी ‘लालजी’ की कलम, डीएम का आदेश हवा-हवाई!
  • गौर ब्लॉक का महाघोटाला: क्या रिटायरमेंट के करीब बिक गई जांच रिपोर्ट?
  • भ्रष्टाचार को संरक्षण: डीएम की फाइल पलटने वाले अधिकारी पर कब गिरेगी गाज?

बस्ती। भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का दम भरने वाली सरकार के दावों को खुद जिले के जिम्मेदार अधिकारी ही ठेंगा दिखा रहे हैं। ताजा मामला बस्ती जिले के गौर ब्लॉक अंतर्गत बैदोलिया गांव का है, जहाँ जिला समाज कल्याण अधिकारी लालजी ने रिटायरमेंट की दहलीज पर खड़े होकर एक ऐसा ‘खेल’ खेला है, जिसने प्रशासनिक गलियारे में भूचाल ला दिया है।

साहब ने जाते-जाते खुद को जिलाधिकारी (DM) से भी ऊपर साबित करने की हिमाकत की है। जिस घोटाले में खुद डीएम की कमेटी ने मुहर लगाई थी, उसे समाज कल्याण अधिकारी ने अपनी ‘कलम के जादू’ से पल भर में रफा-दफा कर दिया।

क्या है ₹8 लाख का मेड़बन्दी कांड?

बैदोलिया गांव में मेड़बन्दी के नाम पर बिना एक पत्थर हिलाए ₹8 लाख का सरकारी धन डकार लिया गया। जब मामले की शिकायत हुई, तो डीएम ने उच्चस्तरीय कमेटी गठित की। जांच में भ्रष्टाचार की परतें खुलीं और ग्राम प्रधान ममता को दोषी पाया गया। इसके आधार पर करीब 6 महीने पहले डीएम ने कड़ा रुख अपनाते हुए प्रधान की वित्तीय शक्तियां (Financial Power) सीज कर दी थीं।

रिटायरमेंट से पहले ‘लालच’ या ‘दबाव’?

अब चर्चा आम है कि रिटायर होने जा रहे जिला समाज कल्याण अधिकारी लालजी ने आखिर किसके इशारे पर डीएम की कमेटी की रिपोर्ट को रद्दी का टुकड़ा बना दिया?

  • नियमों की धज्जियां: जब एक बार जिलाधिकारी की जांच में गबन की पुष्टि हो गई, तो समाज कल्याण अधिकारी ने दोबारा जांच कर क्लीन चिट देने का साहस कैसे किया?
  • डीएम से बड़े ‘साहब’: जिले में चर्चा है कि क्या अब समाज कल्याण अधिकारी के पास डीएम के आदेशों को पलटने का विशेष अधिकार आ गया है?

“क्या यह क्लीन चिट मुफ्त में मिली है या रिटायरमेंट के बाद के सुनहरे भविष्य का ‘प्रबंध’ किया गया है? बिना कार्य कराए सरकारी खजाने में सेंध लगाने वाली प्रधान को बचाकर अधिकारी ने सीधे तौर पर शासन की भ्रष्टाचार विरोधी नीति को चुनौती दी है।”

उच्चस्तरीय जांच की दरकार

यह केवल ₹8 लाख के गबन का मामला नहीं है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के इकबाल का सवाल है। अगर हर छोटा अधिकारी अपने से बड़े अधिकारी की जांच को अपनी सुविधा अनुसार खारिज करने लगा, तो जिले में ‘जंगलराज’ पनपने में देर नहीं लगेगी।

जनता पूछ रही है:

  • क्या इस पूरे प्रकरण में कोई बड़ा ‘लेन-देन’ हुआ है?
  • क्या शासन ऐसे अधिकारियों पर रिटायरमेंट के बाद भी शिकंजा कसेगा?
  • क्या बैदोलिया की जनता के हक का पैसा इसी तरह रसूखदारों की जेबों में जाता रहेगा?

अब देखना यह है कि बस्ती डीएम अपनी नाक के नीचे हुए इस ‘प्रशासनिक विद्रोह’ और भ्रष्टाचार पर क्या एक्शन लेते हैं। इस मामले की रिकवरी और अधिकारी की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच ही सरकार की साख बचा सकती है।

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