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लोकतंत्र के ‘चौथे स्तंभ’ पर प्रहार: आखिर कब तक ‘गाली’ और ‘गोली’ के साये में जियेगा पत्रकार?

अजीत मिश्रा (खोजी)

साख पर संकट—जब ‘नेताओं’ से ज्यादा ‘पत्रकार’ होने लगे अपमानित!

विशेष ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • नेताओं की राजनीति की सीढ़ी बनने वाले पत्रकार आज उन्हीं की नजरों में ‘दलाल’ क्यों?
  •  जब रक्षक ही भक्षक बन जाएँ—नेताओं की बदजुबानी और पत्रकारों की बेबसी।
  • सम्मान से ‘सलाम’ तक का सफर: अधिकारियों की चौखट पर दम तोड़ती पत्रकारिता।
  • पत्रकारिता का काला अध्याय: जातिवाद और गुटबाजी में उलझा ‘चौथा स्तंभ’।
  • सावधान! अगर आज एकजुट नहीं हुए पत्रकार, तो कल पानी पूछने वाला भी कोई नहीं होगा।
  • सोशल मीडिया का ‘ट्रोल तंत्र’ और पत्रकारों का गिरता आत्मसम्मान—एक कड़वा विश्लेषण।
  • नेताओं की ‘चमचागिरी’ या जनता की ‘आवाज’? तय करें अपनी पहचान!

बस्ती। उत्तर प्रदेश के बस्ती मंडल सहित पूरे राज्य में पत्रकारिता का गिरता ग्राफ और पत्रकारों के प्रति समाज व सत्ता का बदलता नजरिया एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। कभी ‘लोकतंत्र का चौथा स्तंभ’ कहे जाने वाले इस पेशे पर आज ‘दलाली’ और ‘चाटुकारिता’ जैसे कलंक मढ़े जा रहे हैं। आखिर क्या वजह है कि आज के दौर में नेताओं से ज्यादा पत्रकारों को ‘गाली’ खानी पड़ रही है?आज के दौर में पत्रकारिता का पेशा केवल सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि कांटों की सेज बन चुका है। बस्ती मंडल सहित पूरे उत्तर प्रदेश में पत्रकारों की स्थिति दयनीय होती जा रही है। ताज़ा हालातों ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जिस कलम को समाज का दर्पण कहा जाता था, आज उसे ‘गाली’ और ‘अपमान’ के दलदल में क्यों धकेला जा रहा है?

नेताओं की दोहरी चाल और पत्रकारिता की लाचारी

रिपोर्ट के मुताबिक, बस्ती जिले और आसपास के क्षेत्रों में राजनीति का स्तर इतना गिर चुका है कि नेता अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए पत्रकारों को निशाना बना रहे हैं। जिन नेताओं की पूरी राजनीति पत्रकारों की लिखी खबरों पर टिकी होती है, वही मौका मिलने पर पत्रकारों को ‘चोर’ और ‘दलाल’ कहने से नहीं चूकते।हैरानी की बात यह है कि जिन नेताओं की राजनीति और साख पत्रकारों की कलम के दम पर चमकती है, वही नेता आज सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर पत्रकारों के लिए ‘दलाल’ और ‘चोर’ जैसे प्रतिबंधित शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता अब केवल नेताओं की जी-हुज़ूरी का नाम रह गया है? यदि कोई पत्रकार सच दिखाने की हिम्मत करता है, तो उसे ‘पेड न्यूज़’ का ठप्पा लगाकर या अभद्र व्यवहार के जरिए दबाने की कोशिश की जाती है।

“जब एक पत्रकार से पूछा गया कि लोग सोशल मीडिया पर इतनी अभद्र भाषा का प्रयोग क्यों करते हैं, तो उसका जवाब डराने वाला था—कि जब तक गाली नहीं मिलती, तब तक लगता ही नहीं कि कोई खबर लिखी गई है।”

यह स्थिति दर्शाती है कि समाज में पत्रकारों के प्रति सम्मान और भय, दोनों ही समाप्त हो चुके हैं।

एकता का अभाव: अपनी ही बिरादरी में बिखराव

हाल ही में बस्ती के नगर थाना क्षेत्र स्थित दुबखरा पेट्रोल पंप जैसी घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों के साथ बदसुलूकी और उनके उपकरण छीनने की कोशिशें आम हो गई हैं। दबंगों में कानून का खौफ खत्म हो चुका है और पुलिस प्रशासन अक्सर मूकदर्शक बना रहता है। बस्ती मंडल की इस रिपोर्ट में एक कड़वे सच को भी कुरेदा गया है—पत्रकारों के बीच खत्म होती एकजुटता। * बंटवारा: आज प्रिंट और डिजिटल मीडिया के बीच एक ऐसी खाई खिंच गई है जिसने पत्रकारों को कमजोर कर दिया है।

  • संगठनों की राजनीति: पहले किसी एक पत्रकार के साथ अभद्र व्यवहार होने पर पूरी बिरादरी सड़कों पर उतर आती थी और कार्रवाई होने तक धरना देती थी। लेकिन आज, हर पत्रकार अपनी ‘ढपली और अपना राग’ अलाप रहा है।
  • अधिकारियों के आगे नतमस्तक: जो पत्रकार कभी अधिकारियों की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछते थे, आज वे ही ‘चीफ साहब’ और ‘रिपोर्टर’ छोटे-छोटे कामों के लिए अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काटते और ‘सलाम’ बजाते दिखते हैं।

अंदरूनी फूट और गिरता सम्मान

रिपोर्ट में इस कड़वे सच को भी उजागर किया गया है कि पत्रकारों की इस दुर्दशा के पीछे कहीं न कहीं ‘संगठन और एकता का अभाव’ भी है।

  • बिखराव: आज पत्रकार संगठनों में वह एकजुटता नहीं रही जो पहले हुआ करती थी। एक पत्रकार पर हमला होने पर दूसरा साथी साथ खड़े होने के बजाय दूरी बना लेता है।
  • अधिकारियों की बेरुखी: कभी दौर था जब आला अधिकारी पत्रकारों का सम्मान करते थे, लेकिन आज पत्रकारों को एक छोटी सी सूचना के लिए भी अधिकारियों की चौखट पर ‘सलाम बजाने’ को मजबूर होना पड़ता है।
  • सोशल मीडिया की गंदगी: पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए सोशल मीडिया पर होने वाली टिप्पणियां भी ज़िम्मेदार हैं। बिना तथ्य जाने पत्रकारों को ट्रोल करना एक नया ‘शौक’ बन गया है।

जातिवाद और व्यक्तिगत स्वार्थ की भेंट चढ़ती कलम

खबर में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि बस्ती जैसे क्षेत्रों में पत्रकार अक्सर ‘जातिवाद’ के जाल में फंस जाते हैं। टैलेंट होने के बावजूद, पत्रकार सही समय पर सही स्टैंड नहीं ले पाते, जिससे जनता का उन पर से भरोसा कम हो रहा है। सोशल मीडिया पर मिलने वाली गालियां इसी अविश्वास का परिणाम हैं।

बड़े अखबारों की गिरती साख

हैरानी की बात यह है कि बड़े संस्थानों के नामचीन पत्रकार भी आज खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, हालत यह है कि बड़े अखबारों के रिपोर्टर अपनी इज्जत बचाने के लिए दूसरे अखबारों के लोगों से सिफारिशें करवा रहे हैं।

निष्कर्ष और कड़ा संदेश

बस्ती मंडल के पत्रकारों को अब यह सोचना होगा कि यदि उन्हें अपना पुराना गौरव वापस पाना है, तो उन्हें ‘अपनों का साथ’ देना सीखना होगा।

  • एकजुटता: गुटबाजी और जातिवाद को छोड़कर एक मंच पर आना होगा।
  • सत्यनिष्ठा: नेताओं की ‘चमचागिरी’ छोड़कर जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता देनी होगी।
  • आत्मचिंतन: पत्रकारों को यह समझना होगा कि यदि आज उन्होंने अपनी गलतियां नहीं सुधारीं, तो भविष्य में कोई उन्हें पानी पूछने वाला भी नहीं मिलेगा।
  • प्रशासन को चेतावनी: यदि पत्रकारों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार और उन्हें दी जा रही धमकियों पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की ‘हत्या’ के समान होगा।

निष्कर्ष: समय आ गया है ‘एकजुट’ होने का

अगर समय रहते पत्रकार बिरादरी ने अपनी आपसी कलह को छोड़कर एकजुटता नहीं दिखाई, तो वह दिन दूर नहीं जब ‘चौथे स्तंभ’ को सम्मान की एक प्याली चाय भी नसीब नहीं होगी। नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता सब देख रही है। पत्रकारों को भी जातिवाद और निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर अपनी लेखनी की मर्यादा को बचाना होगा।

वक्त आ गया है कि कलम की ताकत का अहसास उन लोगों को कराया जाए जो पत्रकारिता को अपनी जागीर समझते हैं।

रिपोर्ट: ब्यूरो चीफ, बस्ती मंडल , उत्तर प्रदेश

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