इतवाउत्तर प्रदेशकुशीनगर

सिद्धार्थनगर CMO कार्यालय में ‘बाबू’ का राज: नियमों की चिता पर बैठा भ्रष्ट तंत्र!

सरकारी आदेश रद्दी के टोकरे में, विवेक तिवारी के पास ही क्यों है 'तिजोरी' की चाबी?

अजीत मिश्रा (खोजी)

भ्रष्टाचार की जड़ें या प्रशासनिक लाचारी? सिद्धार्थनगर CMO कार्यालय में ‘खास’ बाबू का एकछत्र राज!

  • बजट से भुगतान तक एक ही हाथ: क्या CMO कार्यालय में ‘जीरो टॉलरेंस’ का जनाजा निकल चुका है?
  • कुर्सी से ऐसा क्या मोह? तीन साल का नियम हवा, ‘खास’ बाबू सालों से जमा!
  • करोड़ों का बजट और एक ही ‘जादूगर’: सिद्धार्थनगर स्वास्थ्य विभाग की पारदर्शी लूट?
  • साहब मेहरबान तो बाबू पहलवान: आखिर विवेक तिवारी पर इतनी इनायत क्यों?

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश

दिनांक: 10 अप्रैल 2026

सिद्धार्थनगर। कहते हैं कि सत्ता जब एक हाथ में सिमटती है, तो भ्रष्टाचार की दुर्गंध लाजिमी है। सिद्धार्थनगर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय में इन दिनों कुछ ऐसा ही आलम है। यहाँ नियम-कायदों को ताक पर रखकर एक ही ‘खास’ बाबू को मलाईदार पटलों की कमान सौंप दी गई है। बजट से लेकर चिकित्सा प्रतिपूर्ति तक, सब कुछ एक ही व्यक्ति के इशारे पर नाच रहा है। क्या यह प्रशासनिक कुशलता है या फिर ‘ऊपर’ तक पहुंच का नतीजा?

नियमों की धज्जियां, ‘खास’ पर मेहरबानी

​सरकारी शासनादेश स्पष्ट कहता है कि किसी भी कर्मचारी की एक पटल (Seat) पर अधिकतम तैनाती तीन वर्ष की होगी। लेकिन सिद्धार्थनगर CMO कार्यालय में नियम शायद रद्दी के टोकरे में पड़े हैं। वरिष्ठ सहायक विवेक तिवारी वर्षों से एक ही जगह जमे हुए हैं। आखिर क्या वजह है कि पूरे जिले में विभाग को कोई दूसरा काबिल कर्मचारी नहीं मिला? या फिर विवेक तिवारी की ‘काबिलियत’ का पैमाना कुछ और ही है?

करोड़ों का खेल और ‘एक हाथ’ का नियंत्रण

​शिकायतकर्ता रोहित त्रिपाठी द्वारा जिलाधिकारी को सौंपी गई रिपोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को नंगा कर दिया है। विवेक तिवारी के पास एक साथ निम्नलिखित महत्वपूर्ण प्रभार हैं:

    • राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM)
    • स्टेट बजट और चिकित्सा प्रतिपूर्ति
    • अंधता निवारण कार्यक्रम
    • कंटीजेंसी एवं छपाई/लेखन सामग्री

कड़वा सवाल: जब करोड़ों रुपये के बजट और भुगतान की चाबी एक ही जेब में होगी, तो पारदर्शिता की उम्मीद करना क्या बेईमानी नहीं है? यह केंद्रीकरण सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितताओं और बंदरबांट की आशंका को जन्म देता है।

 

DM की जांच: महज रस्म अदायगी या होगा ऐक्शन?

​जिलाधिकारी शिवशरणप्पा जी.एन. ने जांच के संकेत तो दिए हैं, लेकिन जनता पूछ रही है कि क्या यह जांच केवल कागजों तक सीमित रहेगी? स्वास्थ्य विभाग में वर्षों से कुंडली मारकर बैठे ऐसे ‘बाबू’ प्रशासन के इकबाल को चुनौती दे रहे हैं।

विरोध का स्वर: यह केवल एक कर्मचारी का मामला नहीं है, बल्कि उस भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा है जो योग्य और ईमानदार कर्मचारियों का हक मारता है। एक तरफ सरकार जीरो टॉलरेंस की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ CMO कार्यालय में शासनादेशों का मखौल उड़ाया जा रहा है।

निष्कर्ष: कब टूटेगा यह तिलस्म?

​सिद्धार्थनगर की जनता और जागरूक समाज यह मांग करता है कि तत्काल प्रभाव से इन ‘खास’ बाबू के विभागों का बंटवारा हो और पिछले वर्षों के वित्तीय लेनदेन की निष्पक्ष जांच की जाए। अगर प्रशासन अब भी मौन रहता है, तो यह मान लिया जाएगा कि इस ‘मलाई’ में हिस्सेदारी सिर्फ बाबू की ही नहीं, बल्कि संरक्षण देने वाले आकाओं की भी है।

अब देखना यह है कि डीएम साहब की कलम चलती है या सिस्टम की यह सड़ांध यूँ ही बनी रहती है!

  • DM की जांच या महज रस्म अदायगी? CMO कार्यालय के ‘पटल सिंडिकेट’ पर कब चलेगा हंटर?
  • प्रशासनिक लकवा: क्या एक बाबू के आगे बेबस है सिद्धार्थनगर का स्वास्थ्य महकमा?
  • सिस्टम में सड़ांध: बजट से प्रतिपूर्ति तक ‘एकछत्र राज’, जवाबदेही से क्यों भाग रहे अधिकारी?

संपादकीय टिप्पणी: प्रशासन को यह समझना होगा कि पारदर्शिता केवल भाषणों में नहीं, बल्कि फाइलों के स्थानांतरण और जिम्मेदारियों के निष्पक्ष बंटवारे में दिखनी चाहिए।

Back to top button
error: Content is protected !!