
अजीत मिश्रा (खोजी)
विशेष रिपोर्ट: हर्रैया एमसीएच अस्पताल में मानवता शर्मसार, ‘कमीशन’ के खेल में फंसा गरीबों का इलाज
बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश) | ब्यूरो रिपोर्ट
- गरीबों का खून चूस रहा हर्रैया अस्पताल: ₹300 के कमीशन के लिए डॉक्टर रद्दी में फेंक देते हैं बाहर की रिपोर्ट!
- सफेदपोशों की काली करतूत: हिंद डायग्नास्टिक सेंटर से 50% की हिस्सेदारी, तब जाकर शुरू होता है गर्भवती महिलाओं का इलाज।
- अंधेर नगरी, चौपट राजा: डॉक्टर नहीं, ‘हिंद सेंटर’ के एजेंट चला रहे हैं हर्रैया का 100 बेड अस्पताल!
- इलाज चाहिए या कमीशन? हर्रैया एमसीएच अस्पताल में मानवता शर्मसार, दलालों का लगा जमावड़ा।
- CMS की नाक के नीचे चल रहा अवैध वसूली का खेल, क्या बस्ती के CMO भी बंद किए हैं अपनी आँखें?
- हिंद सेंटर से ‘अल्ट्रासाउंड’ नहीं तो ‘इलाज’ नहीं! हर्रैया अस्पताल में गरीबों के हक पर डॉक्टरों का डाका।
बस्ती। जनपद के हर्रैया स्थित 100 बेड वाले ‘मातृ एवं शिशु अस्पताल’ (MCH) की स्थापना इस उद्देश्य से की गई थी कि क्षेत्र की गरीब महिलाओं और शिशुओं को बेहतर चिकित्सा मिल सके। लेकिन वर्तमान में यह अस्पताल गरीबों के लिए ‘उम्मीद की किरण’ नहीं, बल्कि ‘शोषण का केंद्र’ बन चुका है। यहाँ तैनात सफेदपोश जिम्मेदार अस्पताल को अपनी निजी संपत्ति मानकर मनमानी पर उतारू हैं।
हिंद डायग्नास्टिक सेंटर: अस्पताल का ‘अघोषित’ अंग?
अस्पताल परिसर और गलियारों में आजकल एक ही चर्चा आम है— “अगर इलाज चाहिए, तो हिंद डायग्नास्टिक सेंटर जाओ।” आरोप है कि अस्पताल के CMS (मुख्य चिकित्सा अधीक्षक) और डॉक्टरों ने मिलकर एक ऐसा सिंडिकेट बना लिया है, जिसके तहत मरीजों को जबरन ‘हिंद डायग्नास्टिक सेंटर’ पर अल्ट्रासाउंड कराने के लिए मजबूर किया जाता है।
अस्पताल के भीतर इस प्राइवेट सेंटर के लड़के बेखौफ घूमते रहते हैं। बताया जा रहा है कि डॉ. शीबा खान और डॉ. मनोज चौधरी जैसे डॉक्टरों के पास इन दलालों का सीधा दखल है। सूत्र बताते हैं कि हिंद सेंटर एक अल्ट्रासाउंड के लिए ₹600 वसूलता है, जिसमें से ₹300 (50 प्रतिशत) सीधे तौर पर कमीशन के रूप में इन डॉक्टरों की जेब में जाता है। इस तरह रोजाना हजारों रुपये की काली कमाई गरीबों की जेब काटकर की जा रही है।हैरानी की बात तो यह है कि यदि कोई गरीब मरीज अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देकर किसी दूसरे सेंटर (जैसे नेशनल या सौरवी सेंटर) से सस्ते में (लगभग 300 रुपये में) अल्ट्रासाउंड करा लाता है, तो अस्पताल के डॉक्टर उस रिपोर्ट को यह कहकर कूड़े के भाव फेंक देते हैं कि “यह रिपोर्ट गलत है।” मरीजों को डराया-धमकाया जाता है और साफ लफ्जों में कह दिया जाता है कि— “इलाज कराना है तो हिंद सेंटर से ही रिपोर्ट लानी होगी।” क्या नेशनल या अन्य मान्यता प्राप्त सेंटरों की मशीनें अलग हैं? या फिर वहां से ‘कमीशन’ नहीं आता, इसलिए उनकी रिपोर्ट रद्दी मान ली जाती है?
कमीशन का खेल: 50% की सीधी हिस्सेदारी!
सूत्रों और स्थानीय मरीजों के अनुसार, इस पूरे खेल के पीछे अस्पताल के CMS, डॉ. शीबा खान और डॉ. मनोज चौधरी जैसे नाम सामने आ रहे हैं। आरोप है कि हिंद डायग्नास्टिक सेंटर एक अल्ट्रासाउंड के 600 रुपये वसूलता है, जिसमें से 300 रुपये (50 फीसदी) सीधे तौर पर संबंधित डॉक्टरों और अधिकारियों की जेब में कमीशन के रूप में जाते हैं। इसी लालच के चलते अस्पताल में आने वाले हर गरीब मरीज को जबरन इसी सेंटर पर भेजा जाता है।
प्रधानमंत्री की मुफ्त जांच योजना को भी लगा रहे पलीता
नियमों के मुताबिक, हर महीने की 1, 9, 16 और 24 तारीख को गर्भवती महिलाओं का अल्ट्रासाउंड सरकारी तौर पर मुफ्त होना चाहिए। लेकिन यहाँ भी भ्रष्टाचार के हाथ लंबे हैं। CMS ने कथित तौर पर हिंद डायग्नास्टिक सेंटर को ही इसके लिए ‘नामित’ कर रखा है ताकि बाकी दिनों में होने वाली अवैध कमाई का रास्ता खुला रहे।
अंधेर नगरी, चौपट राजा: मौन क्यों है प्रशासन?
सबसे बड़ा सवाल बस्ती के CMO और जिला प्रशासन पर उठता है।
- क्या उन्हें अस्पताल परिसर में टहलते हुए हिंद डायग्नास्टिक सेंटर के ‘दलालों’ की फौज दिखाई नहीं देती?
- क्यों डॉ. शीबा और डॉ. मनोज के केबिनों में इन प्राइवेट सेंटरों के कर्मचारी जमे रहते हैं?
- क्या सरकारी तंत्र इतना पंगु हो गया है कि वह डॉक्टरों की इस सरेआम गुंडागर्दी पर लगाम नहीं लगा पा रहा?
सस्ती और सही रिपोर्ट को ‘रद्दी’ बताते हैं डॉक्टर
हैरानी की बात यह है कि यदि कोई बेहद गरीब मरीज अपनी लाचारी का हवाला देकर नेशनल सेंटर, सौरवी सेंटर या हर्रैया डायग्नास्टिक सेंटर जैसे अन्य संस्थानों से ₹300 में अल्ट्रासाउंड करा लाता है, तो अस्पताल के डॉक्टर उसे स्वीकार करने से साफ मना कर देते हैं। मरीज को झिड़कते हुए कहा जाता है कि— “यह रिपोर्ट गलत है, हम इसे नहीं मानेंगे। जाओ, हिंद सेंटर से ही रिपोर्ट कराकर लाओ, तभी इलाज शुरू होगा।” क्या विज्ञान और चिकित्सा के मापदंड केवल एक ही प्राइवेट सेंटर के लिए सही हैं? या फिर असल समस्या रिपोर्ट की नहीं, बल्कि उस ‘कमीशन’ की है जो दूसरे सेंटरों से डॉक्टरों तक नहीं पहुँचता?
सरकारी योजनाओं का गला घोंटते जिम्मेदार
प्रधानमंत्री की महत्वपूर्ण योजना के तहत हर महीने की 1, 9, 16 और 24 तारीख को गर्भवती महिलाओं के लिए मुफ्त अल्ट्रासाउंड की सुविधा दी जाती है। लेकिन यहाँ भी भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं। CMS ने कथित तौर पर इस काम के लिए भी ‘हिंद सेंटर’ को ही नामित कर रखा है। बाकी दिनों में तो लूट मची ही है, लेकिन इन निर्धारित तारीखों को छोड़कर यदि कोई मरीज आए, तो उसे सीधे लूट के उस चंगुल में धकेल दिया जाता है जहाँ रिपोर्ट के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती है।
प्रशासन और पत्रकारों की चुप्पी पर सवाल
अस्पताल की संवेदनशीलता मर चुकी है और आत्मा मर चुकी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि:
- CMS को अस्पताल के भीतर प्राइवेट सेंटरों के लड़कों का जमावड़ा क्यों नहीं दिखता?
- क्या जिले के उच्चाधिकारियों (CMO) को इस संगठित लूट की जानकारी नहीं है?
- स्थानीय पत्रकार इस गंभीर मुद्दे पर मौन क्यों हैं? क्या उनकी चुप्पी का भी कोई ‘हिस्सा’ तय है?
गरीब की आह और व्यवस्था का बहरापन
एक गरीब मरीज, जो बड़ी मुश्किल से ₹300 जुटा पाता है, उसे डॉक्टर की जिद के कारण ₹900 (पुराना ₹300 बेकार होने और नया ₹600 देने) तक गंवाने पड़ते हैं। यह सिर्फ आर्थिक लूट नहीं, बल्कि उन गरीबों के जीवन के साथ खिलवाड़ है जिनके पास इलाज के लिए भी पैसे नहीं होते।
निष्कर्ष: हर्रैया का यह अस्पताल अब ‘जीवन रक्षक’ कम और ‘जेब कतरने वाला केंद्र’ ज्यादा लगने लगा है। स्थानीय पत्रकारों और जनता के बीच यह सवाल गूंज रहा है कि आखिर कब तक गरीब मरीजों का खून चूसकर ये सफेदपोश डॉक्टर अपनी तिजोरियां भरेंगे? क्या शासन इन भ्रष्ट अधिकारियों का अनुबंध निरस्त करेगा या फिर यह लूट तंत्र ऐसे ही चलता रहेगा?
अब देखना यह है कि बस्ती मंडल का प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इन ‘कमीशनबाज’ डॉक्टरों पर क्या कार्रवाई करता है या फिर गरीब मरीज इसी तरह इस सिस्टम की भेंट चढ़ते रहेंगे।
















