‘कमीशन’ के भूखे अधिकारी: सरकारी फाइलों के पीछे छिपी एक और ‘घिनौनी’ साजिश!

अजीत मिश्रा (खोजी)
विकास की आड़ में भ्रष्टाचार का ‘नया मायाजाल’: ‘कमीशन’ बचाने के लिए नियम बदलने वाले अधिकारियों पर कब गिरेगी गाज?
- क्या अधिकारियों की ‘कमाई’ पर आ गया संकट? नियम बदलकर किया गया खेल!
- ‘कमीशन’ के लिए बदले नियम: एक तीर से तीन शिकार, क्या यही है सरकारी तंत्र का सच?
- अधिकारियों का ‘नया पैंतरा’: ठेकेदारों की मजबूरी का फायदा उठा भर रहे हैं अपनी जेबें!
बस्ती: सरकारी दफ्तरों में ‘फाइलें’ जब चलती हैं, तो उनके पीछे कई कहानियाँ दफन होती हैं। लेकिन कभी-कभी ऐसी फाइलें सामने आती हैं जो तंत्र की सड़ी-गली मानसिकता को पूरी तरह नंगा कर देती हैं। बस्ती जिले से एक ऐसी ही प्रशासनिक करतूत सामने आई है, जिसने यह साबित कर दिया है कि यहाँ सरकारी ‘नियम’ विकास के लिए नहीं, बल्कि भ्रष्ट अधिकारियों की ‘कमीशन’ सुनिश्चित करने के लिए बनाए जाते हैं।कहा जाता है कि अधिकारी अपनी पुरानी दोस्ती, रिश्ते-नाते और यहाँ तक कि परिवार तक से दूरी बना सकते हैं, लेकिन ‘कमीशन’ का मोह छोड़ना उनके लिए नामुमकिन है। बस्ती में विभागों के भ्रष्टाचार का एक ऐसा चेहरा सामने आया है जिसने यह साबित कर दिया है कि जब कमीशन पर ‘संकट’ आता है, तो अधिकारी अपने फायदे के लिए नियम बदलने में भी देर नहीं करते।
कमीशन पर संकट, तो बदल दिया ‘सिस्टम’
प्रशासनिक जगत में एक चर्चित जुमला है—अधिकारी अपनी पुरानी दोस्ती छोड़ सकते हैं, यहाँ तक कि निजी रिश्तों से किनारा कर सकते हैं, लेकिन ‘कमीशन’ का मोह नहीं छोड़ सकते। जब जिले के विभिन्न विभागों, विशेषकर पीडब्लूडी (PWD) में ठेकेदारों ने 35 से 40 प्रतिशत ‘बिलो रेट’ (बाजार भाव से काफी कम दर) पर टेंडर भरने की बात कही, तो अधिकारियों के होश उड़ गए। ठेकेदारों का सीधा तर्क था—साहब, जब हम इतने कम रेट पर काम लेंगे, तो आपको कमीशन कहाँ से देंगे?जब ठेकेदारों ने 35-40 प्रतिशत ‘बिलो रेट’ (बाजार मूल्य से कम दाम) पर काम करने की बात कहकर कमीशन देने से हाथ खड़े कर दिए, तो अधिकारियों की रातों की नींद उड़ गई। उनकी चिंता यह नहीं थी कि काम की गुणवत्ता कैसे सुधरेगी, बल्कि उनकी असली चिंता ‘कमीशन’ का गणित बिगड़ने की थी। इसी को दुरुस्त करने के लिए, उन्होंने ठेका प्रक्रिया में ऐसा ‘फिल्टर’ लगा दिया, जिससे आम ठेकेदार बाहर हो जाए और केवल वही बचे जो उनकी शर्तों के आगे नतमस्तक हो।
अधिकारियों के लिए यह ‘विकास’ पर संकट नहीं, बल्कि उनकी ‘कमाई’ पर बड़ा संकट था। बस फिर क्या था, रातों-रात टेंडर की प्रक्रिया बदल दी गई। सरकार की मंशा भले ही बिलो रेट कम करने की रही हो, लेकिन अधिकारियों की मंशा अपने कमीशन को सुरक्षित रखना थी।
‘परफॉरमेंस सिक्योरिटी’ का जाल: क्या केवल अमीर ठेकेदार ही काम करेंगे?
अधिकारियों ने अब ‘अतिरिक्त परफॉरमेंस सिक्योरिटी’ का जाल बुना है। नियम को इतना जटिल बना दिया गया है कि अब ठेकेदार को टेंडर लेने से पहले ही भारी भरकम राशि विभाग के पास जमा करनी होगी। एक उदाहरण से समझिए: यदि 20 लाख का कोई काम है, तो ठेकेदार को अब पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा मोटी रकम बतौर सुरक्षा निधि जमा करनी पड़ रही है। यह सीधा संदेश है—अगर कमीशन देना है, तो बड़ी पूंजी लगाओ। नई व्यवस्था के तहत, अधिकारियों ने ‘अतिरिक्त परफॉरमेंस सिक्योरिटी’ का ऐसा चक्रव्यूह तैयार किया है जिसे तोड़ना हर ठेकेदार के बस की बात नहीं है।
- जटिल गणित: यदि कोई ठेकेदार 20 लाख का काम लेता है और उसे 23 प्रतिशत बिलो रेट पर फाइनल करता है, तो उसे भारी भरकम अतिरिक्त सिक्योरिटी और जमानत राशि पहले ही जमा करनी होगी। उदाहरण के तौर पर, एक मामले में ठेकेदार को कुल 8.93 लाख रुपये पहले जमा करने पड़े, तब जाकर अनुबंध गठित हुआ।
- गरीब ठेकेदार बाहर: इस नई व्यवस्था ने छोटे और मध्यम वर्गीय ठेकेदारों की कमर तोड़ दी है। अब केवल वही ठेकेदार टेंडर डालने की हिम्मत कर पाएगा जिसके पास अतिरिक्त सिक्योरिटी और भारी जमानत राशि जमा करने के लिए मोटी पूंजी हो।
एक तीर से तीन शिकार
अधिकारियों ने नियम बदलकर अपनी चतुराई का ऐसा प्रदर्शन किया है, जिसे समझने की जरूरत है:
- कमीशन का मार्ग प्रशस्त: जटिल शर्तों के कारण, अब टेंडर प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा कम हो गई है। ऐसे में अधिकारी आराम से अपना फिक्स्ड कमीशन वसूल सकते हैं।
- गुणवत्ता का ढोंग: अधिकारियों ने तर्क दिया कि इससे कार्यों की गुणवत्ता खराब नहीं होगी, जबकि हकीकत यह है कि यह पूरा ड्रामा केवल कमीशन को व्यवस्थित करने के लिए रचा गया है।
- मांग का दुरुपयोग: ठेकेदार संघ की मांगों को ढाल बनाकर, अधिकारियों ने अपनी सुविधा का कानून लागू कर दिया है।
जनता से सवाल
आज बस्ती का हर जागरूक नागरिक यह पूछने पर मजबूर है कि क्या सरकारी तंत्र का एकमात्र उद्देश्य अधिकारियों की जेब भरना रह गया है? जब 10 प्रतिशत से कम बिलो रेट पर कोई अतिरिक्त सिक्योरिटी नहीं मांगी जा रही, तो 10 प्रतिशत से अधिक पर यह ‘सजा’ क्यों?क्या सरकार की मंशा वास्तव में काम को सस्ता और गुणवत्तापूर्ण बनाना था, या यह सब केवल इसलिए किया गया ताकि अधिकारियों का ‘कमीशन’ सुरक्षित रहे? बस्ती के आम जनता और ईमानदार ठेकेदारों को यह समझना होगा कि फाइलों में दर्ज ये नियम, असल में आम आदमी के हक के पैसे को लूटने की एक सोची-समझी साजिश है।
जब अधिकारी ही नियम रक्षक से नियम भक्षक बन जाएं, तो विकास की उम्मीद किससे की जाए? यह केवल एक नियम में बदलाव नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर पनप रहे उस कैंसर का लक्षण है जो सरकारी कामकाज को अंदर से खोखला कर रहा है।
यह सिर्फ ‘नियमों में बदलाव’ नहीं है, बल्कि यह एक संगठित भ्रष्टाचार है जो सरकारी खजाने को लूटने और विकास कार्यों को अपनी जागीर समझने वालों की हठधर्मिता को दर्शाता है। क्या शासन-प्रशासन के उच्च अधिकारी इस ‘कमीशन तंत्र’ की जांच करेंगे, या फिर यह ‘नया नियम’ भ्रष्टाचार का नया ‘मॉडल’ बनकर चलता रहेगा?
वक्त आ गया है कि इन ‘कमीशनखोरों’ की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार हो, ताकि विकास कार्यों में पारदर्शिता और ईमानदारी वापस लौट सके।
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