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बस्ती में नशे का ‘रूट मैप’: आखिर कहाँ से आ रहा है मौत का सामान?

14 Jun 2026, 03:02 PM • Vande Bharat Live TV News
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अजीत मिश्रा (खोजी)

नशाखोरी की गिरफ्त में बस्ती: प्रशासन की ‘छोटी मछलियों’ पर कार्रवाई, ‘मगरमच्छ’ आजाद क्यों?

  • बस्ती की सड़कों पर मौत का सामान, प्रशासन की कार्रवाई सिर्फ ‘दिखावा’ या ‘सेटिंग’?
  • नशा तस्करी का ‘डिलीवरी मॉडल’: बस्ती को ‘उड़ता पंजाब’ बनने से कौन रोक रहा है?
  • क्या बस्ती प्रशासन के खुफिया तंत्र की ‘आंखें’ बंद हैं, या जानबूझकर मौन हैं?
  • अवैध नशे के पीछे का ‘चेहरा’ कौन? कागजी कार्रवाई के शोर में असली गुनहगार आजाद!

बस्ती, उत्तर प्रदेश: क्या बस्ती जनपद का प्रशासन और आबकारी विभाग वाकई नशे के कारोबार की कमर तोड़ने के लिए गंभीर है, या फिर यह पूरी कवायद महज अपनी कार्यक्षमता का दिखावा है? जनपद की सड़कों और गलियों में जिस तेजी से नशे का जाल फैला है, उसे देखते हुए यह सवाल पूछना लाजिमी है।बस्ती जनपद की गलियों से लेकर सुदूर गांवों तक नशे की पहुंच ने एक ऐसा भयावह जाल बुन दिया है, जो हमारे युवाओं की पीढ़ी को निगल रहा है। यह सवाल अब सिर्फ चर्चा का विषय नहीं, बल्कि एक गंभीर संकट बन चुका है—क्या नशे का यह काला कारोबार महज ‘प्रशासनिक विफलता’ है, या फिर इसके पीछे किसी ‘गहरी मिलीभगत’ की नींव मजबूत है?

​आए दिन पुलिस और आबकारी विभाग के ‘ऑपरेशन’ की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। दावा किया जाता है कि भारी मात्रा में अवैध शराब या नशीले पदार्थ पकड़े गए हैं। लेकिन क्या कभी किसी ने गौर किया है कि पुलिस के हत्थे चढ़ने वाले ये लोग आखिर कौन हैं?

​’मगरमच्छ’ मजे में, ‘मोहरे’ सलाखों के पीछे

​पुलिस और आबकारी विभाग की कार्यशैली का एक ढर्रा साफ नजर आता है। जब भी नशा तस्करी के खिलाफ अभियान चलता है, तो पकड़े जाते हैं वे लोग जो मात्र ‘डिलीवरी बॉय’ या ‘कैरियर’ (गुर्गे) का काम करते हैं। ये वे मजबूर या लालची मोहरे हैं, जिन्हें मुख्य सरगनाओं ने आगे कर रखा है।

​प्रशासन इन छोटे गुर्गों को पकड़कर अपनी पीठ थपथपाता है, प्रेस विज्ञप्ति जारी करता है और अपनी ‘सफलता’ का डंका बजाता है। लेकिन असली सवाल यह है कि इन गुर्गों तक यह नशा पहुँचा कौन रहा है? इसके पीछे के सिंडिकेट का मास्टरमाइंड कौन है, जो शहर में बैठकर मौत का यह व्यापार चला रहा है? क्यों पुलिस उन चेहरों तक नहीं पहुँच पाती, जो इस अवैध धंधे का असली आधार हैं?

जब भी जनपद में नशे के खिलाफ कोई बड़ी घटना होती है या प्रशासन की नींद खुलती है, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है—आखिर यह नशीला पदार्थ और अवैध शराब आ कहाँ से रही है? बस्ती की सीमाओं से लेकर गलियों तक फैले इस ‘नशा-तंत्र’ के पीछे एक सोची-समझी साजिश और मजबूत सप्लाई चेन काम कर रही है।

अवैध नशे का ‘रूट मैप’

बस्ती की भौगोलिक स्थिति इसे तस्करों के लिए एक ‘ट्रांजिट पॉइंट’ के रूप में मुफीद बनाती है। जांच और स्थानीय सूत्रों की मानें तो नशा तस्करों के रास्ते कुछ इस तरह हैं:

  • सीमावर्ती जिलों का फायदा: बस्ती की सीमाएं गोंडा, सिद्धार्थनगर और संतकबीरनगर से सटी हैं। तस्कर अक्सर उन रास्तों का चयन करते हैं जहाँ पुलिस की चौकसी कम होती है। सिद्धार्थनगर के रास्ते सीमावर्ती इलाकों से होकर आने वाली अवैध शराब और अन्य नशीले पदार्थ अक्सर छोटे वाहनों या निजी वाहनों के जरिए बस्ती में प्रवेश करते हैं।
  • हाइवे और लिंक रोड का जाल: नेशनल हाइवे (NH-28) तस्करों के लिए मुख्य मार्ग है, लेकिन प्रशासन की नजरों से बचने के लिए वे अब बस्ती के भीतरी लिंक रोड्स और ग्रामीण रास्तों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन रास्तों पर पुलिस की नियमित पेट्रोलिंग न के बराबर होती है, जिसका सीधा फायदा तस्करों को मिलता है।
  • ट्रेन का सुरक्षित रूट: लम्बी दूरी की कई ट्रेनें बस्ती रेलवे स्टेशन से गुजरती हैं। बड़े पैमाने पर तस्करी करने वाले गिरोह अक्सर ट्रेनों का उपयोग ‘सेफ पैसेज’ के रूप में करते हैं। नशा तस्करों के पास अब ऐसे गुर्गे हैं जो छोटे पैकेटों में नशीले पदार्थ को भीड़-भाड़ का फायदा उठाकर स्टेशन के बाहर तक आसानी से पहुंचा देते हैं।

तस्करों का ‘डिलीवरी मॉडल’

अवैध नशे का व्यापार अब संगठित अपराध का रूप ले चुका है। तस्करों का ‘डिलीवरी मॉडल’ किसी बड़ी कूरियर कंपनी जैसा है:

  • सेगमेंटेशन: मुख्य सरगना कभी भी माल खुद नहीं छूता। पहले स्तर पर माल बॉर्डर से आता है, दूसरे स्तर पर इसे गोदामों में डंप किया जाता है, और तीसरे स्तर पर छोटे गुर्गे इसे शहर के अलग-अलग ‘हॉटस्पॉट्स’ तक पहुँचाते हैं।
  • टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल: अब नशे की डीलिंग सोशल मीडिया और एनक्रिप्टेड ऐप्स के जरिए होने लगी है। लोकेशन शेयरिंग और डिजिटल पेमेंट के चलते तस्करों और खरीदारों के बीच सीधा संपर्क बहुत कम होता है।

​प्रशासनिक चुप्पी और मिलीभगत का संदेह

​क्या यह मुमकिन है कि स्थानीय प्रशासन को इन नशा तस्करों के ठिकानों और उनके नेटवर्क की भनक न हो? यह सवाल बस्ती की जनता की जुबान पर है। जब एक आम नागरिक को शहर के संदिग्ध अड्डों की जानकारी हो सकती है, तो खुफिया तंत्र और आबकारी विभाग की ‘आंखें’ और ‘कान’ क्या इतने कमजोर हो गए हैं?प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती

बस्ती में नशे की पहुंच का मुख्य कारण ‘इंटेलिजेंस गैप’ है। जब तक नशा बाजार में नहीं पहुंचता, तब तक प्रशासन के कान नहीं खड़े होते। सवाल यह है कि:

  • क्या बॉर्डर पर सघन चेकिंग अभियान महज रस्म अदायगी है?
  • क्यों अवैध शराब की भट्टियां और नशीले पदार्थों के ठिकाने लगातार फल-फूल रहे हैं?
  • क्यों इन रास्तों की पहचान कर उन्हें ‘ब्लैकलिस्ट’ या वहां स्थायी निगरानी नहीं बढ़ाई जा रही?

बस्ती के युवाओं को नशे के चंगुल से बचाने के लिए केवल ‘गुर्गों’ की गिरफ्तारी काफी नहीं है। प्रशासन को अब उन रास्तों को बंद करना होगा जो शहर में नशे की सप्लाई की लाइफलाइन बने हुए हैं। जब तक ‘सप्लाई चेन’ के मुख्य नोड्स (Nodes) ध्वस्त नहीं होंगे, तब तक यह जहर हमारे समाज की रगों में दौड़ता रहेगा।

​बार-बार हो रही मामूली गिरफ्तारियां यह साबित करती हैं कि प्रशासन या तो ‘अक्षम’ है या फिर ‘मिलीभगत’ के गहरे खेल में लिप्त है। गुर्गों पर कार्रवाई कर दी जाती है ताकि फाइलें बंद हो सकें, लेकिन मुख्य तस्कर आज भी बेखौफ घूम रहे हैं।

विफलता का चेहरा: जब तंत्र ‘अंधा’ हो जाए

जब शहर में खुलेआम नशीले पदार्थ बिक रहे हों, स्कूल-कॉलेजों के आसपास संदिग्धों का जमावड़ा हो और पुलिस को इसकी भनक तक न हो, तो इसे प्रशासनिक विफलता के अलावा और क्या कहा जाएगा?

  • खुफिया तंत्र की नाकामी: पुलिस और आबकारी विभाग का सूचना तंत्र (Intelligence Network) यदि तस्करों के अड्डों की पहचान नहीं कर पा रहा है, तो यह उनकी पेशेवर अक्षमता को दर्शाता है।
  • कार्रवाई का दिखावा: बार-बार केवल ‘छोटी मछलियों’ पर कार्रवाई करना यह साबित करता है कि प्रशासन समस्या की जड़ तक जाने की इच्छाशक्ति ही नहीं रखता। यह केवल आंकड़ों की बाजीगरी है ताकि जनता के आक्रोश को कुछ समय के लिए शांत किया जा सके।

मिलीभगत का सच: ‘सुरक्षा’ के बदले ‘सुविधा’

  • विफलता से भी अधिक खतरनाक है—मिलीभगत। सवाल यह है कि अवैध शराब की भट्टियां या नशीले पदार्थों के अड्डे हफ्तों और महीनों तक कैसे संचालित होते रहते हैं?
  • संरक्षण की राजनीति: कहीं न कहीं इन तस्करों को किसी न किसी रूप में संरक्षण प्राप्त होता है। जब तक ‘ऊपर’ से इशारा न हो, तब तक स्थानीय स्तर पर इतना बड़ा सिंडिकेट बिना किसी ‘लेन-देन’ के पनप ही नहीं सकता।
  • माहौल का लाभ: जब प्रशासन का पूरा ध्यान अन्य कार्यों में लगा हो, तब यह माफिया अपना व्यापार दोगुना कर लेता है। यह ‘सुविधाजनक चुप्पी’ किसी गहरी सेटिंग की ओर इशारा करती है।

​जनता के सवाल, प्रशासन पर भारी

​आज बस्ती का युवा इस नशे की चपेट में आकर अपना भविष्य बर्बाद कर रहा है। प्रशासन से हमारे सीधे और तीखे सवाल हैं:

  1. मुख्य तस्करों पर अंकुश क्यों नहीं? क्या प्रशासन के पास उन रसूखदारों तक पहुँचने की हिम्मत नहीं है जो पर्दे के पीछे से नशा परोस रहे हैं?
  2. आबकारी विभाग की भूमिका क्या है? यदि अवैध शराब या नशा बाजार में खुलेआम बिक रहा है, तो आबकारी विभाग की जिम्मेदारी किसकी है? सिर्फ दुकानों पर छापेमारी कर खानापूर्ति क्यों?
  3. क्या ये गिरफ्तारियां महज एक ‘दिखावा’ है? अगर नहीं, तो नशे के व्यापार में कमी क्यों नहीं आ रही है?

​बस्ती की जनता अब केवल आंकड़ों वाली गिरफ्तारियों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। उसे चाहिए ठोस कार्रवाई—उस जड़ पर प्रहार, जहाँ से यह नशा फल-फूल रहा है।

​प्रशासन को अब अपनी कार्यशैली बदलनी होगी। यदि ‘मगरमच्छों’ को संरक्षण देना बंद नहीं किया गया, तो बस्ती का आने वाला कल इस नशे के दलदल में डूब जाएगा।

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