गोरखर में मनरेगा का काला सच: कागजों में 61 मजदूर, धरातल पर सिर्फ 10 का बसेरा!

मनरेगा में भ्रष्टाचार का ‘गोरखर’ मॉडल: धरातल पर 10, कागजों में 61 मजदूर; बाल श्रम से भी नहीं परहेज
- बस्ती में मनरेगा के ‘फर्जी’ मजदूर: जिम्मेदार बेखबर या भ्रष्टाचार में हिस्सेदार?
- शिक्षा की उम्र में हाथों में फावड़ा: मनरेगा में बाल श्रम की खुली पोल, सरकारी नियमों की उड़ी धज्जियां।
- जादुई मनरेगा: 10 मजदूरों से करवाया 61 का काम, भ्रष्टाचार के नाम पर सल्टौआ बदनाम!
बस्ती: केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘मनरेगा’ का उद्देश्य ग्रामीण गरीबों को आजीविका की सुरक्षा प्रदान करना है, लेकिन जनपद के विकास खंड सल्टौआ गोपालपुर की ग्राम पंचायत गोरखर में यह योजना भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े का पर्याय बन चुकी है। यहाँ ‘सिकंदरपुर पुलिया से गिधानी सरहद तक’ नाला खुदाई और सफाई के नाम पर सरकारी धन की खुली लूट मची है।

कागजी घोड़ों की दौड़, धरातल पर सन्नाटा
मामला तब प्रकाश में आया जब कार्यस्थल की हकीकत सामने आई। मस्टर रोल के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मौके पर 61 मजदूरों की हाजिरी दर्ज है, जबकि धरातल पर केवल 10 मजदूर ही काम करते पाए गए। शेष 51 मजदूरों का कहीं अता-पता नहीं है, लेकिन उनके नाम पर भुगतान की तैयारी पूरी कर ली गई है। स्पष्ट है कि प्रधान, सचिव और रोजगार सेवक की तिकड़ी ने सरकारी खजाने को लूटने का ‘शॉर्टकट’ ढूंढ लिया है।
बाल श्रम: कानून की धज्जियां
भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा तो तब दिखी जब कार्यस्थल पर 18 वर्ष से कम आयु के किशोरों को काम करते पाया गया। मनरेगा के नियमों और बाल संरक्षण कानूनों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सवाल यह है कि मासूम बच्चों के हाथों में मजदूरी का औजार थमाने का दुस्साहस किसने किया? क्या प्रशासन की आंखों पर भ्रष्टाचार की पट्टी बंधी है?
मिलीभगत का खेल, जिम्मेदार कौन?
ग्रामीणों का आरोप है कि रोजगार सेवक रामतौल मौर्य और पंचायत सचिव अमरनाथ गौतम की मिलीभगत से यह फर्जीवाड़ा संचालित हो रहा है। बिना उच्च अधिकारियों की संलिप्तता या उदासीनता के, इतने बड़े पैमाने पर फर्जी हाजिरी दर्ज करना संभव नहीं है।
प्रमुख सवाल जो प्रशासन को कटघरे में खड़े करते हैं:
- 10 मजदूरों के काम करने पर 61 की हाजिरी का आधार क्या है?
- ब्लाक स्तर के अधिकारियों ने कार्यस्थल का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) क्यों नहीं किया?
- बाल श्रम जैसे गंभीर अपराध के लिए जिम्मेदार कौन है?
कार्रवाई या लीपापोती?
यह मामला केवल एक पंचायत का नहीं, बल्कि व्यवस्था में व्याप्त सड़न का प्रमाण है। यदि समय रहते निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो मनरेगा का मूल उद्देश्य पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा। अब देखना यह है कि बस्ती का जिला प्रशासन इस पर क्या रुख अपनाता है—क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी या यह मामला भी पुरानी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
क्षेत्र की जनता की नजरें अब जांच पर टिकी हैं।
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