प्रशासनिक विसंगति: ‘लूट’ की संस्कृति बनाम व्यवस्था का संकल्प

अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती सहकारिता विभाग: ‘लूट’ बनाम ‘कानून’ की जंग, सचिवों और प्रशासन के बीच बढ़ा तनाव
- बस्ती सहकारिता में करोड़ों का खेल: भ्रष्ट सचिवों और ईमानदार अधिकारी के बीच ठनी जंग
- फर्जीवाड़े पर नकेल: खाद और ऋण घोटाले के खिलाफ एआर के सख्त तेवर
- बस्ती: सचिवों का सामूहिक इस्तीफा, एआर ने दी खुली चुनौती—’जो लूटना चाहते हैं, वे छोड़ें पद’
बस्ती। जिले के सहकारिता विभाग में इन दिनों मची उठापटक ने प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोल दी है। विभाग में लंबे समय से चली आ रही भ्रष्टाचार की जड़ों को उखाड़ने के लिए वर्तमान एआर (AR) रवि शंकर सिंह द्वारा की गई सख्ती ने पुराने तंत्र में खलबली मचा दी है।सरकारी तंत्र में जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो आम आदमी की उम्मीदें दम तोड़ने लगती हैं। बस्ती जिले में सहकारिता विभाग की स्थिति कुछ ऐसी ही बन गई थी, जहाँ ‘लूट’ एक शिष्टाचार और ‘ईमानदारी’ एक सजा बन गई थी।
भ्रष्टाचार का पुराना अध्याय: संरक्षण और बंदरबांट
बस्ती में लंबे समय तक पूर्व एआर (AR) का कार्यकाल भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाला रहा। स्थिति इतनी भयावह थी कि समितियों के सचिवों ने किसानों के नाम पर लिए गए ऋण और खाद के व्यवसाय को अपना निजी धंधा बना लिया था। हद तो तब हो गई जब वे खाद और सरकारी धन का उपयोग निजी लाभ के लिए करने लगे और प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। पूर्व एआर के कार्यकाल को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जहाँ प्रशासन की नाक के नीचे समितियों के सचिवों द्वारा किसानों के साथ व्यापक धोखाधड़ी की गई। रिपोर्ट के अनुसार:
- सचिवों ने किसानों के नाम पर लिए गए 10 लाख रुपये तक की ऋण सीमा की धनराशि को संगठित गिरोह की तरह लूटा।
- सरकारी खाद का व्यापार करने के लिए मिले पैसों का उपयोग सचिवों ने अपने निजी व्यापार में किया।
- पूर्व एआर पर आरोप है कि उन्होंने इस लूट को रोकने के बजाय इसे बढ़ावा दिया, जिससे सचिवों के हौसले बुलंद थे।
- कई सचिवों ने खाद के व्यवसाय में 10 फीसदी तक का सूद कमाया और एआर को भी इसमें हिस्सा मिलता रहा, जिसके परिणामस्वरूप धन और गेहूं में करोड़ों रुपये का घोटाला हुआ।
नया बदलाव: ‘लूटने नहीं दूंगा’ का संकल्प
वर्तमान एआर रवि शंकर सिंह ने पद संभालते ही सख्त लहजे में संदेश दिया है कि सरकारी खाद निर्धारित दर से एक रुपया भी अधिक पर नहीं बेची जाएगी। उनकी इस ईमानदारी की चर्चा पहले से ही रही है, क्योंकि उन्होंने पूर्व में सहारनपुर में सचिवों की फर्जी नियुक्तियों का खुलासा करते हुए बड़ी कार्रवाई की थी।
सचिवों का विरोध और दबाव की राजनीति
वर्तमान एआर, रवि शंकर सिंह के पदभार संभालते ही हवा का रुख बदला। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि निर्धारित दर से एक रुपया भी अधिक वसूला गया, तो परिणाम गंभीर होंगे। सचिवों की जमात, जो ‘लूट’ की आदी हो चुकी थी, इस सख्ती से तिलमिला गई और विरोध स्वरूप हड़ताल का सहारा लेने लगी। यह विरोध यह बताने के लिए पर्याप्त है कि पुराने ढर्रे में कितना बड़ा भ्रष्टाचार पनप रहा था। एआर की सख्ती से तिलमिलाए सचिवों ने अपनी पुरानी कार्यशैली को बचाने के लिए मोर्चा खोल दिया है:
- सचिवों ने एआर के खिलाफ हड़ताल का रास्ता चुना है।
- जब प्रशासन ने नियम सख्त किए, तो सचिवों ने सामूहिक इस्तीफा देकर एआर पर दबाव बनाने का असफल प्रयास किया।
- इस पर एआर ने स्पष्ट कर दिया कि जो लोग प्रबंधन का काम नहीं करना चाहते, वे इस्तीफा दे सकते हैं।
जनता का सवाल: कौन है असली गुनहगार?
आज स्थिति यह है कि एक तरफ वह एआर है जिसने सहारनपुर में फर्जीवाड़े का पर्दाफाश किया था, और दूसरी तरफ वे सचिव हैं जिन्होंने सामूहिक इस्तीफे का नाटक कर प्रशासन को झुकाने की कोशिश की। एआर द्वारा ‘लूटने नहीं दूंगा’ का संकल्प उन लोगों के लिए चुनौती है जो अब तक जनता की गाढ़ी कमाई पर डाका डाल रहे थे।
अब फैसला जनता को करना है—क्या वे उस व्यवस्था के साथ हैं जो ‘लूट’ को अपना अधिकार समझती है, या उस प्रयास के साथ जो पारदर्शिता और ईमानदारी की नींव रख रहा है? भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने का यह अभियान बस्ती के सहकारिता विभाग के लिए ‘अग्निपरीक्षा’ है।
आगे की राह: किसानों का पक्ष
किसानों का आरोप है कि जिले के सहकारिता विभाग में नियुक्त सचिवों ने स्वयं को विक्रेता बना लिया है। किसानों का मानना है कि यदि एआर साहब कार्यालय की इस गंदगी को साफ कर सकें और भ्रष्ट सचिवों को हटा सकें, तभी यह व्यवस्था सुधर सकती है। वर्तमान में, पूरा विभाग दो धड़ों में बंट गया है—एक तरफ वह प्रशासन है जो ईमानदारी का दावा कर रहा है, और दूसरी तरफ वे सचिव जो लंबे समय से लूट के आदी रहे हैं।
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