जुनवानी हत्याकांड: थाना प्रभारी शिवकुमार धारी पर कथित लेन-देन और गवाह के बयान को प्रभावित करने का आरोप!

एक गिरफ्तारी, कई अनसुलझे सवाल: जुनवानी हत्याकांड में पुलिस विवेचना पर उठे गंभीर सवाल?
पीड़ित परिवार ने स्वतंत्र विवेचना और जांच अधिकारी बदलने एवं थाना प्रभारी की ट्रांसफर की मांग की!
भटगांव (सारंगढ़-बिलाईगढ़) :- एक बुजुर्ग की हत्या, कुछ घंटों में गिरफ्तारी और अब पुलिस विवेचना पर उठते गंभीर सवाल—जुनवानी हत्याकांड की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। पीड़ित परिवार के अनुसार, मामले में कई ऐसी कड़ियां हैं जिनकी पूरी पड़ताल अभी भी जरूरी है। परिवार ने वरिष्ठ अधिकारियों से सवाल किया है कि यदि विवेचना निष्पक्ष है तो घटना से जुड़े हर पहलू की जांच और उसका आधार सामने क्यों नहीं आ रहा? करीब दो माह पहले हुई हत्या के मामले में सकराम कुर्रे की गिरफ्तारी हुई थी। परिवार का कहना है कि आरोपी की उम्र और शारीरिक स्थिति को देखते हुए घटना में अन्य लोगों की संभावित भूमिका को भी गंभीरता से जांचा जाना चाहिए था। इसी आधार पर पवन कुर्रे सहित अन्य लोगों की भूमिका की जांच की मांग की गई है।
जिला संवाददाता गोपी अजय
मामले की सबसे अहम कड़ियों में से एक डॉग स्क्वॉड की कार्रवाई बताई जा रही है। परिवार के अनुसार, डॉग स्क्वॉड खेत से होते हुए उस घर तक पहुंचा था, जहां पवन कुर्रे के कथित रूप से भागकर पहुंचने और पानी पीने की बात सामने आई थी। परिवार का कहना है कि उसी घर की एक नाबालिग ने पवन को पहचानने की बात कही थी। परिवार का आरोप है कि बाद में गवाह को डराने-धमकाने अथवा बयान प्रभावित करने की कोशिश की गई होगी। यदि ऐसा हुआ है, तो यह जांच की निष्पक्षता से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। इसी बीच थाना प्रभारी शिवकुमार धारी को लेकर परिवार ने सबसे गंभीर आरोप लगाया है। परिवार का दावा है कि मुख्य आरोपियों को बचाने के लिए ₹5 से ₹10 लाख तक के कथित लेन-देन की बात सामने आई है। परिवार ने इस दावे की भी वरिष्ठ स्तर पर स्वतंत्र जांच की मांग की है। इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि हत्या किसने की, बल्कि यह भी है कि क्या हर संभावित कड़ी की निष्पक्ष जांच हुई? डॉग स्क्वॉड की ट्रैकिंग का रिकॉर्ड क्या कहता है? नाबालिग गवाह का बयान किस परिस्थिति में लिया गया? अन्य संदिग्धों की भूमिका की कितनी जांच हुई? पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट के निष्कर्षों को विवेचना में किस तरह शामिल किया गया? और सबसे महत्वपूर्ण—परिवार द्वारा लगाए गए कथित लेन-देन के आरोप की जांच कौन करेगा? पीड़ित परिवार ने थाना प्रभारी को विवेचना से हटाकर किसी अन्य अधिकारी से जांच कराने, नार्को टेस्ट और सीबीआई जांच की मांग की है। अब बॉल वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के पाले में है। शिकायत में उठाए गए सवालों की स्वतंत्र समीक्षा होती है या नहीं, यही तय करेगा कि इस मामले में जांच पर उठ रहे संदेह दूर होते हैं या और गहराते हैं। कथित लेन-देन, गवाह को प्रभावित करने और अन्य लोगों की भूमिका से संबंधित बातें पीड़ित परिवार के आरोप एवं आशंकाओं पर आधारित हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
गंभीर सवाल – क्या आरोपी की शारीरिक क्षमता और घटना मे लगे चोट का मेडिकल और फॉरेनसिक मिलान किया गया? क्या मृतक, आरोपी और संदिग्ध की मोबाइल लोकेशन और सीडीआर निकला गया? क्या घटनास्थल से मिले DNA, फिंगरप्रिंट, फुटप्रिंट और रक्त के नमूनों की जांच कराई गई? हत्या में इस्तेमाल हथियार पर फॉरेंसिक जांच हुई? क्या उसका किसी व्यक्ति से वैज्ञानिक संबंध स्थापित हुआ? क्या संदिग्धों के कपड़ों और शरीर पर खून, चोट या संघर्ष के निशान की जांच की गई? क्या पुलिस ने आरोपी के घर और अन्य संबंधित स्थानों की विधिवत तलाशी लेकर उसका रिकॉर्ड तैयार किया? क्या पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक निष्कर्षों को केस की पूरी टाइमलाइन से मिलाया गया? यदि अन्य लोगों की भूमिका की संभावना सामने आई थी, तो उन्हें जांच के दायरे में लेकर क्या कार्रवाई की गई?
सबसे बड़ा सवाल—क्या विवेचना हर संभावित कोण से हुई, या जांच की शुरुआत में तय की गई कहानी के आधार पर ही आगे बढ़ती रही?
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