पितृ पक्ष की शुरुआत, पूर्वजों के स्मरण का पर्व,पूर्णिमा श्राद्ध, 27 सितंबर से प्रतिपदा के साथ मुख्य पितृ पक्ष शुरू

सागर।वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज रिपोर्टर सुशील द्विवेदी 8225072664 * हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का विशेष अवसर माना जाता है। इस दौरान दिवंगत परिजनों की आत्मिक शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य करने की परंपरा है।
इस वर्ष आज पूर्णिमा श्राद्ध होगा, जबकि 27 सितंबर रविवार से प्रतिपदा श्राद्ध के साथ मुख्य पितृ पक्ष शुरू होगा। इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा।
पितृ पक्ष में परिवार के लोग अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म करते हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार इस दौरान तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन, अन्न-वस्त्र दान और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्य किए जाते हैं।
कई श्रद्धालु नदियों, सरोवरों और तीर्थ स्थलों पर पहुंचकर भी पितरों के निमित्त तर्पण करते हैं। पितृ पक्ष से जुड़ी प्रसिद्ध कथा महाभारत के महान योद्धा कर्ण से संबंधित है।
मान्यता के अनुसार युद्ध के बाद कर्ण की मृत्यु हुई और उनकी आत्मा स्वर्ग पहुंची। वहां उन्हें भोजन के स्थान पर सोना और अन्य बहुमूल्य वस्तुएं मिलने लगीं।
कर्ण ने इसका कारण पूछा तो बताया गया कि उन्होंने जीवन में बहुत दान किया, लेकिन अपने पितरों के निमित्त अन्न और जल का दान नहीं किया था। कथा के अनुसार कर्ण को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्हें पृथ्वी पर लौटकर पितरों के लिए श्राद्ध एवं तर्पण करने का अवसर मिला।
उन्होंने अन्न, जल और दान-पुण्य किया। इसी कथा को पितरों के निमित्त अन्न और जल अर्पित करने की परंपरा से जोड़ा जाता है।
पितृ पक्ष का अंतिम दिन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के रूप में मनाया जाएगा। इस दिन उन पितरों के लिए भी श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया हो।
इसलिए इस दिन का विशेष महत्व माना जाता है। पितृ पक्ष हमें अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर देता है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम वर्तमान और भविष्य की चिंता में कई बार उन लोगों को भूल जाते हैं, जिनके संघर्ष और संस्कारों ने हमारे परिवार की नींव मजबूत की। पितृ पक्ष हमें उन पूर्वजों को याद करने और उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का संदेश देता है।
पूर्वजों की सच्ची श्रद्धांजलि केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उनके अच्छे संस्कारों को अपने जीवन में अपनाना, बुजुर्गों का सम्मान करना, जरूरतमंदों की सहायता करना और परिवार में प्रेम एवं भाईचारा बनाए रखना भी उनके प्रति सम्मान का भाव है।
पितृ पक्ष की परंपरा हमें यह याद दिलाती है कि परिवार केवल वर्तमान पीढ़ी का नाम नहीं है। इसके पीछे कई पीढ़ियों की मेहनत, त्याग और संस्कार जुड़े होते हैं।
इसलिए अपने पूर्वजों को याद करना अपनी पहचान और विरासत को सम्मान देना भी है। पितृ पक्ष का संदेश स्पष्ट है—पूर्वजों को श्रद्धा से याद करें, उनके अच्छे संस्कारों को जीवन में उतारें और आने वाली पीढ़ी तक परिवार की परंपराओं को पहुंचाएं।
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