EXCLUSIVE REPORT भागीरथपुरा जल कांड की परतें खुलीं लापरवाही के आरोपों पर उठे गंभीर सवाल, जिम्मेदारों की भूमिका जांच के घेरे में

🔴 तेजकुमार जारवाल
जिला रिपोर्टर | इंदौर
वंदे भारत LIVE TV NEWS
भागीरथपुरा दूषित पेयजल मामला: हाई कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड हुई न्यायिक जांच रिपोर्ट; 1990 से 2026 तक कई स्तरों पर हुई चूकों का सामूहिक परिणाम
इंदौर | विशेष संवाददाता
भागीरथपुरा में हुई दूषित पेयजल की गंभीर घटना को लेकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्देशों पर गठित न्यायिक जांच आयोग की विस्तृत रिपोर्ट बृहस्पतिवार को हाई कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक कर दी गई। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि यह हादसा किसी एक व्यक्ति या विभाग की तात्कालिक लापरवाही नहीं, बल्कि बीते तीन दशकों (1990 से 2026) के दौरान अलग-अलग प्रशासनिक एवं तकनीकी स्तरों पर हुई गंभीर चूकों, कमजोर निगरानी और बुनियादी ढांचे के समय पर नवीनीकरण न होने का संयुक्त परिणाम था।
प्रमुख बिंदु एवं जांच आयोग के मुख्य निष्कर्ष
1990 से शुरू हुआ खामियों का सिलसिला: आयोग के अनुसार तत्कालीन इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA) के वे अधिकारी और इंजीनियर जिम्मेदारी के दायरे में आते हैं, जो 1990 से 1995 के दौरान सीवरेज परियोजना की योजना व डिजाइनिंग और 1999 से 2004 के बीच पाइपलाइन बिछाने के कार्य में शामिल थे। इन कार्यों में CPHEEO (केंद्रीय पर्यावरण एवं जन स्वास्थ्य पर्यावरणीय अभियांत्रिकी संगठन) मैनुअल के सुरक्षात्मक मानकों का पालन नहीं किया गया था।
नगर निगम की निगरानी और रखरखाव में विफलता: इंदौर नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों पर सवाल उठाते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि सीवरेज व पेयजल व्यवस्था की लगातार निगरानी, निवारक रखरखाव (Preventive Maintenance) और बुनियादी ढांचे में आ रही खराबी को समय रहते चिन्हित करने में प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह विफल रहा। वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर टिप्पणी: रिपोर्ट में वर्ष 2013 से 2026 तक लगातार पदस्थ रहे अधीक्षण यंत्री संजीव कुमार श्रीवास्तव की भूमिका का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है।
आयोग ने पाया कि क्षेत्र की जलापूर्ति प्रणाली के वरिष्ठ तकनीकी प्रमुख होने के बावजूद कमजोर नेटवर्क का पर्याप्त निरीक्षण और प्रभावी निगरानी सुनिश्चित नहीं की गई। निविदा और प्रशासनिक प्रक्रिया में अत्यधिक देरी: जर्जर व क्षतिग्रस्त पाइपलाइनों को बदलने से जुड़ी निविदा (Tender) प्रक्रिया, तकनीकी जांच और अंतिम स्वीकृति में हुई अत्यधिक प्रशासनिक देरी ने दूषित जल के खतरे को और बढ़ा दिया।
विस्तृत विभागीय जांच की सिफारिश
न्यायिक आयोग ने अनुशंसा की है कि अलग-अलग समय पर पदस्थ रहे कार्यपालन यंत्रियों, अधीक्षण यंत्रियों व अन्य संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने के लिए एक विस्तृत विभागीय जांच (Departmental Inquiry) कराई जाए। इस जांच के जरिए संबंधित अवधि में पदस्थ अधिकारियों के कार्यकाल, उनकी वैधानिक जिम्मेदारियों और कर्तव्य में हुई किसी भी प्रकार की निष्क्रियता या लापरवाही की पहचान कर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
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