वटवृक्ष के दूध से बनाई जटा, बिलख पड़े मंत्री सुमंत दसवें दिन की लीला का शुभारंभ निषादराज के आश्रम से हुआ। प्रभु श्रीराम ने वटवृक्ष का दूध मंगाकर अपनी और लक्ष्मण जी की जटाएं बनाईं।

वटवृक्ष के दूध से बनाई जटा, बिलख पड़े मंत्री सुमंत
दसवें दिन की लीला का शुभारंभ निषादराज के आश्रम से हुआ। प्रभु श्रीराम ने वटवृक्ष का दूध मंगाकर अपनी और लक्ष्मण जी की जटाएं बनाईं। श्रीराम को तपस्वी वेश में जटा बांधते देख मंत्री सुमंत बिलख पड़े। सुमंत जी ने महाराज दशरथ का संदेश सुनाते हुए श्रीराम से अयोध्या लौटने या कम से कम देवी सीता को वापस भेजने का निवेदन किया।
इस पर देवी सीता ने अपने तर्कों से सुमंत जी को निरुत्तर करते हुए स्पष्ट किया कि उनका स्थान प्रभु के चरणों में ही है। वहीं, पिता के वचनों पर लक्ष्मण जी के आक्रोश को देखते हुए श्रीराम ने सुमंत जी को वचनबद्ध किया कि वे लक्ष्मण की इन बातों को महाराज दशरथ से न कहें। भारी मन से सुमंत जी वापस अयोध्या लौट गए।मांगी नाव न केवट आना…" : रामनगर में गूंजा केवट का हठ
गंगा तट पर पहुँचकर जब श्रीराम ने नदी पार करने के लिए नाव मांगी, तो केवट ने बड़ी विनम्रता से अपनी शर्त रख दी। केवट ने कहा— "हे प्रभु! आपके चरण रज में पत्थर की शिला को नारी (अहिल्या) बनाने का गुण है। यदि मेरी काठ की नाव नारी बन गई, तो मैं अपने परिवार का भरण-पोषण कैसे करूंगा?"
लक्ष्मण जी के क्रोधित होने पर भी केवट नम्रता से अड़ा रहा कि भले ही उन्हें तीर मार दिया जाए, लेकिन बिना पांव पखारे (धोए) वह तीनों को अपनी नौका में नहीं बैठाएगा। केवट का निष्काम प्रेम देख श्रीराम मुस्कुरा उठे। केवट कठौते में गंगाजल लाया और प्रभु के चरण पखारे। गंगा पार कराने के बाद जब श्रीराम ने उतराई देनी चाही, तो केवट ने यह कहते हुए लेने से इनकार कर दिया कि— "एक ही पेशे के लोग आपस में पारिश्रमिक नहीं लेते। मैंने आपको यह गंगा पार कराई है, आप मुझे भवसागर से पार लगा दीजिएगा।ग्रामवासी मिलन और महर्षि वाल्मीकि समागम
गंगा पार कर सीता जी ने गंगा मैया का पूजन किया। इसके बाद सभी प्रयागराज स्थित महर्षि भारद्वाज के आश्रम पहुँचे, जहाँ ज्ञान-चर्चा हुई। यमुना नदी पार कर आगे बढ़ते हुए जब प्रभु राम, सीता और लक्ष्मण जंगलों से गुज़रे, तो ग्रामवासियों और विशेषकर ग्रामीण स्त्रियों ने सीता जी से दोनों सुंदर राजकुमारों के बारे में पूछा, जिस पर सीता जी ने लज्जापूर्वक श्रीराम को पति और लक्ष्मण को देवर के रूप में परिचित कराया।
आगे चलकर श्रीराम महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुँचे। जब श्रीराम ने रहने का स्थान पूछा, तो महर्षि वाल्मीकि ने अद्भुत चौपाई कही—
"पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।" "जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ॥"चित्रकूट में बनी सुंदर पर्णकुटी, राममय हुआ वातावरण
महर्षि वाल्मीकि के परामर्श पर प्रभु श्रीराम ने सभी ऋतुओं में सुखदायी मंदाकिनी तट स्थित चित्रकूट में निवास करने का निर्णय लिया। भगवान विश्वकर्मा ने देवगणों, कोल और भीलों के साथ मिलकर प्रभु के लिए अत्यंत सुंदर पर्णकुटी का निर्माण किया।
देवगणों ने प्रभु श्रीराम से राक्षसों और रावण के अत्याचारों से शीघ्र मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। चित्रकूट के पूर्णतः राममय हो जाने के साथ ही हर-हर महादेव और बजरंगबली के जयकारों के बीच महाआरती के बाद दसवें दिन की लीला को विश्राम दिया गया।
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