लेखपाल की गुंडागर्दी: 2 लाख के लिए ‘बंधक’ बना किसान, पुलिस के साथ मिलकर भेजा जेल!

अजीत मिश्रा (खोजी)
प्रशासनिक दबंगई: जब रक्षक ही बन जाए भक्षक, तो न्याय की उम्मीद किससे करें?
- बस्ती में ‘राज’ किसका? लेखपाल की मर्जी पर चलती है पुलिस और जेल!
- दो लाख की ‘फीस’ और जमीन हाजिर! बस्ती के लेखपाल ने साबित किया—कानून बिकाऊ है।
- न्याय का गला घोंटता तंत्र: जब लेखपाल ही बन जाए ‘भू-माफिया’, तो किसान कहाँ जाए?
- बस्ती में प्रशासनिक नंगा नाच: लेखपाल की दबंगई, किसान जेल में!
- रिश्वत का ‘खेल’ और किसान की ‘जेल’: लेखपाल की दबंगई का शर्मनाक सच।
- कानून के रखवालों की ‘गुंडागर्दी’ का शिकार हुआ किसान।
बस्ती: क्या अब उत्तर प्रदेश में सरकारी पद ‘अपराध करने का लाइसेंस’ बन चुके हैं? बस्ती जिले से जो खबर सामने आई है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है। यहाँ एक ‘लेखपाल’ ने प्रशासनिक पद की गरिमा को तार-तार करते हुए गुंडई की सारी हदें पार कर दी हैं। मात्र दो लाख रुपये की रिश्वत के बदले एक सरकारी अधिकारी ने न केवल कानून को जेब में रखा, बल्कि एक निर्दोष किसान को बंधक बनाया, उसे पीटा और पुलिस के साथ मिलकर जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया।
वर्दी और कुर्सी की आड़ में नंगा नाच
यह घटना ‘भ्रष्टाचार’ की साधारण श्रेणी में नहीं आती; यह ‘राज्य-प्रायोजित गुंडागर्दी’ का एक जीता-जागता उदाहरण है। लेखपाल राम प्रताप सिंह और कानूनगो विधा प्रसाद श्रीवास्तव का कृत्य यह साबित करता है कि इन्हें न तो कानून का डर है और न ही अपनी वर्दी का सम्मान। आरोप है कि इन्होंने भू-माफियाओं के हाथों में खेलकर एक ऐसे किसान की जमीन पर अवैध कब्जा करवाया, जिसके पास अपनी पुश्तैनी जमीन का हर वैध दस्तावेज मौजूद है।
सवालिया घेरे में पूरा तंत्र
सबसे भयावह पहलू यह है कि जब पीड़ित किसान न्याय के लिए दर-दर भटका—थाने से लेकर आला अधिकारियों (सीएम, कमिश्नर, डीएम, एसपी) तक—तब भी उसे केवल निराशा ही हाथ लगी। यदि एक पीड़ित व्यक्ति के साथ पुलिस और प्रशासन मिलकर इस तरह का अत्याचार करें, तो आम आदमी अपनी रक्षा की गुहार कहाँ लगाए? क्या पुलिस का काम अब केवल रिश्वतखोर अधिकारियों की ‘क्लीन चिट’ पर काम करना और निर्दोषों को जेल भेजना रह गया है?
प्रशासन पर कलंक
लेखपाल की यह टिप्पणी कि “तुम कब्जा करो, देखते हैं कौन रोकता है” सीधे तौर पर सरकार की नीति और प्रशासन के इकरारनामे को चुनौती है। यह केवल एक किसान की बर्बादी की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस हर नागरिक के लिए चेतावनी है जो अपनी जमीन बचाने के लिए सरकारी तंत्र पर भरोसा करता है।
हमारी मांग:
- तत्काल बर्खास्तगी: आरोपी लेखपाल राम प्रताप सिंह और कानूनगो विधा प्रसाद श्रीवास्तव को तुरंत सेवा से बर्खास्त किया जाए।
- निष्पक्ष जाँच: इस मामले की जाँच जिले के स्तर पर नहीं, बल्कि किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए, क्योंकि जिले का पूरा तंत्र इस भ्रष्टाचार में लिप्त दिखाई देता है।
- पीड़ित को न्याय: जिस किसान को जबरन जेल भेजा गया, उसे तुरंत रिहा कर उसे हुए मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का मुआवजा दिया जाए।
निष्कर्ष: यदि प्रशासन ने इस ‘दबंग लेखपाल’ पर कठोरतम कार्रवाई नहीं की, तो जनता का सिस्टम से बचा-खुचा भरोसा भी पूरी तरह खत्म हो जाएगा। यह समय केवल जाँच-पड़ताल का नहीं, बल्कि ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की तरह भ्रष्ट अधिकारियों को सिस्टम से बाहर फेंकने का है।
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