कृषि विभाग: जहाँ काम कम, साजिशें ज्यादा! अन्नदाता की सेवा या भ्रष्टाचार का अड्डा? कृषि विभाग की शर्मनाक हकीकत।

अजीत मिश्रा (खोजी)
‘कृषि’ विभाग में जितने ‘दोस्त’ नहीं, ‘उससे’ अधिक ‘दुश्मन’!
- कृषि विभाग में ‘मलाई’ की जंग: अब अपनों से ही अपनों की लड़ाई।
- जब रखवाले ही बन जाएं दुश्मन: कृषि विभाग की अंदरूनी जंग की कहानी।
- कृषि विभाग: कुर्सी की जंग, भ्रष्टाचार का नंगा नाच!’मलाईदार’ पदों का गणित और भ्रष्ट बाबुओं का अंत।
- कृषि विभाग का ‘ऑपरेशन सफाई’: कितने भ्रष्ट, कितने ईमानदार?
बस्ती: क्या यह वही कृषि विभाग है जिसका काम अन्नदाता का पेट भरना था? नहीं, यह वह विभाग है जहाँ पिछले कुछ समय से ‘अन्नदाता’ के नाम पर ‘स्वयंदाता’ (खुद की तिजोरी भरने वाले) बाबू राज कर रहे थे। विभाग की मौजूदा स्थिति किसी युद्धक्षेत्र से कम नहीं है, जहाँ एकता और भाईचारे की जगह केवल ‘प्रतिशोध’ और ‘प्रतिस्पर्धा’ का बोलबाला है।
मलाईदार कुर्सियों की जंग
यहाँ विकास के कामों के लिए फाइलें नहीं दौड़तीं, बल्कि ‘मलाईदार पटलों’ (लाभकारी पदों) को हथियाने के लिए साज़िशें दौड़ती हैं। अधिकारियों और बाबुओं के बीच असली होड़ इस बात की है कि कौन साहेब को कितना ‘कमीशन’ पहुँचा सकता है। जिसे जितनी अधिक वसूली की महारत हासिल है, उसी का पद उतना ही ‘मलाईदार’ है। कमाल तो यह है कि यहाँ काम के लिए नहीं, बल्कि एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए लाखों रुपये बहाए जा रहे हैं।
बाबुओं का ‘छद्म’ खेल
इस विभाग की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यहाँ शिकायतें बाहर से नहीं, बल्कि अंदर से आती हैं। भ्रष्ट बाबू खुद को बचाने के लिए छद्म नामों का सहारा लेते हैं और अपने ही साथियों को फँसाने के लिए निदेशालय की चौखट तक पहुँच जाते हैं। मजे की बात यह है कि निदेशालय के अधिकारियों को भी इसी बहाने अपनी जेबें भरने का मौका मिल जाता है। यह एक ऐसा मकड़जाल है, जहाँ हर कोई एक-दूसरे को शक की निगाह से देखता है।
सत्ता का अहंकार और पत्तों की तरह बिखरे ‘सूरमा’
जो बाबू कल तक खुद को ‘अजेय’ समझते थे और यह गुमान पाले बैठे थे कि उनका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता, इस बार वे ताश के पत्तों की तरह बिखर गए हैं। प्रशासनिक फेरबदल ने उन भ्रष्ट चेहरों को बेनकाब कर दिया है जो खुद को जिले का ‘सूरमा’ समझते थे। उन्हें न केवल अपनी मलाईदार कुर्सियों से हाथ धोना पड़ा, बल्कि जिले से बाहर का रास्ता भी देखना पड़ा।
विरासत में मिली ‘भ्रष्ट व्यवस्था’
प्रश्न अब यह उठता है कि क्या केवल चेहरों के बदलने से व्यवस्था सुधर जाएगी? जो नए लोग इन पदों पर काबिज हो रहे हैं, उन्हें विरासत में एक ‘सड़ी-गली’ और ‘भ्रष्ट प्रणाली’ मिली है। यदि उन्होंने समय रहते इस ढर्रे को नहीं बदला, तो वे भी उसी थाली के चट्टे-बट्टे बन जाएंगे।
कृषि विभाग का यह हाल देखकर यह कहना गलत न होगा कि यहाँ दोस्त कम, दुश्मन ज्यादा हैं। अगर यही ऊर्जा और पैसा किसान की उन्नति पर खर्च किया जाता, तो आज प्रदेश की तस्वीर कुछ और होती। लेकिन फिलहाल, यह विभाग ‘जनसेवा’ के बजाय ‘अपनों को ठिकाने लगाने’ का अड्डा बना हुआ है। अब देखना यह है कि क्या यह प्रशासनिक सर्जरी वाकई विभाग का कैंसर ठीक कर पाएगी, या फिर यह महज एक ‘हवा का रुख’ बनकर रह जाएगी?
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