
क्या बस्ती प्रशासन किसी बड़ी त्रासदी के इंतज़ार में है? सुरक्षा को ताक पर रखकर मौत का परोसा जा रहा खेल
‘तो’ क्या ‘लाशों’ के ‘ढेर’ लगने ‘पर’ होगी ‘कार्रवाई’ ? बस्ती: सुरक्षा मानकों की धज्जियाँ उड़ा रहे प्रतिष्ठान, क्या प्रशासन किसी बड़ी त्रासदी का इंतज़ार कर रहा है?
अजीत मिश्रा (खोजी)
‘लाखों’ की कमाई, पर सुरक्षा के नाम पर ‘शून्य’: क्या प्रशासन को और भी बड़ी दुर्घटना का इंतज़ार है?
- मौत के मुहाने पर खड़ा शहर: मैरिज हॉल से लेकर कोचिंग सेंटरों तक, सुरक्षा के नाम पर केवल धन उगाही!
- प्रशासन की नींद कब खुलेगी? बिना पंजीकरण और असुरक्षित रास्तों पर धड़ल्ले से चल रहे मौत के अड्डे।
- क्या अब ‘फाइलों’ में बंद होगी इंसानी जान? अवैध निर्माण और सुरक्षा की अनदेखी पर खामोश क्यों है जिम्मेदार महकमा?
बस्ती: क्या हमारे जिले का प्रशासन किसी बड़ी त्रासदी के इंतज़ार में बैठा है? सवाल कड़वा है, लेकिन स्थिति उससे भी भयावह है। शहर में धड़ल्ले से चल रहे मैरिज हॉल, कोचिंग सेंटर और अस्पताल, सुरक्षा के मानकों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं और प्रशासन केवल मूकदर्शक बना बैठा है।एक शहर, जहाँ हर मोड़ पर मौत खड़ी है और जिम्मेदार महकमे ‘सब ठीक है’ का चश्मा पहनकर चैन की नींद सो रहे हैं। बस्ती जिले की वर्तमान स्थिति किसी बारूद के ढेर पर बैठने जैसी हो गई है। यहाँ न तो प्रशासन को जनता की जान की फिक्र है और न ही उन ‘धनपशुओं’ को, जो सुरक्षा मानकों की धज्जियाँ उड़ाकर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं।
अखबारों की सुर्खियां और शहर की हकीकत एक ही ओर इशारा कर रही हैं—”क्या ‘लाखों’ की कमाई के बाद जब ‘लाशों’ का ढेर लगेगा, तब प्रशासन की नींद खुलेगी?”
सुरक्षा को ताक पर रखकर मौत का कारोबार
शहर में सराय एक्ट के तहत बिना पंजीकरण के मैरिज हॉल संचालित हो रहे हैं। कल्पना कीजिए, एक व्यस्त ओवरब्रिज के सर्विस रोड पर जहाँ ट्रैफिक का भारी दबाव रहता है, वहाँ एक साथ तीन-तीन मैरिज हॉल चल रहे हैं। उन तक पहुँचने का रास्ता मात्र 8-10 फिट का है। क्या किसी आपात स्थिति में यहाँ एम्बुलेंस या दमकल की गाड़ियाँ पहुँच पाएंगी? यदि आग जैसी कोई दुर्घटना होती है, तो वहां मौजूद सैकड़ों लोगों की जान का जिम्मेदार कौन होगा? सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कार्रवाई तभी होगी जब कोई बड़ी अनहोनी हो जाएगी और ‘लाशों के ढेर’ लग जाएंगे? जिस तरह से नियम-कानूनों को ताक पर रखकर प्रतिष्ठान चलाए जा रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि प्रशासन को किसी बड़ी घटना का इंतज़ार है। आज तक सीएफओ और प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से उन प्रतिष्ठानों के खिलाफ कोई ठोस अभियान नहीं चलाया गया, जो ‘मौत के मुहाने’ पर खड़े हैं।
प्रशासन और ‘धनपशुओं’ की मिलीभगत?
सवाल यह है कि आखिर प्रशासन इन पर कार्रवाई क्यों नहीं करता? क्या करोड़ों का निवेश करने वाले इन संचालकों के आगे प्रशासन नतमस्तक है? सीएफओ (CFO) से लेकर बीडीए (BDA) और अन्य जिम्मेदार विभागों का रवैया केवल ‘रिपोर्ट’ सौंपने तक सीमित है। धरातल पर, सुरक्षा के नाम पर कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आती।
मैरिज हॉल: मौत का नया अड्डा
शहर में सुरक्षा की अनदेखी का सबसे भयावह उदाहरण मैरिज हॉल हैं। लखनऊ के अग्निकांड से सबक लेने के बजाय, यहाँ के अधिकारी कुंभकर्णी नींद सो रहे हैं। एक उदाहरण देखिए—लखनऊ मार्ग पर ओवरब्रिज के सर्विस रोड के पास एक साथ तीन-तीन मैरिज हॉल चल रहे हैं।
- जर्जर व्यवस्था: इन तीनों मैरिज हॉलों के आने-जाने का रास्ता मात्र आठ से दस फिट चौड़ा है।
- असुरक्षित भीड़: लगन के दिनों में यहाँ कम से कम छह सौ लोग इकट्ठा होते हैं।
- भयावह स्थिति: यदि यहाँ कोई हादसा या अग्निकांड होता है, तो क्या यहाँ दमकल की गाड़ियाँ पहुँच पाएंगी? यहाँ एक बार में छह सौ लोगों की जान दांव पर लगी रहती है।
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है मानवीय सुरक्षा
आरोप है कि सुरक्षा और पंजीकरण के नाम पर केवल धन उगाही हो रही है। फायर ब्रिगेड से लेकर विद्युत विभाग और अन्य सरकारी एजेंसियां, अपना-अपना हिस्सा बटोरने में लगी हैं, जबकि शहर की जनता असुरक्षा के साये में जीने को मजबूर है। ओझा डायग्नोस्टिस और भव्य पैलेस जैसे कई संस्थान नियमों को दरकिनार कर चल रहे हैं, लेकिन प्रशासन की फाइलें शायद बंद हैं।खबर यह भी है कि ये प्रतिष्ठान सराय एक्ट के तहत भी पंजीकृत नहीं हैं, फिर भी धड़ल्ले से चल रहे हैं। सवाल उठता है कि जब ये अवैध हैं, तो इन्हें बिजली, अग्नि सुरक्षा और अन्य अनुमतियाँ कैसे मिल रही हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि फायर ब्रिगेड, बीडीए (BDA), और अन्य सरकारी विभाग केवल ‘धन उगाही’ का माध्यम बनकर रह गए हैं। हर विभाग अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहा है, जबकि ओझा डायग्नोस्टिस और भव्य पैलेस जैसे कई संस्थान खुलेआम नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं।
क्या प्रशासन सिर्फ रिपोर्ट बनाने के लिए है?
अधिकारी अक्सर अपना बचाव करते हुए कहते हैं कि वे रिपोर्ट भेज रहे हैं। लेकिन क्या रिपोर्ट से लोगों की जान बच जाएगी? सीएफओ का काम केवल कागजी रिपोर्ट तैयार करना नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यदि किसी प्रतिष्ठान में सुरक्षा के व्यापक इंतज़ाम नहीं हैं, तो उसे तत्काल प्रभाव से सील किया जाना चाहिए।
- सुरक्षा मानकों की घोर अनदेखी: जिले में कई प्रतिष्ठान, विशेषकर मैरिज हॉल, कोचिंग सेंटर और अस्पताल, सुरक्षा के मानकों का पालन किए बिना संचालित हो रहे हैं।
- प्रशासन की निष्क्रियता: प्रशासन और संबंधित विभाग (जैसे बीडीए और सीएफओ) अब तक इन प्रतिष्ठानों के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पाए हैं।
- मैरिज हॉलों का असुरक्षित संचालन: लखनऊ मार्ग पर एक ही स्थान पर तीन मैरिज हॉल चल रहे हैं, जहाँ आने-जाने का रास्ता मात्र 8-10 फुट चौड़ा है, जो किसी भी आपातकालीन स्थिति में बड़ा खतरा बन सकता है।
- पंजीकरण और अवैध निर्माण: कई संस्थान सराय एक्ट के तहत पंजीकृत नहीं हैं, इसके बावजूद वे खुलेआम काम कर रहे हैं और बीडीए द्वारा नियमों की अनदेखी कर अवैध निर्माण किए गए हैं।
- धन उगाही के आरोप: आरोप है कि विभिन्न विभाग सुरक्षा के नाम पर केवल धन उगाही कर रहे हैं और जनता की जान से समझौता कर रहे हैं।
- एक सकारात्मक उदाहरण: लखनऊ कांड के बाद वीर सावरकर लाइब्रेरी के संचालक मनीष मिश्र ने अपनी लाइब्रेरी को सुरक्षा कारणों से बंद करने का साहसी और जिम्मेदार कदम उठाया है।
- जिम्मेदारी का सवाल: लेख प्रशासन से स्पष्ट सवाल पूछ रहा है कि क्या वे किसी बड़ी दुर्घटना या ‘लाशों के ढेर’ लगने का इंतज़ार कर रहे हैं?
जिम्मेदार कौन?
वीर सावरकर लाइब्रेरी के संचालक मनीष मिश्र का उदाहरण हमारे सामने है, जिन्होंने लखनऊ अग्निकांड के बाद अपनी लाइब्रेरी को कुछ समय के लिए बंद करने का साहसी फैसला लिया। यदि एक व्यक्ति अपने जिले के लोगों के प्रति इतना संवेदनशील हो सकता है, तो जिम्मेदार अधिकारी क्यों नहीं?
इस अंधेरगर्दी के बीच, वीर सावरकर लाइब्रेरी के संचालक मनीष मिश्र का उदाहरण एक उम्मीद की किरण है। लखनऊ अग्निकांड के बाद उन्होंने स्वयं की पहल पर अपनी लाइब्रेरी को बंद करने का निर्णय लिया, क्योंकि वे जानते थे कि वहां का माहौल असुरक्षित है। यदि एक निजी व्यक्ति मानवीय संवेदना समझ सकता है, तो जिम्मेदार अधिकारी क्यों नहीं?समय रहते अगर इन असुरक्षित प्रतिष्ठानों को सील नहीं किया गया और सुरक्षा मानकों को सख्ती से लागू नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब बस्ती किसी बड़ी त्रासदी से कराह उठेगी।
प्रशासन को चेतावनी: क्या आप ‘लाशों’ की गिनती का इंतज़ार कर रहे हैं? अगर जनता की जान की कोई कीमत है, तो जागिए। इससे पहले कि कोई और घर उजड़े, अवैध और असुरक्षित प्रतिष्ठानों पर बुलडोजर चलना चाहिए। वरना इतिहास इस अनदेखी के लिए आपको कभी माफ नहीं करेगा।बस्ती की जनता आज मौत के साये में जीने को मजबूर है। यदि समय रहते इन असुरक्षित मैरिज हॉलों, कोचिंग सेंटरों और निजी अस्पतालों पर प्रशासन का डंडा नहीं चला, तो आने वाले समय में जो त्रासदियां होंगी, उसका पूरा कलंक उन अधिकारियों के माथे पर लगेगा जो आज अपनी कुर्सियों पर बैठकर फाइलें निपटाने में व्यस्त हैं।
चेतावनी: सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, अधिकार है। प्रशासन को ‘लाशों के ढेर’ का इंतज़ार बंद कर आज ही सख्त कदम उठाने होंगे।

















