बीडीए का ‘नोटिस’ माफिया: विकास के नाम पर ‘वसूली’ का काला साम्राज्य!

अजीत मिश्रा (खोजी)
‘बीडीए’ या ‘भ्रष्टाचार का अड्डा’? नोटिस के नाम पर करोड़ों की उगाही का काला सच
- क्या बीडीए बन चुका है ‘भ्रष्टाचार का अड्डा’? जानिए कैसे नोटिस के नाम पर हो रही है उगाही!
- नोटिस का डर, फिर पैसों की झंकार: क्या यही है बीडीए का ‘विकास’?
- बीडीए के भ्रष्ट साहबों पर कब चलेगा कानून का चाबुक? जनता पूछ रही सवाल!
बस्ती: क्या ‘बस्ती विकास प्राधिकरण’ (बीडीए) का काम शहर का विकास करना है या आम जनता की जेब काटकर अपने अधिकारियों की तिजोरी भरना? जिस विभाग का नाम ‘विकास’ के लिए जाना जाना चाहिए था, आज वह ‘विनाशकारी भ्रष्टाचार’ का पर्याय बन चुका है। विभाग में चल रहा ‘करोड़ों का खेल’ किसी से छिपा नहीं है, लेकिन अब यह खेल उस स्तर पर पहुंच चुका है जहाँ विभाग के अधिकारी खुलेआम कानून का मखौल उड़ा रहे हैं।
नोटिस: विकास नहीं, वसूली का हथियार!
बीडीए के अधिकारियों के लिए ‘नोटिस’ का मतलब कानून का पालन कराना नहीं, बल्कि मोटी कमाई का जरिया बन चुका है। सूत्रों के मुताबिक, करीब 100 ऐसे मामलों का खुलासा हुआ है जहाँ अवैध निर्माण करने वालों को नोटिस भेजने का डर दिखाकर भारी-भरकम ‘सुविधा शुल्क’ वसूला गया।
खेल का तरीका बेहद शातिर है:
- धमकी: अवैध निर्माण करने वालों को विध्वंस (ध्वस्तीकरण) की नोटिस का डर दिखाया जाता है।
- मोल-भाव: नोटिस आधिकारिक रूप से भेजी ही नहीं जाती, बल्कि किसी दलाल या व्यक्ति के जरिए संबंधित व्यक्ति को डराया जाता है।
- बंटवारा: दफ्तर के ‘साहब’ तय करते हैं कि किससे कितने लाख वसूलने हैं। जो जितना मोटा लिफाफा लेकर आता है, उसका काम उतनी ही आसानी से रफा-दफा हो जाता है।
राजकोष को चूना, अधिकारियों की जेब गर्म
अगर ये नोटिस नियमानुसार भेजी जातीं, तो करोड़ों का राजस्व सरकारी खजाने में जाता। लेकिन, बीडीए के भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों ने इस राजस्व को जनता के विकास में लगाने के बजाय आपस में ‘बंदरबांट’ कर लिया। विभाग की रणनीति ‘विकास’ पर नहीं, बल्कि यह तय करने पर केंद्रित रहती है कि ‘किसे बकरा बनाया जाए’ और किससे कितना अधिक धन ऐंठा जाए।
राजनीतिक संरक्षण और जिम्मेदार कौन?
इस पूरे गोरखधंधे को लेकर पूर्व कैबिनेट मंत्री राजकिशोर सिंह का नाम चर्चाओं में है। आरोप है कि उनके प्रभाव और संरक्षण के कारण ही बीडीए के कर्मचारी बेखौफ होकर इस लूट को अंजाम दे रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर कब तक जनता इस भ्रष्ट तंत्र की भेंट चढ़ती रहेगी?
क्या होगी कार्रवाई या रफा-दफा होगा मामला?
समाजवादी पार्टी के प्रेस वार्ता में भी यह मुद्दा जोर-शोर से उठा है। यदि इस पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्च-स्तरीय जांच हो, तो बीडीए के कई बड़े चेहरे बेनकाब हो सकते हैं। इसमें सचिव से लेकर एक्सीएन (XEN), जेई (JE) और एई (AE) तक, कई ‘बड़े साहब’ फंस सकते हैं।
अब समय आ गया है कि जिला प्रशासन अपनी चुप्पी तोड़े। क्या सरकार इस भ्रष्टाचार के कैंसर का ऑपरेशन करेगी, या फिर हमेशा की तरह इसे रफा-दफा करके मामले को दबा दिया जाएगा?
बस्ती की जनता बीडीए के इस ‘नोटिस कांड’ पर प्रशासन की अगली कार्रवाई का बेसब्री से इंतजार कर रही है।
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