एसडीएम पर हमला: सत्ता के संरक्षण में ‘दबी’ एफआईआर, प्रशासन मौन

अजीत मिश्रा (खोजी)
हरदोई में प्रशासनिक तंत्र पर हमला: एसडीएम पर पथराव के बावजूद आरोपी आजाद, सत्ता संरक्षण पर उठे गंभीर सवाल
- अन्नपूर्णा भवन निरीक्षण के दौरान एसडीएम पर हमला, कार्रवाई की फाइल सत्ता के गलियारों में ठंडी।
- भाजपा राज में एसडीएम भी नहीं सुरक्षित: परियल में पथराव, अपराधियों को किसका अभयदान?
- न कानून, न खौफ! एसडीएम पर हमला करने वालों पर मेहरबान प्रशासन
- सत्ता का अहंकार या पुलिस की लाचारी? शाहाबाद में हमलावरों पर कार्रवाई की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पा रहा प्रशासन?
- प्रशासनिक अधिकारी पर हमला: क्या अब ‘सत्ताधारी’ तय करेंगे कि किस पर एफआईआर होगी?
हरदोई (शाहाबाद): उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के शाहाबाद तहसील क्षेत्र में प्रशासनिक अराजकता और सत्ता के रसूख का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। शाहाबाद के एसडीएम सुशील कुमार मिश्र पर हुए सुनियोजित हमले के बाद, कार्रवाई के नाम पर प्रशासन की चुप्पी ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना के कई दिन बीत जाने के बाद भी हमलावरों पर एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई है, जिससे कानून व्यवस्था की स्थिति पर बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है।
घटना का विवरण: निरीक्षण के दौरान हुआ हमला
घटना सोमवार की है, जब एसडीएम सुशील कुमार मिश्र शाहाबाद के ग्राम परियल में सरकारी योजनाओं के निरीक्षण के लिए पहुंचे थे। उनका उद्देश्य ‘अन्नपूर्णा भवन’ और ‘मनरेगा’ से संबंधित कार्यों का जायजा लेना था। निरीक्षण के दौरान उन्हें पता चला कि आरसीसी सेंटर की बाउंड्रीवाल का निर्माण अधूरा है, जबकि उसका भुगतान पहले ही किया जा चुका है।
जब एसडीएम ने इस अनियमितता को लेकर संबंधित जिम्मेदारों से जवाब मांगा, तो विवाद बढ़ गया। आरोप है कि इस दौरान जिला पंचायत सदस्य लाला राम राजपूत और ग्राम प्रधान की पत्नी के समर्थकों ने एसडीएम को घेर लिया। एसडीएम के साथ गए गनर ने अपनी जान बचाने के लिए कारबाइन तानकर स्थिति संभालने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने प्रशासनिक अधिकारी के वाहन पर भी हमला कर दिया। इस पथराव में एसडीएम के सिर में गंभीर चोट आई।
आरोपियों का रसूख और प्रशासनिक ‘मौन’
इस मामले का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि एसडीएम पर जानलेवा हमले के बाद भी स्थानीय पुलिस और प्रशासन पूरी तरह मूकदर्शक बना हुआ है। सूत्रों के अनुसार, हमलावर सत्ताधारी दल (भाजपा) से जुड़े हुए हैं।
- FIR का अभाव: घटना के बाद से अब तक कोई भी औपचारिक रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई है।
- आरोपियों की खुली छूट: मीडिया रिपोर्टों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, मुख्य आरोपी और उनके समर्थक अभी भी गाँव में खुलेआम घूम रहे हैं।
- दबाव की राजनीति: चर्चा है कि प्रशासनिक कार्रवाई पर ‘सत्ता के शीर्ष’ का भारी दबाव है, जिसके कारण पुलिस चाहकर भी कोई ठोस कदम नहीं उठा पा रही है।
राजनीतिक गलियारों में हलचल
एसडीएम पर हुए इस हमले ने सूबे की राजनीति को गरमा दिया है। समाजवादी पार्टी के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा राज में प्रशासनिक अधिकारी तक सुरक्षित नहीं हैं। वहीं, बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कानून व्यवस्था की स्थिति पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस के जिलाध्यक्ष विक्रम पांडेय ने भी प्रशासन की इस चुप्पी को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए दोषियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई की मांग की है।
क्या बोले आरोपी पक्ष?
दूसरी तरफ, आरोपी जिला पंचायत सदस्य लाला राम राजपूत ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि उनका किसी से कोई राजनीतिक विरोध नहीं है। उनके अनुसार, यह विवाद अचानक उपजे हालात का परिणाम था और वे स्वयं इस घटना में शामिल नहीं थे। उन्होंने इस घटना को लेकर अपनी अलग ही दलीलें पेश की हैं।
निष्कर्ष: कानून के शासन के लिए चिंता का विषय
यह घटना इस बात का प्रमाण है कि यदि सत्ता का संरक्षण प्राप्त हो, तो सरकारी अधिकारी भी सुरक्षित नहीं हैं। एक प्रशासनिक अधिकारी, जो जनता की सेवा और सरकारी कार्य की निगरानी के लिए मौके पर मौजूद था, यदि वही हमले का शिकार हो और अपराधी बेखौफ घूमें, तो यह आम नागरिक के मन में कानून के प्रति विश्वास को कम करता है।
अब देखना यह है कि क्या शासन प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष जांच कर आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजता है, या फिर यह मामला भी ‘सत्ता के गलियारों’ में कहीं दबकर रह जाएगा।
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