स्वास्थ्य व्यवस्था की मौत: क्या सिद्धार्थनगर में ‘यमदूतों’ का लाइसेंस रद्द नहीं होगा?

अजीत मिश्रा (खोजी)
नवजात की मौत पर सवालों के घेरे में ‘जनता सेवा हॉस्पिटल’: क्या स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की मिलीभगत से चल रहा था मौत का खेल?
- सिद्धार्थनगर: बिना वैध NOC के चल रहा था जनता सेवा हॉस्पिटल, नवजात की मौत के बाद जांच पर उठे सवाल
- क्या कागजों तक सीमित है स्वास्थ्य विभाग की निगरानी? नवजात मौत मामले में अस्पताल प्रशासन पर कार्रवाई न होने से आक्रोश
- अस्पताल संचालन पर मची रार: राकेश यादव की भूमिका संदिग्ध, पीड़ित पक्ष अब हाईकोर्ट जाने की तैयारी में
- जांच से पहले बंद किया गया अस्पताल, डॉ. डाली शर्मा की अनुपस्थिति और प्रशासनिक लापरवाही पर खड़े हुए बड़े सवाल
सिद्धार्थनगर: इटवा क्षेत्र के ‘जनता सेवा हॉस्पिटल’ में एक नवजात शिशु की दर्दनाक मौत ने स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलकर रख दी है। इस घटना के बाद अस्पताल प्रबंधन न केवल सवालों के घेरे में है, बल्कि स्वास्थ्य विभाग और प्रशासनिक कार्यप्रणाली की निष्पक्षता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लग गए हैं।क्या हमारे शहर के अस्पतालों में इलाज के नाम पर सिर्फ मौत का सौदा हो रहा है? ‘जनता सेवा हॉस्पिटल’ में एक नवजात शिशु की मौत ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक लचरता की कलई खोलकर रख दी है। सवाल यह नहीं है कि बच्चा कैसे मरा, सवाल यह है कि एक अस्पताल बिना वैध NOC के इतने समय तक मरीजों की जान से खेल कैसे रहा था?
पीड़ित पक्ष की तहरीर पर इटवा थाने में मुकदमा दर्ज होने के बावजूद, अस्पताल के संचालन और जिम्मेदारियों को लेकर कई चौंकाने वाली बातें सामने आ रही हैं।
एक्सपायर हो चुका था NOC, फिर भी जारी था संचालन
सबसे बड़ा सवाल अस्पताल के संचालन की वैधता पर है। खबरों के अनुसार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से मिली अस्पताल की एनओसी (NOC) दिसंबर 2024 में ही समाप्त हो चुकी थी। इसके बावजूद अस्पताल का संचालन जारी रहा, जो सीधे तौर पर नियमों की धज्जियां उड़ाने और प्रशासन की लापरवाही को दर्शाता है। अब सवाल यह है कि बिना वैध कागजातों के अस्पताल कैसे चल रहा था और निगरानी व्यवस्था क्या केवल फाइलों तक ही सीमित रह गई थी?चौंकाने वाला खुलासा यह है कि इस अस्पताल का प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का NOC दिसंबर 2024 में ही खत्म हो चुका था। यदि NOC वैध नहीं था, तो अस्पताल का संचालन किसके इशारे पर जारी था? क्या जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी आंखें मूंदकर किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहे थे?
राकेश यादव की ‘संदिग्ध भूमिका’ और कॉल रिकॉर्ड्स की मांग
इस मामले में राकेश यादव का नाम बार-बार सामने आ रहा है। अस्पताल प्रबंधन का दावा है कि राकेश यादव का अस्पताल से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन वे लगातार मामले में सक्रिय दिख रहे हैं। उनकी इस संदिग्ध सक्रियता को देखते हुए अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि मामले की सच्चाई जानने के लिए राकेश यादव और संबंधित लोगों के मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) की गहन जांच होनी चाहिए, ताकि अस्पताल के वास्तविक संचालक और जिम्मेदारी का पता चल सके।इस पूरे मामले में राकेश यादव की संदिग्ध भूमिका और अस्पताल के वास्तविक संचालकों को लेकर उठ रहे सवाल गंभीर हैं।
- यदि राकेश यादव का अस्पताल से कोई संबंध नहीं है, तो वह मामले में इतने सक्रिय क्यों दिख रहे हैं?
- क्या जांच के दौरान राकेश यादव और संबंधित लोगों की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) की जांच नहीं होनी चाहिए, ताकि सच सामने आ सके?
- आरोप है कि जांच टीम के पहुंचने से पहले मरम्मत का बहाना बनाकर अस्पताल बंद कर दिया गया—क्या यह सबूत मिटाने की साजिश नहीं है?
जांच के नाम पर लीपापोती? प्रशासन पर लग रहे आरोपों की सूची लंबी है:
- आरोप है कि जांच टीम के पहुंचने से ठीक पहले अस्पताल में मरम्मत का काम दिखाकर उसे बंद कर दिया गया था।
- यह भी आरोप है कि घटना के समय डॉ. डाली शर्मा वहां मौजूद नहीं थीं, जिससे यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि उस समय चिकित्सकीय जिम्मेदारी किसकी थी।
- पूर्व में जिलाधिकारी द्वारा स्वास्थ्य विभाग, पुलिस और मजिस्ट्रेट की संयुक्त टीम को रूटीन जांच के निर्देश दिए गए थे, लेकिन इन निर्देशों का पालन धरातल पर होता नहीं दिखा।
अब ‘हाईकोर्ट’ जाने की तैयारी
सूत्रों के अनुसार, अस्पताल पर अभी तक ठोस कार्रवाई न होने से नाराज पीड़ित पक्ष अब मामले की निष्पक्ष जांच के लिए हाईकोर्ट जाने की तैयारी कर रहा है। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की जांच वर्तमान में जारी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह जांच केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी या फिर दोषियों को कठोर सजा मिलेगी?पूर्व में जिलाधकारी द्वारा स्वास्थ्य, पुलिस और मजिस्ट्रेट की संयुक्त टीम को रूटीन जांच के निर्देश दिए गए थे। तो फिर क्या वे निर्देश सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए थे? क्या निगहबानी की व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित रह गई है?
जनता यह पूछने पर मजबूर है कि आखिर बिना वैध NOC के अस्पताल को खुला रखने के लिए कौन जिम्मेदार है? अब समय लीपापोती का नहीं, बल्कि सीधे दोषियों पर कार्रवाई का है। अन्यथा, पीड़ित पक्ष को न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने को मजबूर होना ही पड़ेगा।
जनता अब केवल दिखावे की जांच नहीं, बल्कि वास्तविक कार्रवाई और दोषियों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कदम चाहती है, ताकि भविष्य में किसी और मासूम की जान इस तरह के ‘अवैध’ तंत्र की भेंट न चढ़े।
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