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वन्दे मातरम् एकता का महामंत्र है, विभाजनकारी मानसिकता के आगे अब देश सरेंडर नहीं करेगा — अरविन्द सिसोदिया

22 Aug 2026, 09:04 PM • Vande Bharat Live TV News
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कोटा। राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल, जयपुर के शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी एवं वरिष्ठ बुद्धिजीवी अरविन्द सिसोदिया ने कहा कि ‘वन्दे मातरम्’ केवल एक गीत या कुछ शब्दों का समूह नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता की चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय स्वाभिमान का शक्तिशाली महामंत्र है। इसमें राष्ट्रीय, सांस्कृतिक एवं सामाजिक एकता की गजब की महाशक्ति है। उन्होंने कहा कि भारत लाखों वर्षों से चली आ रही जीवंत, चैतन्य और सनातन सांस्कृतिक परंपरा वाला अत्यंत पुरातन राष्ट्र है।

स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना से जुड़ा महामंत्र

सिसोदिया ने कहा कि किसी भी संप्रभु राष्ट्र का अस्तित्व उसके स्वाभिमान और राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा से जुड़ा होता है। भारत के संदर्भ में ‘वन्दे मातरम्’ ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जनमानस में राष्ट्रीय चेतना और स्वाधीनता की भावना को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न चरणों में इसकी गूंज राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रीय स्वाभिमान की सर्वोच्चता एवं मातृभूमि की स्वतंत्रता की आकांक्षा की भावना से जुड़ी रही।

वन्दे मातरम् में एकता का महामंत्र है

सिसोदिया ने कहा कि वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के विरुद्ध उठे आंदोलन में ‘वन्दे मातरम्’ राष्ट्रीय एकता का प्रभावशाली उद्घोष बना। इसने जाति, पंथ, भाषा और प्रांत के भेदों से ऊपर उठकर लोगों को एक साझा राष्ट्रीय भावना से जोड़ने का कार्य किया, जिससे अंततः बंग-भंग रद्द हुआ था और बंगाल फिर से एक हो गया था।

सिसोदिया ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के अनेक सेनानियों ने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया और अंग्रेजी शासन के दमन का सामना किया। ‘वन्दे मातरम्’ उस दौर की राष्ट्रीय चेतना और संघर्ष की स्मृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। अंग्रेजी शासन द्वारा इसके उद्घोष पर प्रतिबंध लगाने के प्रयास भी इस बात को दर्शाते हैं कि यह महामंत्र जनता में स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वाभिमान की भावना को पुरजोर उद्देलित करता था।

राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक तुष्टिकरण से मुक्त रखने की आवश्यकता

सिसोदिया ने कहा कि राष्ट्रीय प्रतीकों और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को राजनीतिक तुष्टिकरण की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रभावना से जुड़े विषयों पर निर्णय वोट बैंक और तुष्टिकरण की राजनीति के आधार पर होने चाहिए?

उन्होंने कहा कि भारत का लोकतंत्र सभी नागरिकों के समान सम्मान और अधिकारों पर आधारित है। इसलिए राष्ट्र के प्रतीकों के सम्मान का दायित्व भी प्रत्येक नागरिक का समान रूप से होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता का अर्थ राष्ट्रीय स्वाभिमान अथवा सांस्कृतिक विरासत से विमुख होना नहीं है। न ही बहुसंख्यक समाज की उपेक्षा का किसी को अधिकार देता है।

‘वन्दे मातरम्’ की गरिमा अक्षुण्ण रहनी चाहिए

सिसोदिया ने कहा कि ‘वन्दे मातरम्’ भारत की नदियों, वनों, शस्य-श्यामला धरती और मातृभूमि के प्रति श्रद्धा एवं समर्पण की अभिव्यक्ति है। यह स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों और भारतीय सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि ‘वन्दे मातरम्’ के प्रति सम्मान किसी राजनीतिक दल अथवा विचारधारा का विषय नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संघर्ष और राष्ट्रीय विरासत के प्रति सम्मान का विषय है। इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को राजनीतिक सुविधा के अनुसार सीमित करना उचित नहीं होगा।

‘वन्दे मातरम्’ के विभाजन से लेकर देश के विभाजन तक

वरिष्ठ बुद्धिजीवी सिसोदिया ने कहा कि कांग्रेस ने यदि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ‘वन्दे मातरम्’ गीत के विरोध और विभाजन और उसके मूल स्वरूप को सीमित करने की मांग को दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया होता, तो देश के विभाजन की मानसिकता को उसी समय कड़ा जवाब मिल जाता और देश विभाजन से बच जाता। राष्ट्रहित के साथ मजबूती से खड़े होने में जो चूक उस समय हुई, वह अभी तक नासूर बनी हुई है।

उन्होंने कहा कि जिस समय भारत को जाति, भाषा, प्रांत और मजहब के आधार पर बांटने की राजनीति आकार ले रही थी, उस समय राष्ट्रीय एकता के प्रतीकों के साथ समझौते करने के बजाय दृढ़ता से अखंड राष्ट्र के पक्ष में खड़ा होना आवश्यक था। यदि तत्कालीन नेतृत्व ने तुष्टिकरण की राजनीति के स्थान पर राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी होती, तो इतिहास की दिशा अलग हो सकती थी। भारत अखंड स्वतंत्र होता।

सिसोदिया ने कहा कि आज आवश्यकता है कि अतीत की उन राजनीतिक भूलों से सबक लिया जाए और राष्ट्रीय प्रतीकों, सांस्कृतिक विरासत तथा राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर किसी भी प्रकार के दबाव या तुष्टिकरण को स्वीकार न किया जाए। देश का विभाजन और ‘वन्दे मातरम्’ गीत का विभाजन, हमें यह संदेश देते हैं कि राष्ट्रीय एकता के प्रतीकों से किया गया समझौता भविष्य में देश को गंभीर खतरा उत्पन्न करता है।

नया भारत अपनी विरासत के प्रति आत्मविश्वासी

सिसोदिया ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदीजी के नेतृत्व में आज का भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान, ऐतिहासिक विरासत और राष्ट्रीय स्वाभिमान को लेकर न तो कोई समझौता करता है, न ही किसी तुष्टिकरणवादी दबाव को सहन करता है। अब भारत पहले से अधिक सजग और आत्मविश्वासी है। वहीं आधुनिकता, विज्ञान और विकास के क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। किन्तु उसने अपनी सांस्कृतिक जड़ों और राष्ट्रीय अस्मिता को गहराई से संरक्षित किया है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्र की एकता, अखंडता और स्वाभिमान सर्वोपरि हैं। ‘वन्दे मातरम्’ की गरिमा को अक्षुण्ण रखना स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानियों और भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान का विषय है। इससे कतई समझौता या किंतु-परंतु स्वीकार नहीं किया जा सकता।

अरविंद सिसोदिया ने कहा कि विभाजनकारी ताकतों की संतुष्टि करने की राजनीति ने पहले भी देश विभाजित किया है। अब भी इस मानसिकता के बाहर नहीं निकला गया तो नए खतरों को न्योता देना होगा। उन्होंने कहा कि ‘वन्दे मातरम्’ भारत की स्वतंत्रता की चेतना, संस्कृति और राष्ट्रीय स्वाभिमान की गूंज है और इसकी गरिमा का संरक्षण हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। इसी में देश की मजबूती है।

 

 

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