स्वास्थ्य विभाग में ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों की पोल: बस्ती में लखनऊ मेडिकल कॉलेज द्वारा ब्लैकलिस्टेड फर्म ‘पीओ सिटी’ को 500 करोड़ का रीजेंट ठेका बिना टेंडर के देने का गंभीर मामला।

अजीत मिश्रा (खोजी)
जीरो टॉलरेंस के दावों के बीच 500 करोड़ का ‘काला’ खेल: कौन बचा रहा है ब्लैकलिस्टेड ‘पीओ सिटी’ को?
- ‘क्लोज सिस्टम’ मशीनों का तकनीकी जाल: सरकारी अस्पतालों में ‘क्लोज सिस्टम’ मशीनें लगवाकर केवल एक ही फर्म से रीजेंट खरीदने की विवशता पैदा करना और भारत सरकार की गाइडलाइन को दरकिनार करना।
- उत्पादन न करने वाली कंपनी को 5 साल का अनुबंध: जो कंपनी रीजेंट का निर्माण ही नहीं करती, उसे बिना हर साल टेंडर निकाले पांच साल का ठेका देना और मेडिकल कॉरपोरेशन के एमडी की संदिग्ध भूमिका।
- अधिकारियों के संरक्षण में नियमों की धज्जियां: सीएमएस के सख्त निर्देशों के बावजूद अस्पतालों में ‘पीओ सिटी’ के कर्मचारियों द्वारा लैब का संचालन और प्रशासनिक अमले की चुप्पी पर उठे बड़े सवाल।
बस्ती: उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का विरोधाभास अब किसी से छिपा नहीं है। जब लखनऊ मेडिकल कॉलेज द्वारा ब्लैकलिस्टेड की गई एक प्राइवेट फर्म ‘पीओ सिटी’ को नियमों को दरकिनार कर पांच सौ करोड़ रुपये के रीजेंट का ठेका दे दिया जाए, तो व्यवस्था के इमानदारी पर सवाल उठना लाजिमी है। बस्ती से लेकर राजधानी तक गूंज रही इस चर्चा ने प्रशासनिक तंत्र की पोल खोलकर रख दी है।
इस पूरे खेल का सबसे खतरनाक पहलू इसका तकनीकी जाल है। प्रदेश भर के सरकारी अस्पतालों में सोची-समझी रणनीति के तहत ‘क्लोज सिस्टम’ लैब की मशीनें सप्लाई की गईं, ताकि अस्पताल मजबूरन केवल ‘पीओ सिटी’ से ही रीजेंट खरीदने को विवश हों। यदि भारत सरकार की गाइडलाइन का पालन करते हुए ‘ओपन सिस्टम’ की मशीनें लगाई जातीं, तो अस्पताल किसी भी फर्म से रीजेंट खरीद सकते थे और प्रतिस्पर्धा के चलते सरकारी धन की बचत होती। लेकिन, ब्लैकलिस्टेड फर्म को उपकृत करने के लिए इस रास्ते को बंद कर दिया गया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो कंपनी रीजेंट का निर्माण ही नहीं करती, उसे पांच साल के लिए बिना हर साल टेंडर निकाले यह अनुबंध कैसे थमा दिया गया? मेडिकल कॉरपोरेशन के एमडी से लेकर स्थानीय स्तर पर सीएमएस और अन्य अधिकारियों की भूमिका पर गहरे संदेह के बादल मंडरा रहे हैं। स्थिति यह है कि अस्पतालों में सीएमएस के सख्त निर्देशों के बावजूद ‘पीओ सिटी’ के कर्मचारियों द्वारा लैब का संचालन और रीजेंट के खेल बेरोकटोक जारी हैं।
चर्चाएं यहां तक हैं कि इस पूरे सिंडिकेट को बचाने के लिए निचले स्तर से लेकर सत्ता के गलियारों तक के तार जुड़े हुए हैं। जब एक ब्लैकलिस्टेड फर्म को सैकड़ों करोड़ का अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए बड़े स्तर पर ‘प्रबंधन’ हो सकता है, तो आम जनता का सिस्टम से भरोसा उठना स्वाभाविक है। यदि सरकार की नीति सचमुच भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की है, तो अब तक इस अवैध अनुबंध को निरस्त क्यों नहीं किया गया? और उन जिम्मेदार अधिकारियों पर अब तक कठोर कार्रवाई क्यों नहीं हुई, जिन्होंने नियमों की धज्जियां उड़ाकर इस महाघोटाले को हरी झंडी दिखाई? जनता और व्यवस्था दोनों के लिए यह स्थिति गंभीर आत्ममंथन की मांग करती है।
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