विशेष महा-पड़ताल सहारनपुर | कलेक्ट्रेट मस्जिद विध्वंस के बाद मिले 20 फीट गहरे कुएं का ऐतिहासिक सच

विशेष महा-पड़ताल सहारनपुर | कलेक्ट्रेट मस्जिद विध्वंस के बाद मिले 20 फीट गहरे कुएं का ऐतिहासिक सच
सहारनपुर कलेक्ट्रेट में मिले कुएं की 250 वर्ष पुरानी पुरातात्विक जड़ों ने छेड़ा इतिहास का सबसे बड़ा सवाल: रोहिल्ला, मराठा या ब्रिटिश हुकूमत—1776 से 1826 के बीच किसका था शासन? 1909 के नेविल गजेटियर और मुहाफ़िज़खाने के दबे रिकॉर्ड्स से खुलेगा असली राज

उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग के अधिकारी डॉ. मनोज कुमार यादव की जांच के बाद गरमाई बहस; 20 फीट गहरे कुएं में लाखौरी ईंटों और 1909 के संकेतों ने खींचा सबका ध्यान; मुग़ल बादशाह शाहजहां के काल का कोई सीधा प्रमाण नहीं; 250 साल पुराने इतिहास के पन्नों में दर्ज रोहिल्ला सरदारों, मराठा सिंधिया सल्तनत और ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर के दस्तावेज खंगालने की कानूनी मांग
विशेष विस्तृत रिपोर्ट: एलिक सिंह / वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़, सहारनपुर
सहारनपुर। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद में कलेक्ट्रेट परिसर स्थित 119 साल पुरानी विवादित मस्जिद के प्रशासनिक ध्वस्तीकरण के बाद जमीन के गर्भ से निकले करीब 20 फीट गहरे और लगभग 3 फीट व्यास वाले पुराने कुएं ने प्रशासनिक, कानूनी और सियासी गलियारों में ऐतिहासिक भूचाल ला दिया है। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग की टीम द्वारा किए गए स्थलीय मुआयने और सहायक पुरातत्व अधिकारी डॉ. मनोज कुमार यादव के स्वयं कुएं की गहराई में उतरकर किए गए प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह ढांचा करीब 200 से 250 वर्ष पुराना यानी ‘उत्तर मध्यकालीन’ (Late Medieval Period) कालखंड का है।
इस खुलासे के साथ ही सबसे बड़ा ऐतिहासिक यक्ष प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि आज से ठीक 200 से 250 वर्ष पूर्व—यानी सन् 1776 से 1826 ईस्वी के बीच—सहारनपुर की सरजमीं पर किसकी हुकूमत थी? क्या कलेक्ट्रेट परिसर का यह भूभाग उस वक्त किसी सैन्य छावनी, सराय, प्रशासनिक कचहरी या आबादी का हिस्सा था? और क्या उस दौर के राजस्व नक्शों व गजेटियर में इस कुएं का कोई आधिकारिक अंकन मौजूद है?
1. 200 से 250 वर्ष पूर्व (1776–1826): सहारनपुर का सबसे उथल-पुथल भरा खूनी इतिहास
इतिहास के प्रमाणित साक्ष्यों का विश्लेषण करें तो आज से 200 से 250 वर्ष पूर्व की यह समयावधि (1776 से 1826 ई.) सहारनपुर के पूरे इतिहास का सबसे हलचल भरा, रणनीतिक और राजनीतिक उथल-पुथल का दौर था। इस 50 वर्ष के कालखंड में सहारनपुर किसी एक सत्ता के हाथ में स्थिर नहीं रहा, बल्कि यह इलाका रोहिल्ला अफगानों, मराठा साम्राज्य और अंततः ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के त्रिकोणीय संघर्ष का केंद्र बना रहा।
पहला चरण: रोहिल्ला पठानों का वर्चस्व (1776 – 1788 ई.) अठारहवीं सदी के अंतिम दशकों में जब दिल्ली का मुग़ल साम्राज्य पूरी तरह कमजोर हो चुका था, तब सहारनपुर ‘बावनी सरकार’ के रूप में रोहिल्ला सरदारों के प्रत्यक्ष नियंत्रण में था। नवाब नजीब-उद-दौला और उनके पुत्र जाबिता खान ने इस पूरे दोआब क्षेत्र पर अपनी मजबूत सैन्य और प्रशासनिक पकड़ बनाई थी। जाबिता खान के निधन (1785 ई.) के बाद उसका बेटा गुलाम कादिर रोहिल्ला सहारनपुर का नवाब बना। गुलाम कादिर ने ही 1788 में दिल्ली के लाल किले पर चढ़ाई कर तत्कालीन मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय को अंधा कर दिया था। इस दौर में सहारनपुर की सरजमीं पर सैन्य छावनियों, मजबूत गढ़ियों और पेयजल के लिए लाखौरी ईंटों व सुर्खी-चूने से बने दर्जनों कुओं का निर्माण कराया गया था।
दूसरा चरण: मराठा साम्राज्य और सिंधिया सल्तनत का आधिपत्य (1788 – 1803 ई.) गुलाम कादिर के खूनी उत्पात का बदला लेने के लिए ग्वालियर के मराठा शासक महादजी सिंधिया ने अपनी विशाल सेना सहारनपुर भेजी। मराठों ने गुलाम कादिर को बंदी बनाकर मौत के घाट उतारा और 1788 में सहारनपुर पर मराठा साम्राज्य का सीधा भगवा परचम लहराया। वर्ष 1788 से 1803 तक पूरे 15 वर्षों तक सहारनपुर सिंधिया रियासत का अहम रणनीतिक ठिकाना रहा। इस दौरान सिंधिया के यूरोपीय और फ्रांसीसी सैन्य जनरलों—विशेषकर जनरल बेनोइट डी बोइग्ने (General Benoît de Boigne) और बाद में जनरल पियरे कुलियर-पेरॉन (General Pierre Cuillier-Perron)—ने सहारनपुर की राजस्व व्यवस्था, किलों और प्रशासनिक निर्माणों का संचालन किया।
तीसरा चरण: ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की आमद और सुरजी-अंजनगांव की संधि (1803 ई.) वर्ष 1803 में जब द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध छिड़ा, तो ब्रिटिश सेनापति लॉर्ड लेक ने अलीगढ़ और दिल्ली के युद्धों में मराठा सेना को पराजित किया। इसके बाद 30 दिसंबर 1803 को दौलतराव सिंधिया और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच ऐतिहासिक ‘सुरजी-अंजनगांव की संधि’ (Treaty of Surji-Anjangaon) पर हस्ताक्षर हुए। इस संधि के तहत गंगा और यमुना के बीच का पूरा दोआब क्षेत्र—जिसमें सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और मेरठ शामिल थे—हमेशा के लिए ब्रिटिश हुकूमत के हवाले कर दिया गया।
चौथा चरण: सहारनपुर जिले की विधिवत स्थापना और कलेक्ट्रेट की नींव (1804 – 1826 ई.) कब्जा होते ही अंग्रेजों ने रणनीतिक महत्व को देखते हुए वर्ष 1804 में सहारनपुर को एक अलग प्रशासनिक जिले का रूप दिया और मिस्टर डी. गथरी (D. Guthrie) को सहारनपुर का पहला ब्रिटिश कलेक्टर व मजिस्ट्रेट नियुक्त किया गया। ठीक इसी कालखंड (1804 से 1826) में वर्तमान कलेक्ट्रेट, सिविल लाइन्स, ट्रेजरी, जेल और कंपनी बाग (बॉटनिकल गार्डन) की प्रशासनिक सीमाओं की नींव रखी गई थी। 1814-1816 के आंग्ल-नेपाल (गोरखा) युद्ध के दौरान भी सहारनपुर अंग्रेजों की उत्तरी कमान का सबसे बड़ा प्रशासनिक और रसद आपूर्ति केंद्र था।
2. शाहजहां काल के दावे खारिज, लेकिन 1909 की ईंटों ने उलझाया गणित
कलेक्ट्रेट परिसर में कुआं मिलने के बाद कुछ स्थानीय हलकों में इसे मुग़ल बादशाह शाहजहां के काल से जोड़ने के दावे किए जा रहे थे। हालांकि, राज्य पुरातत्व विभाग के सहायक अधिकारी डॉ. मनोज कुमार यादव ने मौके की जांच के बाद साफ कर दिया कि फिलहाल शाहजहां के दौर की नक्काशी, पत्थर या स्थापत्य शैली का कोई सीधा प्रमाण यहां नहीं मिला है।
लेकिन इस जांच में सबसे चौंकाने वाला पहलू तब सामने आया, जब कुएं की ऊपरी संरचना और दीवारों में पारंपरिक पतली लाखौरी ईंटों के साथ-साथ वर्ष 1909 से जुड़ी ईंटों और निर्माण शैली के संकेत मिलने की बात सामने आई। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि वैज्ञानिक परीक्षण में 1909 की ईंटों की पुष्टि होती है, तो यह सीधा संकेत करता है कि:
1. मूल कुआं 200 से 250 वर्ष पूर्व (रोहिल्ला या मराठा कालखंड) में खुदा था।
2. बाद में ब्रिटिश हुकूमत के दौर में वर्ष 1909 के आसपास इसका जीर्णोद्धार (Repairing/Renovation) कराया गया था।
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि 1906 का वह दौर ब्रिटिश भारत में किंग एडवर्ड सप्तम का शासनकाल और वायसराय लॉर्ड मिंटो का प्रशासनिक युग था। उस समय सहारनपुर कलेक्ट्रेट एक पूर्ण विकसित प्रशासनिक केंद्र था। ऐसे में यह सवाल बेहद गहरा हो जाता है कि क्या 1909 में कलेक्ट्रेट के किसी सरकारी या प्रशासनिक विस्तार के चलते इस कुएं की मरम्मत की गई थी?
3. कहां से हो सकती है इसकी आधिकारिक पुष्टि? ये हैं 5 सबसे बड़े ऐतिहासिक स्रोत
सहारनपुर कलेक्ट्रेट की इस जमीन और कुएं के मूल इतिहास को प्रमाणित करने के लिए अब सरकारी दावों के बजाय प्राथमिक और अभिलेखीय साक्ष्यों की ओर देखा जा रहा है। जानकारों के मुताबिक, निम्नलिखित पांच स्रोतों से इस मामले का सौ फीसदी विधिक व ऐतिहासिक समाधान निकल सकता है:
1. एच. आर. नेविल का ‘सहारनपुर डिस्ट्रिक्ट गजेटियर’ (1909): वर्ष 1909 में आईसीएस अधिकारी एच. आर. नेविल द्वारा यूनाइटेड प्रोविंसेज ऑफ आगरा एंड अवध के तहत सहारनपुर का अधिकृत गजेटियर तैयार किया गया था। इस गजेटियर के अध्याय-V (इतिहास) और प्रशासनिक संरचनाओं के विवरण में कलेक्ट्रेट परिसर, सिविल लाइन्स के कुओं और सरकारी जमीनों का विस्तृत खाका मौजूद है।
2. एडविन टी. एटकिंसन का ऐतिहासिक गजेटियर (1875): ‘नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविंसेज गजेटियर (वॉल्यूम II)’ में मेरठ डिवीजन और सहारनपुर के परगनों का बारीक ब्योरा है, जिसमें 1803 से पूर्व मराठों और रोहिल्लाओं द्वारा बनवाए गए निर्माणों और कुओं का सांख्यिकीय रिकॉर्ड दर्ज है।
3. सहारनपुर कलेक्ट्रेट का मुहाफ़िज़खाना (रिकॉर्ड रूम): सहारनपुर कलेक्ट्रेट के अपने रिकॉर्ड रूम में ब्रिटिश हुकूमत के शुरुआती बंदोबस्त मिसल (Early Settlement Records 1804–1835), ‘वजह-ए-तहसील’ और 1906 के आसपास तैयार हुए मौजावार नक्शे (कैडस्ट्रल मैप्स) मौजूद हैं। इन नक्शों में यह साफ दर्ज होता है कि संबंधित खसरा नंबर पर कुआं था, नजूल की जमीन थी, या कोई धार्मिक ढांचा।
4. उत्तर प्रदेश राज्य अभिलेखागार (UP State Archives, लखनऊ): लखनऊ स्थित राज्य अभिलेखागार में 18वीं और 19वीं सदी के दौरान ईस्ट इंडिया कंपनी, रुहेलखंड रेजिडेंसी और अवध के बीच हुए फारसी व उर्दू पत्राचार (Persian Records) सुरक्षित हैं, जो यह साबित कर सकते हैं कि 1780 से 1804 के बीच इस जमीन का वास्तविक स्वरूप क्या था।
5. सर जदुनाथ सरकार की पुस्तक ‘फॉल ऑफ द मुगल एम्पायर’: महान इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार द्वारा रचित यह ग्रंथ 1770 से 1803 के बीच सहारनपुर में रोहिल्ला नवाबों और मराठा जनरल सिंधिया के बीच लड़े गए युद्धों और उस दौरान बने सैन्य ठिकानों का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज माना जाता है।
4. कानूनी लड़ाई और राजस्व अभिलेखों की मांग
इस ऐतिहासिक और पुरातात्विक रहस्योद्घाटन के बीच कानूनी हलकों में भी सरगर्मी बढ़ गई है। कलेक्ट्रेट मस्जिद प्रकरण में पहले से ही प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठा रहे पक्षकारों की ओर से अब 5 सितंबर 2026 को वरिष्ठ अधिवक्ता साजिद मलिक ने सहारनपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) को विधिवत प्रार्थना-पत्र देकर जमीन के मूल राजस्व रिकॉर्ड्स, 1906 के ब्रिटिश दस्तावेज और ऐतिहासिक नक्शे सार्वजनिक करने की मांग की है।
अधिवक्ताओं का कहना है कि जब पुरातत्व विभाग खुद इस संरचना को 200 से 250 वर्ष पुराना मान रहा है, तो बिना ब्रिटिशकालीन बंदोबस्त रिकॉर्ड और गजेटियर का परीक्षण किए किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता। वहीं, दूसरी ओर पुरातत्व विभाग का स्पष्ट कहना है कि कुएं के अंदर भारी मलबा जमा होने के कारण अभी उसकी संपूर्ण गहराई और तलहटी की निर्माण शैली का वैज्ञानिक विश्लेषण बाकी है। मलबे की सफाई और वैज्ञानिक जांच के बाद तैयार होने वाली विस्तृत रिपोर्ट को सीधे अदालत के समक्ष पेश किया जाएगा।
निष्कर्ष: दावों की सियासत पर भारी पड़ेंगे गर्भगृह के दस्तावेज
कलेक्ट्रेट परिसर में मिला यह 20 फीट गहरा कुआं अब केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं रहा, बल्कि यह सहारनपुर के उस 250 साल पुराने इतिहास का जीवंत गवाह बन चुका है, जिसने रोहिल्ला नवाबों की तलवारें देखीं, मराठा सिंधिया साम्राज्य की तोपों की गूंज सुनी और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की हुकूमत का दौर देखा।
अब देखना यह होगा कि उत्तर प्रदेश पुरातत्व विभाग की अंतिम वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट और 1909 के नेविल गजेटियर के पन्ने जब कोर्ट के सामने खुलेंगे, तो 1776 से 1826 के बीच के इस सबसे बड़े ऐतिहासिक राज से पर्दा किस तरह उठता है।
🚨 250 साल पुराना इतिहास: पुरातत्व विभाग की जांच में कुआं 1776 से 1826 ईस्वी के बीच का साबित; रोहिल्ला और मराठा शासनकाल के सीधे संकेत।
🔥 1909 की ईंटों का रहस्य: क्या ब्रिटिश हुकूमत (लॉर्ड मिंटो काल) में हुआ था कुएं का जीर्णोद्धार? 1909 के नेविल गजेटियर से होगी पुष्टि।
⚡ शाहजहां काल का दावा खारिज: सहायक पुरातत्व अधिकारी डॉ. मनोज कुमार यादव बोले—मुग़ल स्थापत्य के नहीं मिले कोई ठोस साक्ष्य।
⚖️ अदालत में जाएगी रिपोर्ट: कुएं के अंदर से मलबा हटाकर विस्तृत वैज्ञानिक जांच के बाद तैयार रिपोर्ट कोर्ट में होगी दाखिल।
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✍️ विशेष ग्राउंड रिपोर्ट व ऐतिहासिक शोध: एलिक सिंह 📍 वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़, सहारनपुर 📞 खबर, विज्ञापन, विज्ञप्ति एवं सूचना के लिए संपर्क सूत्र: 8217554083
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