वन ग्राम मालेगांव में गूंजे डोलार के गीत आदिवासी परंपरा से बनाया गया पोला पर्व

*वनग्राम मालेगांव में गूंजे डोलार के गीत,आदिवासी परंपरा से मनाया गया पोला पर्व*
हरियाली अमावस्या के बाद वनांचल में पोला पर्व की रौनक देखते ही बन रही है। इसी क्रम में वनग्राम मालेगांव में कोरकू और गोंड समुदाय ने अपनी आदिवासी संस्कृति के अनुरूप पोला पर्व को बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया।
पर्व का मुख्य आकर्षण रहा पारंपरिक डोलार पर्व। गांव की महिलाओं ने लकड़ी और बांस से बना विशाल झूला हरी बेलों, पत्तियों और फूलों से सजाया।
ढोलक, टिमकी और बांसुरी की मधुर थाप पर रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाओं ने डोलार पर झूलते हुए सुमधुर लोकगीत गाए। गीतों में सावन की हरियाली,प्रकृति,भाई-बहन के प्रेम और ग्रामीण जीवन की भावनाएं गूंजती रहीं।
कार्यक्रम के अंत में परंपरा अनुसार डोलार को गांव की नदी में विसर्जित किया गया। गांव के भोमका सीताराम धुर्वे ने बताया कि हरियाली अमावस्या से ही डोलार बनाने की तैयारी शुरू हो जाती है।
महिलाएं प्रतिदिन सुबह-शाम इस झूले पर लोकगीत गाते हुए झूलती हैं। पोला पर्व तो सभी मनाते हैं,परंतु पोला के दिन झूला विसर्जन की यह अनूठी परंपरा विशेष रूप से कोरकू समाज में निभाई जाती है।
गांव के बुजुर्ग श्री सद्दू आहके ने बताया कि इस अवसर पर प्रत्येक घर में शाम को महुआ के लड्डू बनाए जाते हैं,
बैलों की पूजा कर उन्हें लड्डू खिलाए जाते हैं। सुबह बड़ादेव, पूर्वजों और देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती है और शाम को डोलार विसर्जन के साथ युवक-युवतियां लोकगीतों पर सामूहिक नृत्य करते हैं।
भाजपा मंडल कायदा अध्यक्ष सतीश इवने ने कहा कि डोलार केवल झूला नहीं, बल्कि कोरकू समाज की लोक-स्मृति, संस्कृति और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है। यह परंपरा कोई लिखित साहित्य नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ने वाली सांस्कृतिक धरोहर है।
इस अवसर पर रामबकस धुर्वे, श्रीराम धुर्वे, अखिलेश धुर्वे, रामरतन उइके, गब्बू आहके, अर्जुन आहके सहित बड़ी संख्या में कोरकू व गोंड समुदाय के ग्रामीण उपस्थित रहे। District harda se jaydeep rathore ki report
🔔 Vande Bharat News Alerts
नई प्रमुख खबरों की browser notification पाने के लिए Subscribe करें।






