बाल लीला का आग्रह: माता कौशल्या के आग्रह पर प्रभु ने बाल रूप धारण किया। इसके बाद माता कौशल्या से श्रीरामचंद्र जी, महारानी कैकेई से भरत जी तथा महारानी सुमित्रा से लक्ष्मण जी और शत्रुघ्न जी का जन्म हुआ।
महादेव-काकभुशुंडि जी का आगमन और नामकरण प्रसंग
रामचरितमानस की चौपाइयों के बीच लीला में गुप्त रूप से भगवान शिव और काकभुशुंडी जी के मनुष्य रूप धारण कर प्रभु की बाल लीला देखने अयोध्या पहुँचने का अद्भुत मंचन हुआ।
तत्पश्चात महर्षि वशिष्ठ जी द्वारा चारों राजकुमारों के नामकरण का गूढ़ प्रसंग प्रस्तुत किया गया:
"जो आनंद सिंधु सुखरासी…" के आधार पर 'राम',"बिस्व भरन पोषन कर जोई…" से 'भरत',
"जाके सुमिरन तें रिपु नासा…" से 'शत्रुघ्न', और
"लच्छन धाम राम प्रिय…" के भाव से 'लक्ष्मण' नाम रखा गया।गुरु गृह गए पढ़न रघुराई, अल्प काल विद्या सब आई"
नामकरण और मनमोहक बाल चरित्र की लीलाओं के पश्चात चारों भाइयों का गुरु वशिष्ठ जी के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने जाने का मंचन हुआ। गोस्वामी तुलसीदास जी के भावों को जीवंत करते हुए दर्शाया गया कि कैसे स्वयं विद्या के सागर प्रभु श्रीराम को अल्प काल में ही समस्त विद्याएं स्वतः ही प्राप्त हो गईं।
शिक्षा पूर्ण कर घर लौटने के बाद चारों भाइयों द्वारा अपने सखाओं के साथ दिन-प्रतिदिन की जाने वाली लीलाओं और क्रीड़ा को देखकर समस्त अयोध्यावासी कृतार्थ होते रहे।
आरती संग विश्रामआरती संग विश्राम
लीला के दूसरे दिन के प्रसंग का विश्राम माता कौशल्या द्वारा प्रभु श्रीराम की उतारी गई दिव्य आरती और श्रद्धालुओं के जयकारों के साथ हुआ। 'जय श्री सीता राम' और 'हर-हर महादेव' के उद्घोष से पूरा रामनगर गूंज उठा।