गौशाला या मौत का केंद्र? गेट पर मरणासन्न और मृत पड़े गौवंश, प्रशासनिक चुप्पी पर सुदामाजी का तीखा हमला।

अजीत मिश्रा (खोजी)
मृतशाला बनी रमना तौफीक गौशाला: पोल खुलने के 16 घंटे बाद भी नहीं जागे जिम्मेदार, सुदामाजी की दो-टूक—सुधार नहीं हुआ तो होगा ‘आर-पार का संघर्ष’
गौशाला या मौत का केंद्र? गेट पर मरणासन्न और मृत पड़े गौवंश, प्रशासनिक चुप्पी पर सुदामाजी का तीखा हमला।
करोड़ों के बजट के बावजूद कागजों में दम तोड़ रहे मूक पशु; 16 घंटे बीतने के बाद भी सुध लेने नहीं पहुंचा जिम्मेदार अमला।
व्यवस्था की संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल: बस्ती की बदहाल गौशाला को लेकर सुदामाजी की चेतावनी—लापरवाह अधिकारियों की तय हो जवाबदेही।
बस्ती जिले के वृहद गौ संरक्षण केंद्र रमना तौफीक की तस्वीरें किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कंपाने के लिए काफी हैं। सरकारी तंत्र के दावों के विपरीत, इस गौशाला की सच्चाई ने साबित कर दिया है कि कागजों पर चल रही व्यवस्था जमीन पर कितनी खोखली और बेरहम हो चुकी है। गौशाला के गेट पर ही मरणासन्न और मृत पड़े गौवंश व्यवस्था के माथे पर एक बदनुमा दाग की तरह हैं।
इस गंभीर लापरवाही को सार्वजनिक हुए 16 घंटे से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी है। इस अमानवीय स्थिति पर वरिष्ठ भाजपा नेता एवं समाजसेवी चन्द्रमणि पाण्डेय ‘सुदामाजी’ ने तीखा रुख अपनाते हुए प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया है और कड़े शब्दों में चेतावनी दी है।
मुख्य बिंदु: कागजों के दावे और जमीन की हकीकत
गेट पर ही मौत का तांडव: गौशाला के प्रवेश द्वार पर ही गौवंशों का मरणासन्न अवस्था में मिलना और कुछ का मृत पाया जाना इस बात का प्रमाण है कि भीतर देखभाल के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हो रही है।
16 घंटे बाद भी प्रशासनिक चुप्पी: जिला प्रशासन को फोन और माध्यमों से वस्तुस्थिति से अवगत कराने के बावजूद इतने लंबे समय तक कोई ठोस राहत या सुधारात्मक कार्रवाई न होना गहरी प्रशासनिक संवेदनहीनता को दर्शाता है।
लाखों-करोड़ों के संसाधन आखिर कहां जा रहे?: सरकार द्वारा गौवंश संरक्षण के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। इसके बावजूद यदि पशु भूख, बीमारी और उपेक्षा से दम तोड़ रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और मॉनिटरिंग की विफलता है।
जिम्मेदारी किसकी?: बीडीओ, सीडीओ, एसडीएम और स्थानीय निकायों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि मूक पशुओं की जान न जाए, लेकिन हर कोई आंखें मूंद कर बैठा है।
पशु चिकित्सा और व्यवस्थाओं का खुला फेलियर
गौशालाओं का मुख्य उद्देश्य मूक पशुओं को सुरक्षित रखना, उन्हें समय पर चारा-पानी और चिकित्सा उपलब्ध कराना है। लेकिन रमना तौफीक गौशाला में नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, दवाओं की उपलब्धता और साफ-सफाई के सभी दावे हवा हवाई साबित हुए हैं। बीमार पशुओं के समय पर इलाज न मिलने से उनकी मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।
समाज की भी है सामूहिक जिम्मेदारी
सुदामाजी ने केवल प्रशासन पर ठीकरा फोड़ने के साथ-साथ समाज को भी आत्ममंथन करने की नसीहत दी है। उन्होंने दो-टूक कहा कि लोग गाय का दूध तो चाव से लेते हैं, लेकिन बछड़े होते ही उन्हें सड़कों और खेतों में बेसहारा छोड़ देते हैं। इसके अलावा, खेतों में पराली जलाने के बजाय यदि उसका उपयोग गौशालाओं में चारे के रूप में किया जाए, तो गौवंश और पर्यावरण दोनों को बचाया जा सकता है। गौसंरक्षण केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि सामाजिक कर्तव्य भी है।
सुदामाजी की दो-टूक चेतावनी: आर-पार की लड़ाई तय
“गौवंश की आंखों में दिख रही बेबसी को देखकर भी यदि व्यवस्था नहीं जागती, तो सवाल केवल गौशाला का नहीं, हमारी संवेदनशीलता और शासन-प्रशासन की जवाबदेही का है।” — चन्द्रमणि पाण्डेय ‘सुदामाजी’
सुदामाजी ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि जल्द से जल्द गौशाला का पुनः निरीक्षण कर मृत व मरणासन्न पशुओं की स्थिति पर पारदर्शी जांच नहीं हुई, बीमार पशुओं का तत्काल इलाज शुरू नहीं कराया गया और दोषियों की जवाबदेही तय नहीं की गई, तो वे जनहित में प्रशासन के खिलाफ आर-पार का संघर्ष छेड़ने से पीछे नहीं हटेंगे।
अब देखना यह होगा कि कुंभकर्णी नींद सो रहा प्रशासनिक अमला इस तीखी चेतावनी के बाद हरकत में आता है या फिर मूक पशुओं की आह का यह सिलसिला यूं ही जारी रहता है।
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