जुड़वनिया फुलवार की धरती पर गूंजा वीर लोरिक का शौर्य, मंच पर जीवंत हुई प्रेम और पराक्रम की अमर गाथा

फुलवार जुड़वनिया में श्री सरस्वती नाट्यकला मंचन का भव्य समापन, तलवार के एक वार से विशाल शिला को दो भागों में बांटने की लोकगाथा ने दर्शकों को किया रोमांचित; मुख्य अतिथि अनिल कुमार ने नाट्यकला के जन्मदाता एमपी कन्नौजिया को किया सम्मानित
महुली सोनभद्र(राकेश कुमार कन्नौजिया)_ सोनांचल की माटी में रची-बसी वीरता, प्रेम, स्वाभिमान और अदम्य पराक्रम की ऐतिहासिक लोकगाथा जब मंच पर साकार हुई तो दर्शक मंत्रमुग्ध होकर देखते रह गए। दुद्धी विकासखंड के फुलवार जुड़वनिया में आयोजित श्री सरस्वती नाट्यकला मंचन के अंतिम दिवस वीर लोरिक की अमर गाथा का भव्य मंचन किया गया। कलाकारों ने अपने सजीव अभिनय, प्रभावशाली संवाद और शानदार प्रस्तुति से सदियों पुरानी लोककथा को ऐसा जीवंत रूप दिया कि पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। विशेष रूप से सोनभद्र की मारकुंडी पहाड़ी पर स्थित प्रसिद्ध वीर लोरिक पत्थर से जुड़ी शौर्यगाथा ने दर्शकों में विशेष उत्साह भर दिया।
समापन समारोह में किसान बीज भंडार के प्रोपराइटर अनिल कुमार मुख्य अतिथि तथा वीरेंद्र कुमार कन्नौजिया उर्फ पिंकी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। आयोजन समिति के पदाधिकारियों ने अतिथियों का माल्यार्पण कर आत्मीय स्वागत एवं सम्मान किया। समिति के अध्यक्ष एवं विंढमगंज भाजपा मंडल अध्यक्ष वीरेंद्र चौधरी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि क्षेत्र की लोककला और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने में ऐसे आयोजनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया।
मुख्य अतिथि अनिल कुमार ने कहा कि फुलवार जुड़वनिया की यह पावन मिट्टी उनकी जन्मभूमि है। इसी गांव में उनका जन्म हुआ है, इसलिए इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और नाट्यकला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना उनका भी दायित्व है। उन्होंने कहा कि हमारी लोकसंस्कृति में ऐसे अनमोल इतिहास और गौरवगाथाएं छिपी हैं, जिन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना आवश्यक है। इसी क्रम में उन्होंने नाट्यकला के जन्मदाता एमपी कन्नौजिया को अपने हाथों से माला पहनाकर सम्मानित किया तथा उनके योगदान की मुक्तकंठ से सराहना की।
मंचन में वीर लोरिक की वह लोकगाथा प्रस्तुत की गई, जो उत्तर भारत के लोकसाहित्य में लोरिकायन के नाम से प्रसिद्ध है। लोकपरंपरा के अनुसार वीर लोरिक बलिया के गढ़गौरा गांव के निवासी और अद्भुत शौर्य एवं पराक्रम के धनी थे। वहीं अगोरी राज्य के राजा मोलागत के यहां माहुर ग्वाल नामक प्रतिष्ठित व्यक्ति रहते थे, जिनकी पुत्री मंजरी रूप, गुण, साहस और स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति थी। मंजरी और वीर लोरिक के बीच प्रेम का संबंध स्थापित हुआ, लेकिन इस संबंध के सामने राजा मोलागत का विरोध और राजसत्ता की बाधाएं खड़ी हो गईं।
कथा के अनुसार राजा मोलागत ने इस संबंध को स्वीकार नहीं किया और अपने मंत्री, सेनापति तथा सैनिकों के माध्यम से लोरिक के सामने अनेक चुनौतियां खड़ी कीं। वीर लोरिक ने अपने बड़े भाई संवर के साथ मिलकर विरोधियों का सामना किया। संघर्ष और कठिन परिस्थितियों के बीच लोरिक ने अपनी वीरता, साहस और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया। अंततः प्रेम और स्वाभिमान की विजय हुई तथा लोरिक और मंजरी का विवाह संपन्न हुआ।
इस अमर प्रेमगाथा का सबसे रोमांचकारी प्रसंग सोनभद्र की मारकुंडी पहाड़ी पर स्थित विशाल वीर लोरिक पत्थर से जुड़ा है। प्रचलित लोकमान्यता के अनुसार विवाह के बाद जब वीर लोरिक अपनी पत्नी मंजरी के साथ मारकुंडी पहाड़ी के रास्ते से गुजर रहे थे, तब मंजरी ने अपने पति की वीरता का ऐसा प्रमाण मांगा, जिसे संसार युगों तक याद रखे। पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए वीर लोरिक ने अपनी असाधारण शक्ति और पराक्रम का परिचय देते हुए तलवार के एक ही वार से विशाल चट्टान को दो भागों में विभाजित कर दिया। लोकविश्वास है कि उसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में यह शिलाखंड आज भी वीर लोरिक पत्थर के नाम से विख्यात है। मारकुंडी की धरती पर मौजूद यह विशाल दो भागों में विभाजित चट्टान आज भी प्रेम, साहस और वीरता की अमिट पहचान के रूप में देखी जाती है।
इस प्रसंग के मंचन में राजा मोलागत की भूमिका नुरूल हुदा, मंत्री की भूमिका लालकिशोर गुप्ता, सेनापति की भूमिका आशीष गुप्ता, माहुर ग्वाल की भूमिका रंजीत गुप्ता, वीर लोरिक की भूमिका अनुज कुमार (मोनू) तथा संवर की भूमिका उमेश कुमार ने निभाई। ब्रह्मा के रूप में राजेश्वर गुप्ता, सैनिक-1 के रूप में मंगलम, द्वारपाल के रूप में अमरनाथ कुशवाहा, मंजरी के रूप में कमलेश तथा मंजरी की मां के रूप में गौरी ने शानदार अभिनय किया। वहीं राक्षस-1 की भूमिका दिनेश विश्वकर्मा ने निभाई। सभी कलाकारों ने अपने पात्रों के अनुरूप अभिनय कर मंचन को यादगार बना दिया।
इस अवसर पर समिति के अध्यक्ष वीरेंद्र चौधरी, मुकेश कुमार गुप्ता, अनूप कुमार, अनुज कुमार, विजय कुमार कन्नौजिया, अभय कुमार, डॉ. राजेंद्र कुशवाहा, राजेश्वर गुप्ता, अमरनाथ कुशवाहा सहित समिति के पदाधिकारी एवं सैकड़ों की संख्या में क्षेत्रीय दर्शक मौजूद रहे।
वीर लोरिक की अमर गाथा के इस भव्य मंचन ने न केवल दर्शकों का मनोरंजन किया, बल्कि सोनभद्र की गौरवशाली लोकपरंपरा, ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक पहचान को भी नई ऊर्जा प्रदान की। आयोजन के अंतिम दिन दर्शकों का उत्साह देखते ही बन रहा था।
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