
चित्रसेन घृतलहरे, 22 नवम्बर 2025//छत्तीसगढ़ शासन के लगभग सभी विभागों में संविदा व दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के साथ अब आउटसोर्स कर्मचारियों पर निर्भरता तेजी से बढ़ती जा रही है। बिजली कंपनियां, नगरीय निकाय, आबकारी, श्रम विभाग, स्वास्थ्य संस्थान, मेडिकल कॉलेज, स्कूल-छात्रावास सहित लगभग हर विभाग आज आउटसोर्स कर्मियों के भरोसे चल रहा है। भर्ती नियम, सेवा शर्तें, न्यून वेतन और सुविधाओं के अभाव ने इन कर्मचारियों में भारी असंतोष पैदा कर दिया है। स्थिति यह है कि ये कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर निरंतर धरना-प्रदर्शन करने को मजबूर हैं।
1 लाख से अधिक आउटसोर्स कर्मी, 100 से अधिक एजेंसियों का नेटवर्क
छत्तीसगढ़ प्रगतिशील अनियमित कर्मचारी फेडरेशन के अनुसार राज्य में क्लास-III और क्लास-IV श्रेणी को मिलाकर 1 लाख से अधिक आउटसोर्स कर्मचारी कार्यरत हैं, जो 100 से अधिक निजी एजेंसियों के माध्यम से तैनात किए गए हैं। फेडरेशन का कहना है कि इन कर्मचारियों को पीएफ, ग्रेच्युटी, बीमा जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। वहीं, वेतन भी न्यूनतम मजदूरी से कम दिया जा रहा है, जिससे कर्मचारियों का शोषण निरंतर जारी है।
आउटसोर्सिंग से सरकार को हर साल 276 करोड़ का आर्थिक नुकसान
फेडरेशन ने बताया कि यदि एक कर्मचारी का औसत वेतन 10,000 रुपये माना जाए तो 1 लाख कर्मचारियों को एक वर्ष में सरकार को 1200 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान करना पड़ता है। इसके ऊपर 18% GST और लगभग 5% एजेंसी सेवा शुल्क जोड़ने पर सरकार पर प्रति वर्ष 276 करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
फेडरेशन का सवाल है—जब सीधी भर्ती सस्ती और स्थायी है, तो आउटसोर्सिंग का महंगा और शोषणकारी मॉडल क्यों?
श्रम कानूनों का पालन नहीं, श्रम न्यायालय सिर्फ दिखावा—फेडरेशन
फेडरेशन ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि मजदूरी संहिता 2019, औद्योगिक संबंध संहिता 2020, व्यावसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संहिता 2020, तथा सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 जैसे श्रम कानूनों का पालन सरकार द्वारा नहीं किया जा रहा है। उनके अनुसार, “श्रम न्यायालय मजदूरों के न्याय का स्थान नहीं, बल्कि औपचारिकता भर बनकर रह गया है।”
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसलों ने दी बड़ी राहत
फेडरेशन ने सुप्रीम कोर्ट के तीन महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया—
जग्गो बनाम भारत संघ (दिसंबर 2024)
श्रीपाल बनाम नगर निगम गाजियाबाद (फरवरी 2025)
इनमें सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि कर्नाटक बनाम उमा देवी (2006) के निर्णय को नियमितीकरण से इनकार करने के “बहाने” के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय से काम कर रहे अनियमित कर्मियों को नियमित करना ही न्यायोचित है।
फेडरेशन का कहना है कि यह फैसला उनके संघर्ष को मजबूत आधार देता है।
मांगें: नियमितीकरण, बहाली, न्यूनतम वेतन और आउटसोर्स व्यवस्था समाप्त करने का आग्रह
फेडरेशन की प्रमुख मांगें—
सभी अनियमित/आउटसोर्स कर्मियों का नियमितीकरण/स्थायीकरण
निकाले गए कर्मचारियों की तत्काल बहाली
न्यून मानदेय वालों को न्यूनतम वेतन
अंशकालीन कर्मचारियों को पूर्णकालीन बनाया जाए
आउटसोर्सिंग/ठेका/सेवा प्रदाता मॉडल पूरी तरह समाप्त किया जाए
मोदी की गारंटी पर सवाल
फेडरेशन ने कहा कि 2023 की ‘मोदी की गारंटी’ में “वचनबद्ध सुशासन” के तहत अनियमित कर्मचारियों को शामिल करते हुए एक समिति गठित करने का वादा था।
लेकिन गठित समिति में अनियमित कर्मचारियों का कोई प्रतिनिधि शामिल नहीं है, जो वादे के विपरीत है।
20–25 वर्षों से सेवा, फिर भी हालात बदतर
अनियमित कर्मचारियों ने बताया कि वे दो से ढाई दशक से लगातार सरकारी योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं, लेकिन उनकी सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक स्थिति “मध्यकालीन बंधुआ मजदूर” से भी बदतर हो चुकी है। नौकरी खोने के डर और प्रशासनिक दबाव के चलते वे आवाज उठाने में भी असमर्थ रहे हैं।
दिसंबर में होगा विशाल आंदोलन
फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष गोपाल प्रसाद साहू ने बताया कि सरकार की लगातार चुप्पी और मांगों की अनदेखी से कर्मचारी बेहद आक्रोशित हैं। इसी के विरोध में दिसंबर में भव्य और निर्णायक आंदोलन किया जाएगा।










