कुदरहा ब्लॉक में ‘विकास’ का ‘लूट-तंत्र’: प्रधानों से लेकर अधिकारियों तक की मिलीभगत की खुली पोल

अजीत मिश्रा (खोजी)
‘विकास’ के नाम पर ‘लूट’ का खेल: कुदरहा की शर्मनाक हकीकत
- कुदरहा ब्लॉक में भ्रष्टाचार का बोलबाला: प्रधानों की मनमानी और ब्लॉक प्रमुख की मौन सहमति पर उठे सवाल
- मनरेगा मजदूर चलते हैं फ़ार्च्यूनर से: कुदरहा की ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार की खुली पोल
- कुदरहा में प्रधानों का ‘फर्जीवाड़ा’: मनरेगा लूट की जांच में घिरे जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि
विकास के नाम पर आवंटित सरकारी धन जब जनता की तिजोरी तक पहुँचने के बजाय चंद जेबों में चला जाए, तो इसे ‘भ्रष्टाचार’ नहीं, बल्कि ‘संगठित अपराध’ कहा जाना चाहिए। उजागर हुआ मामला कुदरहा ब्लॉक के ‘परेवा’ और ‘कड़सरी मिश्र’ ग्राम पंचायतों की काली करतूतों को बयां करता है, जो किसी भी संवेदनशील समाज को झकझोरने के लिए काफी है।कुदरहा ब्लॉक के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायतें इन दिनों विकास कार्यों के बजाय भ्रष्टाचार के कीर्तिमान स्थापित करने को लेकर चर्चा में हैं। तथ्यों के अनुसार, विशेष रूप से ‘परेवा’ और ‘कड़सरी मिश्र’ ग्राम पंचायतें उस संगठित लूट का केंद्र बन गई हैं, जिसने सरकारी धन के सही उपयोग के दावों की धज्जियाँ उड़ा दी हैं।
मनरेगा बना ‘लूट का जरिया’
हद तो यह है कि जिस मनरेगा का उद्देश्य गरीब को रोजगार देना था, उसे यहाँ ‘लूट का जरिया’ बना लिया गया है। स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहाँ कड़सरी मिश्र में मनरेगा मजदूर ‘फ़ार्च्यूनर’ गाड़ी से चलते हैं, वहीं परेवा में रोजगार सेविका सीमा देवी पर फर्जीवाड़े का मुकदमा दर्ज है। यह कोई मामूली अनियमितता नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम का मजाक है। क्या जाँच एजेंसियां और प्रशासन इस भद्दे मजाक का तमाशा सिर्फ देखते रहेंगे?पिछले पांच वर्षों का लेखा-जोखा देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि इन गाँवों में विकास कम और लूटपाट अधिक हुई है। सरकारी खजाने से मनरेगा के नाम पर जो धन जारी हुआ, वह विकास कार्यों में लगने के बजाय प्रधानों और उनके करीबियों की जेबें भरने के काम आया।
- परेवा का फर्जीवाड़ा: परेवा गाँव में रोजगार सेविका सीमा देवी पर दर्ज हुआ मुकदमा इस बात का प्रमाण है कि मनरेगा में किस स्तर का फर्जीवाड़ा किया गया।
- कड़सरी मिश्र का कारनामा: स्थिति इतनी बेतुकी है कि कड़सरी मिश्र में कागजों पर मनरेगा मजदूर दिखाए गए हैं, जो अपनी लग्जरी गाड़ी ‘फ़ार्च्यूनर’ में घूमते हैं।
नैतिक जवाबदेही से भागते ज़िम्मेदार
इस भ्रष्टाचार की आग में सबसे बड़ा सवाल ब्लॉक प्रमुख की भूमिका पर उठता है। आखिर प्रमुख जी की नाक के नीचे यह सब कैसे हो रहा था? यदि ब्लॉक आदर्श नहीं बन पा रहा है, तो इसकी नैतिक जिम्मेदारी प्रमुख की ही बनती है। वे यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते कि उनके पास अधिकार नहीं हैं—आखिर ब्लॉक तो उन्हीं का है! साथ ही, खंड विकास अधिकारियों (BDO) की भूमिका भी कटघरे में है, जिन्हें इस पूरे तंत्र को भ्रष्टाचार की आग में झोंकने के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार माना जा रहा है। जब बीडीओ खुद एफआईआर दर्ज कराते हैं, तो यह साफ हो जाता है कि मामला कितना गंभीर और गहरा है।
प्रशासनिक मौन और ब्लॉक प्रमुख की भूमिका
इस पूरी लूट में केवल प्रधान या उनके पति ही नहीं, बल्कि ब्लॉक प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। खंड विकास अधिकारियों (BDO) की कार्यप्रणाली पर उंगली उठना लाजमी है, जिन्हें इस पूरे तंत्र को भ्रष्टाचार की आग में धकेलने का मुख्य सूत्रधार माना जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल ब्लॉक प्रमुख अनिल दूबे की नैतिक जवाबदेही पर है। सवाल यह उठ रहा है कि यदि उनके ब्लॉक में इतना बड़ा घोटाला हो रहा है और ग्राम पंचायतें भ्रष्टाचार का गढ़ बन चुकी हैं, तो प्रमुख जी अपनी जिम्मेदारी से कैसे बच सकते हैं? यह तर्क देना कि ‘उनके पास अधिकार नहीं हैं’, जनता की आँखों में धूल झोंकने जैसा है। एक ब्लॉक प्रमुख के रूप में उनकी यह जिम्मेदारी बनती थी कि वे सिस्टम को ‘टाइट’ रखें, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी मूक सहमति ने ही इस ‘लूट-तंत्र’ को फलने-फूलने का मौका दिया।
कार्रवाई के नाम पर लीपापोती
जन चर्चा है कि यदि समय रहते पारदर्शी जाँच की गई होती, तो आज परेवा और कड़सरी मिश्र के प्रधान जेल की सलाखों के पीछे होते। इसके बजाय, प्रधान संघ के कुछ ‘नकलियों’ की भूमिका ने मामले को और उलझा दिया है। जब खुद बीडीओ ने इस मामले में एफआईआर दर्ज कराई है, तो इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं और मामला अत्यंत गंभीर है।
ग्राम पंचायतों को भ्रष्ट बनाने में प्रधानों, उनके पतियों और प्रधान संघ के कुछ ‘नकलियों’ की तिकड़ी ने जो भूमिका निभाई है, वह लोकतंत्र के लिए खतरा है। यदि समय रहते इन पर कठोर कार्यवाही नहीं की गई, तो कुदरहा का यह ‘लूट मॉडल’ अन्य ब्लॉकों के लिए एक बुरा उदाहरण बन जाएगा। जनता अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि जेल की सलाखों के पीछे उन चेहरों को देखना चाहती है जिन्होंने विकास की बलि देकर अपनी तिजोरियां भरी हैं।
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