तबादले के लिए ‘कैंसर’ का फर्जी ढोंग: शिक्षिकाओं की पोल खुली, ड्यूटी के दिन ही हो रही थी ‘कीमोथेरेपी’

अजीत मिश्रा (खोजी)
शिक्षा विभाग में ‘बीमारी’ का खेल: तबादले के लिए रची गई फर्जी पटकथा
- ‘कीमो’ के नाम पर ट्रांसफर का खेल: मेरठ के अस्पताल से जारी प्रमाण पत्रों पर उठे गंभीर सवाल
- कैंसर का ‘फेक’ सर्टिफिकेट बनवाकर ट्रांसफर की जुगत, जोगिया ब्लॉक की शिक्षिकाओं पर गिरी जांच की गाज
सिद्धार्थनगर: क्या शिक्षा विभाग में तबादले का ‘शॉर्टकट’ अब कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के नाम पर लिया जा रहा है? सिद्धार्थनगर के जोगिया ब्लॉक से सामने आया एक मामला न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि व्यवस्था पर एक गंभीर तमाचा भी है। खंड शिक्षा अधिकारी के पत्र ने उन दावों की कलई खोल दी है, जिन्हें आधार बनाकर शिक्षिकाएं अपना मनचाहा तबादला हासिल करने की जुगत में थीं।
कागजों पर ‘कीमो’, स्कूल में ‘हाजिरी’
मामला बेहद गंभीर है। बेसिक शिक्षा परिषद के नियमों के तहत, कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे शिक्षकों या उनके आश्रितों को अंतर्जनपदीय स्थानांतरण में प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन जोगिया ब्लॉक की दो शिक्षिकाओं ने इस मानवीय आधार का मजाक बनाकर रख दिया है। हैरानी की बात यह है कि जिन तारीखों पर मेडिकल पर्चों में शिक्षिकाओं के ‘कीमोथेरेपी’ लेने का उल्लेख है, उन्हीं तारीखों में वे अपने विद्यालय में ड्यूटी पर उपस्थित थीं।
फर्जीवाड़े की परतें
प्रमाण पत्रों की सत्यता पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं:
- अस्पताल की भूमिका संदेहास्पद: मेरठ के पीएल शर्मा जिला चिकित्सालय से जारी प्रमाण पत्रों पर न तो दिनांक है और न ही पत्रांक।
- दस्तावेजों का अभाव: कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का दावा करने के बावजूद, बायोप्सी या अल्ट्रासाउंड जैसी प्राथमिक जांच रिपोर्ट तक नदारद हैं।
- तारीखों का हेरफेर: मेडिकल पर्चों पर दर्ज कीमोथेरेपी की तारीखों और स्कूल में उपस्थिति का मिलान न होना, किसी सोची-समझी धोखाधड़ी की ओर इशारा करता है।
क्या यह सिर्फ ‘बदनियती’ है या ‘मिलीभगत’?
सवाल यह उठता है कि क्या इतनी बड़ी धांधली बिना किसी मिलीभगत के संभव है? क्या मेडिकल बोर्ड या विभाग के स्तर पर दस्तावेजों की जांच केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई थी?
खंड शिक्षा अधिकारी द्वारा जांच के आदेश तो दे दिए गए हैं, लेकिन यह मामला व्यवस्था के उन काले चेहरों को बेनकाब करता है जो वास्तव में जरूरतमंदों का हक मारकर अपनी सुविधा के लिए सिस्टम को ‘बीमार’ बना रहे हैं। अब देखना यह है कि क्या इन पर केवल विभागीय कार्रवाई होगी या सेवा नियमों के उल्लंघन और धोखाधड़ी के तहत कानूनी शिकंजा भी कसा जाएगा।

शिक्षा के मंदिर में ‘बीमारी का व्यापार’ करने वालों पर अगर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह उन तमाम शिक्षकों के साथ अन्याय होगा जो पूरी ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं। विभाग को चाहिए कि वह न केवल इन शिक्षिकाओं की जांच करे, बल्कि उन मेडिकल संस्थानों की भी पड़ताल करे जिन्होंने ऐसे ‘फर्जी’ प्रमाण पत्र जारी किए हैं।
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