बनकटी की देवमी सहकारी समिति में कालाबाजारी का बोलबाला: किसानों का फूटा गुस्सा
देवमी सहकारी समिति में खाद वितरण को लेकर बवाल, सचिव पर कालाबाजारी का आरोप बनकटी: सहकारी समिति में मनमानी का बोलबाला, खाद के लिए भटक रहे किसान
अजीत मिश्रा (खोजी)
व्यवस्था की खाद में भ्रष्टाचार की बदबू: देवमी सहकारी समिति का शर्मनाक चेहरा
- खाद वितरण में धांधली: सचिव पर अभद्रता और कालाबाजारी के गंभीर आरोप
- प्रशासन के आदेश दरकिनार: देवमी सहकारी समिति में खाद वितरण पर मचा घमासान
- किसानों का आरोप-सचिव नहीं दे रहे रसीद, खाद वितरण में कर रहे भेदभाव
बस्ती जिले के बनकटी विकास क्षेत्र स्थित देवमी बहुउद्देशीय प्राथमिक ग्रामीण सहकारी समिति इन दिनों विवादों के केंद्र में है। यह समिति अब ‘सहकार’ के स्थान पर ‘सह-भ्रष्टाचार’ का अड्डा बनती दिख रही है।बनकटी विकास क्षेत्र अंतर्गत देवमी (चित्रखोर, गंगौरी) स्थित बहुउद्देशीय प्राथमिक ग्रामीण सहकारी समिति में खाद वितरण को लेकर अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के गंभीर मामले सामने आए हैं। शनिवार को जब स्थानीय किसानों ने समिति के सचिव प्रदीप अग्रहरी पर खाद वितरण में भारी अनियमितता, मनमानी और कालाबाजारी का सीधा आरोप लगाया, तो समिति परिसर में भारी हंगामा मच गया।
किसानों के मुख्य आरोप
स्थानीय किसान पिटू चौधरी और अन्य ने समिति की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं:
- पारदर्शिता का अभाव: किसानों के अनुसार, समिति पर खाद की बड़ी खेप ट्रकों से उतारी जाती है, लेकिन मानक और पारदर्शिता के किसी भी नियम का पालन नहीं किया जाता है।
- रसीद और रिकॉर्ड का गायब होना: खाद वितरण में न तो किसी किसान को रसीद दी जाती है और न ही कोई स्पष्ट रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाता है, जिससे यह पता लगाना असंभव है कि किस किसान को कितनी खाद मिली और कितना स्टॉक शेष बचा है।
- सचिव की मनमानी: आरोप है कि सचिव प्रदीप अग्रहरी समिति को समय से नहीं खोलते और देर से आकर मनमाने तरीके से काम करते हैं।
- अभद्र व्यवहार और धमकी: किसानों का यह भी आरोप है कि खाद वितरण में भेदभाव किया जाता है और यदि कोई किसान सवाल करता है, तो सचिव उनके साथ अभद्र व्यवहार करते हैं, मारपीट पर उतारू हो जाते हैं और झूठे मामलों में फँसाने की धमकी देते हैं।
स्थानीय किसानों द्वारा सचिव प्रदीप अग्रहरी पर लगाए गए गंभीर आरोप केवल एक घटना नहीं, बल्कि जिले की सहकारी व्यवस्था की सड़ी-गली कार्यप्रणाली का आईना हैं। किसानों का यह कहना कि समिति में खाद की बड़ी खेप तो आती है, लेकिन पारदर्शिता का अता-पता नहीं है, पूरी व्यवस्था की पोल खोलता है। न रसीद, न रिकॉर्ड और न ही नियमों का पालन—आखिर यह समिति किसके इशारे पर चल रही है?
प्रभाव और प्रशासनिक विफलता
इस पूरी प्रक्रिया का सीधा असर किसानों की खेती पर पड़ रहा है। शनिवार सुबह 9:30 बजे से ही रामफेर चौधरी, रामदास चौधरी, कृष्णा, यशवंत, शंकर प्रसाद, गीता और गजाई प्रसाद सहित दर्जनों किसान समिति पर सचिव का इंतज़ार करते रहे, लेकिन उन्हें खाद नहीं मिल सकी। किसानों का कहना है कि प्रशासन द्वारा खाद वितरण में सख्ती बरतने के निर्देश दिए गए हैं, लेकिन समिति स्तर पर नियमों की सरेआम अनदेखी की जा रही है, जिससे आक्रोश का माहौल है।
सबसे चिंताजनक पहलू सचिव का किसानों के प्रति रवैया है। आरोप है कि सचिव न केवल समय की पाबंदी को धता बताते हैं, बल्कि खाद मांगने पर मनमानी, भेदभाव और अभद्रता पर उतर आते हैं। क्या एक सरकारी सेवक का काम किसानों को डराना और उन पर झूठे मुकदमे दर्ज कराने की धमकी देना है?
प्रशासन से मांग और चेतावनी
आक्रोशित किसानों ने प्रशासन से मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की जाए और दोषी सचिव के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। किसानों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही उचित कार्रवाई नहीं की गई, तो वे बड़े स्तर पर धरना-प्रदर्शन करने के लिए मजबूर होंगे। यह घटना सहकारी समितियों में पारदर्शिता और जवाबदेही पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाती है, और अब सबकी नज़रें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन इस शिकायत पर कितनी त्वरित कार्रवाई करता है।
प्रशासन के सख्त निर्देशों के बावजूद समिति स्तर पर नियमों की सरेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। किसान आज अपने हक के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर हैं, जो प्रशासन की विफलता को दर्शाता है। यदि समय रहते इस मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी सचिव के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, तो यह न केवल किसानों के साथ अन्याय होगा, बल्कि भ्रष्ट तंत्र को और अधिक बढ़ावा देने जैसा होगा। अब गेंद प्रशासन के पाले में है कि वह किसानों का भरोसा बहाल करता है या भ्रष्टाचार को संरक्षण देता है।














