बस्ती: 80 वर्षीय वृद्धा की हत्या, परसरामपुर पुलिस बनी हत्यारों की ‘ढाल’!
न्याय के लिए दर-दर भटक रहा पीड़ित परिवार: हत्या के 5 दिन बाद भी एफआईआर दर्ज करने से कतरा रही परसरामपुर पुलिस। खाकी की शर्मनाक भूमिका: बदामा देवी हत्याकांड में नामजद आरोपियों को बचाने का खेल?
बस्ती: हत्या के बाद भी पुलिस की चुप्पी पर उठे सवाल, नामजद तहरीर के बावजूद एफआईआर दर्ज करने से कतरा रही परसरामपुर पुलिस
बस्ती। जनपद के परसरामपुर थाना क्षेत्र में मानवता को शर्मसार कर देने वाली एक नृशंस हत्या की घटना सामने आई है, लेकिन इस घटना से कहीं अधिक विचलित करने वाला तथ्य यह है कि खाकी इस मामले में आरोपियों को बचाने की भूमिका निभाती नजर आ रही है। कलानी खुर्द निवासी 80 वर्षीय वृद्धा बदामा देवी की निर्मम हत्या के बाद पीड़ित परिवार न्याय के लिए दर-दर भटक रहा है, जबकि पुलिस ने अब तक एफआईआर तक दर्ज करने की जहमत नहीं उठाई है।
हत्या या पुलिसिया संरक्षण की कहानी?
पीड़ित पुत्र पवन कुमार तिवारी का आरोप है कि 16 जून 2026 की सुबह उनकी माता की हत्या गांव के ही रामसूरत तिवारी, अरुण तिवारी, राधा देवी और सुरेश तिवारी ने मिलकर की। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने भी इस बात की पुष्टि कर दी है कि वृद्धा की मौत सिर पर किसी भारी और कठोर वस्तु से किए गए प्रहार के कारण हुई। सवाल यह है कि जब साक्ष्य स्पष्ट हैं और नामजद तहरीर दी गई है, तो फिर परसरामपुर पुलिस किस अदृश्य दबाव में हत्यारों को खुली छूट दे रही है?
संपत्ति का लालच और पुलिस की उदासीनता
मृतका बदामा देवी ने अपनी जान को खतरा बताते हुए पूर्व में ही स्थानीय पुलिस और मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर कई शिकायतें दर्ज कराई थीं। यदि उस समय पुलिस ने तत्परता दिखाई होती, तो आज यह बुजुर्ग महिला जीवित होती। परिवार का स्पष्ट आरोप है कि हत्या की वजह पैतृक संपत्ति का विवाद है। पुलिस की कार्यप्रणाली पर संदेह तब और गहरा जाता है, जब पीड़ित परिवार का आरोप है कि उन्हें बयान बदलने और हमलावरों से समझौता करने के लिए धमकाया जा रहा है।
न्याय के लिए गुहार, सिस्टम पर प्रहार
पीड़ित परिवार ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय से लेकर मुख्यमंत्री तक गुहार लगाई है, लेकिन परसरामपुर पुलिस का रवैया जस का तस बना हुआ है।
- क्या अपराधियों को सत्ता या रसूख का संरक्षण प्राप्त है?
- थाना पुलिस किसके इशारे पर पीड़ित परिवार को धमकाने वालों का हौसला बढ़ा रही है?
- क्या बस्ती पुलिस को ‘नृशंस हत्या’ का मुकदमा दर्ज करने के लिए भी किसी बड़े आदेश का इंतजार है?
यदि हत्या जैसे संगीन मामलों में भी पुलिस इस तरह का उदासीन और संदिग्ध रवैया अपनाएगी, तो आम जनता का कानून और व्यवस्था से भरोसा उठना लाजिमी है। मृतका के परिजन अब मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश, पुलिस महानिदेशक और मानवाधिकार आयोग से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। अब देखना यह है कि क्या शासन-प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष जांच कर दोषियों को सलाखों के पीछे भेजता है, या फिर यह मामला भी फाइलों के बोझ तले दबकर दम तोड़ देगा?














