आईजीआरएस में फर्जीवाड़ा: हरैया के तत्कालीन तहसीलदार पर कार्रवाई की संस्तुति, लेखपाल सस्पेंड

अजीत मिश्रा (खोजी)
आईजीआरएस में फर्जीवाड़ा: बस्ती प्रशासन की ‘पर्दाफाश’ कार्रवाई, तहसीलदार पर लटकी तलवार, लेखपाल सस्पेंड
- ‘बलहीन’ थी शिकायत या अधिकारियों की ईमानदारी? आईजीआरएस में घोर लापरवाही पर हरैया प्रशासन का कड़ा प्रहार
- सरकारी जमीन को भू-माफियाओं का ‘उपहार’? बस्ती में फर्जी रिपोर्ट का पर्दाफाश, तहसीलदार-लेखपाल निशाने पर
- आईजीआरएस के नाम पर ‘खानापूर्ति’ का अंत: हरैया में तत्कालीन तहसीलदार की सिफारिश, लेखपाल की विदाई
बस्ती: मुख्यमंत्री के ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावों को पलीता लगाने वाले अधिकारियों पर अब शिकंजा कसना शुरू हो गया है। हरैया तहसील में जनसुनवाई समाधान प्रणाली (IGRS) के साथ खिलवाड़ और सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे को संरक्षण देने के मामले में हुई कार्रवाई ने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। सरकारी जमीन बचाने के बजाय उसे भू-माफियाओं की झोली में डालने की मंशा रखने वाले तत्कालीन तहसीलदार के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति और लेखपाल के निलंबन ने यह साबित कर दिया है कि अब ‘फर्जी आख्या’ के खेल में किसी को बख्शा नहीं जाएगा।
क्या था पूरा मामला?
ग्राम खैरी ओझा के राम सुन्दर ओझा पिछले तीन वर्षों से सरकारी भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे थे। शिकायतकर्ता ने बकायदा गाटा संख्या के साथ अवैध कब्जे का प्रमाण दिया, लेकिन राजस्व विभाग के ‘जिम्मेदारों’ ने इसे ‘बलहीन’ बताकर फाइलों में ही दफन कर दिया।
झूठ का पुलिंदा: रिपोर्ट में किया खेल
जांच में जो सामने आया, वह किसी घोटाले से कम नहीं है। निलंबित लेखपाल हेमनाथ ने जो खेल रचा, उसकी पटकथा किसी फिल्मी साजिश जैसी है:
- तथ्यों का मखौल: शिकायत में गाटा संख्या स्पष्ट होने के बावजूद रिपोर्ट में लिखा गया कि शिकायतकर्ता ने संख्या ही नहीं दी।
- समय का हेरफेर: शिकायत 13 जनवरी 2026 की थी, लेकिन रिपोर्ट को सही ठहराने के लिए 28 अक्टूबर 2025 का ‘पुराना स्पॉट मेमो’ चिपका दिया गया।
- फर्जी दलील: जांच के नाम पर स्थलीय निरीक्षण के बजाय लेखपाल ने इसे ‘पुरानी रंजिश’ करार देकर पल्ला झाड़ने की नापाक कोशिश की।
तहसीलदार की भूमिका पर सवाल
सबसे शर्मनाक पहलू तत्कालीन तहसीलदार अभयराज की कार्यप्रणाली है। बिना किसी पर्यवेक्षण और स्थलीय सत्यापन के, उन्होंने अपनी कलम से इस फर्जी आख्या को हरी झंडी दे दी और मामले को ‘स्पेशल क्लोज’ कर दिया। एसडीएम हरैया उमाकान्त तिवारी की जांच ने साफ कर दिया कि यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि मिलीभगत का स्पष्ट मामला था।
शासन की चेतावनी: अब ‘सुधार’ नहीं, ‘प्रहार’ होगा
एसडीएम हरैया उमाकान्त तिवारी ने दो टूक शब्दों में कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली का उल्लंघन करने वालों के लिए कोई जगह नहीं है। तहसीलदार के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की संस्तुति और लेखपाल का रजिस्ट्रार कानूनगो कार्यालय से संबद्ध होना उन सभी अधिकारियों के लिए एक चेतावनी है, जो आईजीआरएस को महज एक औपचारिकता मानते हैं।
सवाल अब भी बरकरार है: क्या केवल एक लेखपाल और तत्कालीन तहसीलदार पर कार्रवाई से सरकारी जमीनों को भू-माफियाओं के चंगुल से मुक्त कराया जा सकेगा? या यह कार्रवाई केवल एक सांकेतिक कदम बनकर रह जाएगी?
जनता की नजरें अब नायब तहसीलदार गौर को सौंपी गई विभागीय जांच पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि जांच की आंच और कितने ‘चेहरों’ को झुलसाती है।
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