स्वास्थ्य व्यवस्था का मज़ाक: जिला अस्पताल के नाक के नीचे, नियम-कानून ताक पर!

अजीत मिश्रा (खोजी)
जिला अस्पताल के सामने ‘अंधेर नगरी’: अल्ट्रासाउंड सेंटरों की मनमानी और स्वास्थ्य विभाग की आपराधिक चुप्पी
- गर्भवती महिलाओं की जान से खिलवाड़: अव्या अल्ट्रासाउंड सेंटर पर पीसीपीएनडीटी एक्ट के उल्लंघन का आरोप
- जांच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति: क्या जिले में पीसीपीएनडीटी एक्ट का खौफ खत्म हो चुका है?
- अव्या अल्ट्रासाउंड सेंटर पर उठे सवाल: बिना रेडियोलॉजिस्ट की योग्यता के कैसे हो रही रिपोर्ट तैयार?
बस्ती: स्वास्थ्य सेवा के नाम पर जनपद में एक बड़ा रैकेट फल-फूल रहा है। जिला अस्पताल चौराहे के ठीक 50 मीटर की दूरी पर संचालित ‘अव्व्या अल्ट्रासाउंड सेंटर’ ने न केवल चिकित्सा जगत के मानकों को ताक पर रख दिया है, बल्कि सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए सीधे तौर पर आम जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करना शुरू कर दिया है।क्या हमारे जिले में स्वास्थ्य विभाग का कोई अस्तित्व बचा है? या फिर ‘मुनाफाखोरों’ के आगे पूरा प्रशासन नतमस्तक हो चुका है? जिला अस्पताल के ठीक 50 मीटर की दूरी पर स्थित ‘अव्व्या अल्ट्रासाउंड सेंटर’ का मामला तो यही बयां कर रहा है। यह कोई छोटी-मोटी लापरवाही नहीं, बल्कि सीधे तौर पर आम जनता की जान से खिलवाड़ है।
अयोग्यता और अनियमतता की पराकाष्ठा
इस सेंटर पर सबसे गंभीर आरोप यह है कि यहाँ गर्भवती महिलाओं का अल्ट्रासाउंड एक ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जा रहा है जिसके पास रेडियोलॉजिस्ट की निर्धारित योग्यता ही नहीं है। हैरान करने वाली बात यह है कि सेंटर पर लगी डिग्री एक गैस्ट्रोलॉजिस्ट की है। नियमों के अनुसार, गर्भवती महिलाओं का अल्ट्रासाउंड केवल रेडियोलॉजिस्ट या पात्र स्त्री रोग विशेषज्ञ ही कर सकते हैं, लेकिन यहाँ कानून को दरकिनार कर मरीजों की जान जोखिम में डाली जा रही है।आरोप है कि इस केंद्र पर अल्ट्रासाउंड करने वाले डॉक्टर के पास वह निर्धारित योग्यता ही नहीं है, जो पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) एक्ट के तहत अनिवार्य है। सेंटर पर जो डिग्री लगी है, वह एक गैस्ट्रोलॉजिस्ट की बताई जा रही है, जबकि गर्भवती महिलाओं का अल्ट्रासाउंड केवल एक रेडियोलॉजिस्ट या पात्र स्त्री रोग विशेषज्ञ द्वारा ही किया जाना चाहिए। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सेंटर ने अब तक विभाग में ‘फॉर्म-एफ’ तक जमा नहीं किया है, जो इस तरह के केंद्रों के लिए अनिवार्य दस्तावेज है।
इसके अतिरिक्त, इस सेंटर पर पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) एक्ट के तहत अनिवार्य ‘फॉर्म-एफ’ का भी रिकॉर्ड नहीं रखा जा रहा है। विभागीय जानकारी के अनुसार, इस सेंटर के खिलाफ अभी तक कोई भी फॉर्म-एफ जमा नहीं किया गया है, जो सीधे तौर पर इस केंद्र के अवैध संचालन की पुष्टि करता है।
प्रशासनिक शिथिलता: जांच के नाम पर केवल रस्म अदायगी
जब इस मामले पर पीसीपीएनडीटी के नोडल अधिकारी डॉ. अशोक चौधरी से सवाल किया गया, तो उनका जवाब स्वास्थ्य विभाग की लचर कार्यप्रणाली को दर्शाने के लिए काफी था। जनपद में पहले भी कई अल्ट्रासाउंड सेंटरों के खिलाफ शिकायतें सामने आई हैं, लेकिन विभाग द्वारा केवल चेतावनी देकर खानापूर्ति कर दी जाती है। क्या यह ‘चेतावनी’ महज भ्रष्टाचार को ढंकने का एक तरीका है? क्या जिला अस्पताल के नाक के नीचे चल रहे इस खेल से विभाग अनजान है? यह एक बड़ा प्रश्न है।
कानून की स्पष्ट अनदेखी
पीसीपीएनडीटी एक्ट, 1994 के तहत अल्ट्रासाउंड केंद्रों के लिए कड़े मानक तय हैं:
- बिना पंजीकरण के कोई भी सेंटर संचालित नहीं किया जा सकता।
- केवल निर्धारित योग्यता रखने वाले चिकित्सक ही अल्ट्रासाउंड कर सकते हैं।
- फॉर्म-एफ का रिकॉर्ड रखना अनिवार्य है, और अनियमितता पाए जाने पर कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है।
बावजूद इसके, ‘अव्व्या अल्ट्रासाउंड सेंटर’ का बेधड़क संचालन यह साबित करता है कि विभाग का डर न के बराबर है।
जनमानस की मांग: अब आर-पार की कार्रवाई हो
जिले के प्रबुद्धजन और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि इस सेंटर की निष्पक्ष जांच हो और यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए। यह मामला केवल एक सेंटर का नहीं, बल्कि पीसीपीएनडीटी एक्ट की उस धज्जियां उड़ाने वाली व्यवस्था का है जो आम जनता की सुरक्षा के लिए बनी थी। चेतावनी दी गई है कि यदि विभाग ने अब भी कार्रवाई नहीं की, तो इस मामले को उच्च स्तर पर उठाया जाएगा क्योंकि यह सीधे तौर पर जनस्वास्थ्य का मुद्दा है।
क्या स्वास्थ्य विभाग अब भी अपनी नींद से जागेगा, या किसी बड़ी अनहोनी का इंतज़ार करेगा?
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