“सल्टौआ का पंचायत भवन: विकास पर जड़ा ताला, सचिव का ‘सरकारी’ बहाना!”

अजीत मिश्रा (खोजी)
ताले में कैद ‘विकास’: सल्टौआ के भिउरा पंचायत भवन पर लटकता है ताला, जिम्मेदार बेखबर
- “भिउरा पंचायत भवन: ताला लटकने से सरकारी कामकाज ठप, ग्रामीणों ने की जांच की मांग”
- “सचिव के भरोसे पंचायत भवन: न कर्मचारी आते, न काम होता, कब जागेगा प्रशासन?”
- “सल्टौआ गोपालपुर: पंचायत भवन का ताला खोलने की जहमत नहीं उठा रहे जिम्मेदार”
बस्ती: सरकार पंचायत भवनों को ‘पंचायत सचिवालय’ के रूप में विकसित करने का दम भरती है, ताकि ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं का लाभ उनके दरवाजे पर मिल सके। लेकिन जनपद के सल्टौआ गोपालपुर विकासखंड की ग्राम पंचायत भिउरा में सरकार की यह मंशा सिर्फ कागजों तक ही सीमित है। यहाँ का पंचायत भवन लंबे समय से बदहाली और ताले की भेंट चढ़ा हुआ है। ग्रामीणों की मानें तो इस भवन के द्वार शायद ही कभी खुलते हैं, जिससे सरकारी कामकाज ठप पड़ा है।
सुविधा केंद्र या महज एक इमारत?
पंचायत भवन का निर्माण ग्रामीणों की समस्याओं के निस्तारण, आय-जाति प्रमाण पत्र, योजनाओं की जानकारी और प्रशासनिक कार्यों के लिए किया गया था। लेकिन भिउरा के ग्रामीणों के लिए यह भवन एक ‘सफेद हाथी’ साबित हो रहा है। ताला लटकने के कारण ग्रामीणों को अपने छोटे-छोटे कार्यों के लिए भटकना पड़ता है, जिससे उनकी मेहनत और समय दोनों बर्बाद हो रहे हैं।
सचिव का ‘दोषारोपण’, ग्रामीणों का ‘खुलासा’
जब इस संदर्भ में पंचायत सचिव चंद्रशेखर से पूछा गया, तो उन्होंने पल्ला झाड़ते हुए सारी जिम्मेदारी पंचायत सहायिका पर मढ़ दी। सचिव ने जांच का हवाला देते हुए सहायिका का वेतन रोकने की बात कही।
हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि समस्या केवल सहायिका तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों के तीखे आरोपों के अनुसार, सचिव स्वयं भी पंचायत भवन का रुख नहीं करते। महीने में एक बार भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में नाकाम रहने वाले सचिव आखिर किसकी निगरानी कर रहे हैं? यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है।
प्रशासनिक उदासीनता पर उठे सवाल
यदि पंचायत भवन का संचालन करने वाले मुखिया (सचिव) और कर्मचारी ही अपनी जिम्मेदारी से भागेंगे, तो धरातल पर विकास कैसे दिखेगा? ग्रामीणों का आक्रोश जायज है, क्योंकि वे पंचायत भवन के नियमित संचालन की मांग लंबे समय से कर रहे हैं।
- ग्रामीणों का तर्क: जिम्मेदारी केवल एक कर्मचारी की नहीं, पूरे सिस्टम की है।
- प्रशासन की चुप्पी: शिकायत के बाद भी अब तक ठोस कार्रवाई का न होना सिस्टम की विफलता दर्शाता है।
अब क्या?
भिउरा के ग्रामीण अब जिला प्रशासन और उच्च अधिकारियों से उम्मीद लगाए बैठे हैं। सवाल यह नहीं है कि कौन दोषी है, सवाल यह है कि ग्रामीणों को मिलने वाली सरकारी सुविधाएं कब तक ताले में बंद रहेंगी? क्या प्रशासन इस मामले की निष्पक्ष जांच कराकर पंचायत भवन को वास्तव में ‘सचिवालय’ के रूप में बहाल करेगा, या फिर यह भवन केवल सरकारी बजट खर्च करने का जरिया बना रहेगा?
ग्रामीणों की पीड़ा प्रशासन के कान तक पहुँचती है या फिर यह खबर भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएगी, यह देखना दिलचस्प होगा।
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