पीडब्ल्यूडी में ‘टेंडर बाबू’ का भ्रष्टाचार: अपनों को ठेकेदारी बाँटने का काला खेल
एक 'टेंडर बाबू' ने 'पत्नी' को 'तो' दूसरे ने 'भाई' को बनाया 'ठेकेदार' पीडब्ल्यूडी में भ्रष्टाचार का खुला खेल: मृतक आश्रित बने 'टेंडर बाबू', अपनों को बाँट रहे ठेके सरकारी पद का दुरुपयोग: नेता और 'टेंडर बाबुओं' की मिलीभगत से लूटा जा रहा सरकारी खजाना
अजीत मिश्रा (खोजी)
‘टेंडर बाबू’ का भ्रष्टाचार: अपनों को ठेकेदारी बाँटने का खेल
- नियमों को ताक पर रखकर परिवार को लाभ: कैसे प्रभात कुमार उर्फ पट्टू और बृजेश कुमार श्रीवास्तव ने अपनी पत्नी और भाई को ठेकेदार बनवाकर नियमों का उल्लंघन किया
- राजनीतिक संरक्षण और खौफ का साया: संतोष कुमार और अन्य का एक स्थानीय विधायक के प्रभाव में काम करना और उनकी अनुमति के बिना कोई निर्णय न ले पाना
- एक ही स्थान पर 15 साल से जमावड़ा: लंबे समय से एक ही कुर्सी पर बैठकर विभाग में अकूत संपत्ति अर्जित करने का काला कारनामा
- अधिकारियों की चुप्पी पर सवाल: क्या विभाग के उच्चाधिकारी भी इस भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा हैं जो नियमों के विरुद्ध ठेकेदारों का पंजीकरण कर रहे हैं
- नैतिकता का पतन: पिता की साख को बट्टा लगाकर पैसों के लिए खुद को नेताओं के सामने गिरवी रखने वाले ‘टेंडर बाबू’
बस्ती: लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में ‘मृतक आश्रित’ कोटे के तहत नौकरी पाने वाले तीन कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। इनमें प्रभात कुमार उर्फ पट्टू, संतोष कुमार और बृजेश कुमार श्रीवास्तव शामिल हैं, जिन्होंने पद का दुरुपयोग कर अपने परिजनों को ही ठेकेदार बना दिया है।लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में ‘मृतक आश्रित’ कोटे के तहत नौकरी पाने वाले तीन कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सामने आए हैं। ये कर्मचारी न केवल अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं, बल्कि नियमों को ताक पर रखकर अपने परिजनों को ही ठेकेदार बनाकर सरकारी धन की लूट में लगे हैं।
विवाद का केंद्र: तीन ‘टेंडर बाबू’
खबर के अनुसार, विभाग में तीन प्रमुख नाम चर्चा में हैं: प्रभात कुमार उर्फ पट्टू (पिता स्व. मिठ्ठू), संतोष कुमार (पिता जसकरण) और बृजेश कुमार श्रीवास्तव (पिता स्व. रक्षानंदन लाल श्रीवास्तव)। ये तीनों पिछले 15 वर्षों से अधिक समय से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं और इन्होंने पद पर रहते हुए अकूत संपत्ति एकत्रित की है।
नियमों की धज्जियाँ उड़ाने का तरीका
इन कर्मचारियों ने अपने रसूख और राजनीतिक संरक्षण का लाभ उठाकर विभाग में भाई-भतीजावाद को बढ़ावा दिया है:
- पत्नी और भाई को ठेकेदारी: बृजेश कुमार श्रीवास्तव ने अपनी पत्नी, प्रियंका श्रीवास्तव को ठेकेदार बनाया है, जिनका पंजीकरण अधीक्षण अभियंता कार्यालय में पट्टू के भाई के साथ है।
- राजनीतिक संरक्षण: संतोष कुमार पर एक स्थानीय विधायक के संरक्षण में काम करने का आरोप है। रिपोर्ट के अनुसार, वे इतने अधिक दबाव में हैं कि विधायक की अनुमति के बिना कोई छोटा निर्णय भी नहीं लेते।
- अधिकारियों की मिलीभगत: इन ‘टेंडर बाबुओं’ के भाई और पत्नी का पंजीकरण नियमों के विरुद्ध होने के बावजूद अधिकारियों ने इसे कैसे स्वीकार किया? यह स्पष्ट है कि उच्चाधिकारी भी इस भ्रष्टाचार में शामिल हैं।
परिवारवाद और नियमों की धज्जियाँ
आरोपों के अनुसार, इन कर्मचारियों ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर नियमों को ताक पर रख दिया:
- पट्टू और बृजेश: इन्होंने अपनी पत्नी और भाई को ठेकेदार के रूप में पंजीकृत करवाकर विभाग से लाभ उठाया है।
- कार्यप्रणाली: यह तीनों कर्मचारी पिछले 15 वर्षों से अधिक समय से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं और अकूत संपत्ति अर्जित कर चुके हैं।
- मिलीभगत: संतोष कुमार ने सीधे अपने परिवार को ठेकेदारी में शामिल तो नहीं किया, लेकिन उन पर एक स्थानीय विधायक के संरक्षण में काम करने और उनकी अनुमति के बिना कोई भी निर्णय न लेने का आरोप है।
जिम्मेदार कौन?
क्या इन कर्मचारियों के ऊपर बैठे अधिकारियों को इस भ्रष्टाचार की जानकारी नहीं है? यह स्पष्ट है कि विभाग के अधिकारी भी इस खेल में शामिल हैं, क्योंकि नियमों के विरुद्ध ठेकेदारों का पंजीकरण करना बिना मिलीभगत के संभव नहीं है।
रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे कर्मचारी अपने राजनीतिक आकाओं के इशारों पर चलते हैं और विभाग को निजी स्वार्थ के लिए बेच रहे हैं। नैतिकता को ताक पर रखकर ये ‘टेंडर बाबू’ न केवल अपने पिता के नाम को कलंकित कर रहे हैं, बल्कि सरकारी धन की लूट में भी सक्रिय हैं।ऐसे कर्मचारी नैतिकता से परे हैं और केवल धन-अर्जन को ही अपना लक्ष्य मानते हैं। सवाल यह है कि कब तक ये कर्मचारी एक ही स्थान पर जमे रहेंगे और कब इन पर कार्रवाई होगी? रिपोर्ट के अनुसार, जिस दिन इन ‘टेंडर बाबुओं’ को संरक्षण देने वाले नेताओं का स्वार्थ पूरा नहीं होगा, उस दिन इन कर्मचारियों की पोल खुल जाएगी और इन्हें जेल की हवा खानी पड़ सकती है।












