बस्ती का ‘कसाईखाना’ बना पोस्टमार्टम हाउस: खुले आसमान के नीचे हुआ लावारिस शव का चीर-फाड़

अजीत मिश्रा (खोजी)
मानवीय गरिमा का चीरहरण: बस्ती पोस्टमार्टम हाउस की बदहाली और शर्मनाक लापरवाही
- बस्ती पोस्टमार्टम हाउस की बदहाली: अंधेरे में हुई शव की सिलाई, क्या यही है ‘मिशन निरामय’?
- प्रशासनिक लापरवाही का नंगा सच: 72 घंटे बाद भी नहीं हो पाई सम्मानजनक व्यवस्था, खुले में हुआ पोस्टमार्टम
- बस्ती में शवों का अपमान: इनवर्टर की एक खराबी ने खोल दी जिला अस्पताल के दावों की पोल
बस्ती: क्या मृत व्यक्ति की कोई गरिमा नहीं होती? क्या कानून और चिकित्सा व्यवस्था के नाम पर इंसानी लाशों के साथ खुले आसमान के नीचे ‘कसाईखाना’ जैसा व्यवहार करना ही हमारा प्रशासनिक मानक बन चुका है?
बस्ती पुलिस लाइन के पीछे स्थित पोस्टमार्टम हाउस से आई तस्वीरों ने न केवल स्वास्थ्य विभाग की पोल खोल दी है, बल्कि पूरे समाज की मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है। 25 जून की वह घटना, जहाँ इनवर्टर खराब होने और बिजली न होने का बहाना बनाकर एक लावारिस शव का पोस्टमार्टम और सिलाई खुले परिसर में की गई, किसी ‘व्यवस्थागत विफलता’ से कहीं अधिक एक नैतिक दिवालियापन है।
व्यवस्था का अमानवीय चेहरा
प्रशासन का तर्क है कि 72 घंटे से रखा शव सड़ने लगा था, इसलिए तुरंत निस्तारण जरूरी था। क्या यह तर्क वास्तव में स्वीकार्य है? जिस शहर में जिला अस्पताल और एक पूरा चिकित्सा तंत्र मौजूद हो, वहाँ क्या एक इनवर्टर की मरम्मत या वैकल्पिक प्रकाश व्यवस्था के लिए 72 घंटे कम पड़ गए? यह लाचारी नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही की पराकाष्ठा है।
जिम्मेदार कौन?
खुले में शव को चीरना और सिलाई करना न केवल विधिक प्रक्रियाओं का मजाक है, बल्कि उस मृत व्यक्ति के प्रति घोर अपमान भी है। जिन हाथों को शव की गरिमा बनाए रखनी चाहिए थी, वे आज व्यवस्था की भेंट चढ़कर मजबूरन सड़क पर पोस्टमार्टम करने को विवश हैं।
- बिजली का बैकअप क्यों नहीं? क्या पोस्टमार्टम हाउस जैसे संवेदनशील स्थान पर इनवर्टर की स्थिति की निगरानी के लिए कोई जिम्मेदार अधिकारी नहीं है?
- सुविधाओं का अभाव: क्या जिला प्रशासन का ध्यान सिर्फ कागजी फाइलों तक सीमित है, या फिर बुनियादी सुविधाओं की कमी पर पर्दा डालने का काम किया जा रहा है?
शर्मिंदगी का कारण
यह घटना मात्र एक तकनीकी चूक नहीं है, बल्कि यह बस्ती प्रशासन की उस ‘संवेदनहीनता’ का प्रतीक है, जहाँ मृत शरीर के साथ भी सम्मानजनक व्यवहार करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। यदि एक पोस्टमार्टम हाउस के पास अंधेरा होने पर टॉर्च या वैकल्पिक बिजली की व्यवस्था नहीं है, तो हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम सभ्य समाज होने का दावा करने के योग्य नहीं हैं।
निष्कर्ष
यह बस्ती प्रशासन के माथे पर लगा एक अमिट कलंक है। जनता को खोखले आश्वासनों की नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित और संवेदनशील व्यवस्था की आवश्यकता है। अगर इन बदहाल व्यवस्थाओं पर अविलंब लगाम नहीं कसी गई और जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो कल किसी अन्य शव के साथ ऐसा ही ‘खिलवाड़’ फिर होगा।
अब समय आ गया है कि प्रशासन अपनी फाइलों से बाहर निकले और देखे कि उसके दावों की असलियत कितनी भयावह है।
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