सांसद निधि का ‘खेल’: 10 करोड़ खर्च, फिर भी धूल फांक रहे मिनी स्टेडियम!

अजीत मिश्रा (खोजी)
करोड़ों का चूना, खेल का मैदान बना ‘शमशान’: सांसद निधि का ‘मिनी स्टेडियम’ प्रोजेक्ट सवालों के घेरे में
- सांसद जी के ‘मिनी स्टेडियम’: कहीं ताले, कहीं घास, खिलाड़ियों का सिर्फ रहा ‘उपहास’।
- सरकारी खजाने से ‘सज गया’ खेल का मैदान, पर कब पहुंचेंगे खिलाड़ी-प्रशिक्षण?
- 10 करोड़ की ‘बेकार’ की इमारतें: क्या सिर्फ उद्घाटन के लिए बनी थीं ये खेल सुविधाएं?
- नींव में दफन हुआ भविष्य: मिनी स्टेडियम प्रोजेक्ट की निर्माण गुणवत्ता और खर्च की हो जांच।
- खेल नीति या सिर्फ कागजी खानापूर्ति? करोड़ों के मिनी स्टेडियमों का सच खामोश।
- सांसद निधि से बनी मिनी स्टेडियम परियोजना पर उठे सवाल: न सड़क, न खेल, केवल भ्रष्टाचार का खेल।
बस्ती: खेल प्रतिभाओं को निखारने के नाम पर सरकारी खजाने से बहाया गया करोड़ों का पानी अब सूख चुका है। ग्रामीण अंचल के उभरते खिलाड़ियों को उम्मीद थी कि सांसद निधि से बनने वाले ‘मिनी स्टेडियम’ उन्हें फर्श से अर्श तक ले जाएंगे, लेकिन आज ये स्टेडियम न केवल वीरान पड़े हैं, बल्कि सरकारी भ्रष्टाचार और प्रशासनिक उदासीनता के जीवित स्मारक बन चुके हैं।
10 करोड़ का ‘शोपीस’, न खिलाड़ी न खेल
सांसद खेल महाकुंभ की भव्य घोषणाओं के बीच, जिले की पांचों तहसीलों में मिनी स्टेडियम बनाने का सपना दिखाया गया था। तत्कालीन सांसद हरीश द्विवेदी की निधि से करीब 10 करोड़ रुपये खर्च कर चार स्थानों पर स्टेडियम खड़े तो कर दिए गए, लेकिन आज स्थिति यह है कि वहां धूल उड़ रही है। जिस उद्देश्य के लिए ये करोड़ों फूंके गए, उसका एक प्रतिशत लाभ भी ग्रामीण खिलाड़ियों को नहीं मिला।
निर्माण की ‘नींव’ में ही दफन हो गए दावे
इस परियोजना की शुरुआत ही विवादों से हुई थी। निर्माण के दौरान एक मिस्त्री की मौत ने काम की गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों की पोल खोलकर रख दी थी। ठेकेदारों को उपकृत करने की होड़ में उस समय तो अधिकारियों पर गाज गिराकर मामले को रफा-दफा कर दिया गया, लेकिन आज जो ढांचा खड़ा है, वह अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।
न रास्ता, न संचालन; ताले में बंद भविष्य
स्थानीय लोगों का आरोप है कि स्टेडियम तक पहुँचने के लिए न तो कोई सुगम रास्ता है और न ही प्रबंधन की कोई व्यवस्था। जो स्टेडियम खेल की गतिविधियों से गूंजने चाहिए थे, उनके मुख्य द्वारों पर हमेशा लटके ताले यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि सरकार की खेल नीति केवल कागजों और बैनर-पोस्टरों तक सीमित थी। बिना किसी प्रतियोगिता, बिना किसी कोच और बिना किसी देखरेख के ये स्टेडियम केवल ‘शोपीस’ बनकर रह गए हैं।
सवालों के घेरे में प्रशासन
आखिर 10 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद जवाबदेही किसकी है? क्या यह जनता के टैक्स के पैसे का खुला दुरुपयोग नहीं है? निर्माण की गुणवत्ता से लेकर वित्तीय अनियमिताओं तक, इस पूरे मामले में उच्च स्तरीय जांच की आवश्यकता है।
- निर्माण सामग्री की जांच क्यों नहीं?
- हस्तांतरण के बाद देखरेख की जिम्मेदारी किसकी?
- प्रशासनिक लापरवाही पर पर्दा क्यों?
ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं का कहना है कि यह केवल स्टेडियम का निर्माण नहीं, बल्कि उनकी संभावनाओं का गला घोटना है। अगर ये स्टेडियम उपयोग में नहीं लाए जा सकते थे, तो करोड़ों का बजट आखिर किसकी जेब में गया?
प्रशासन को अब जवाब देना होगा, वरना यह ‘खेल महाकुंभ’ का प्रोजेक्ट आने वाले समय में घोटाले का पर्याय बनकर उभरेगा।
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