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*कागजों में तालाब जमीं पर सिर्फ गड्ढे सोनहत वन विभाग ने ‘तालाब’ के नाम पर कर दिया बड़ा खेला*

17 Jul 2026, 01:53 PM • Vande Bharat Live TV News
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सोनहत / कोरिया । भ्रष्टाचार जब सीमाएं लांघ जाता है, तो वह व्यवस्था की बेशर्मी बनकर जंगलों के सन्नाटे में गूंजने लगता है। सोनहत विकासखंड मुख्यालय से लगे घने जंगलों के उन सुदूर कोनों में—जहाँ आम ग्रामीणों की आवाजाही न के बराबर है—वहाँ वन विभाग ने ‘विकास’ का ऐसा अनोखा खेल खेला है जो अब खुद विभाग के गले की फांस बनता जा रहा है।

आरोप है कि यहाँ रात के अंधेरे में गुपचुप तरीके से जेसीबी और ट्रैक्टरों की दहाड़ गूंजती रही। वन विभाग ने आनन-फानन में रात-दिन एक करके करीब

 

 *आठ से दस तथाकथित तालाबों*

 

का निर्माण कार्य कागजों पर ‘धमाकेदार’ तरीके से पूर्ण दिखा दिया। विभागीय अधिकारियों का गणित सीधा था—बारिश शुरू होने से पहले गड्ढे खोद दो, बरसात का पानी भरेगा तो गहराई और गुणवत्ता का सारा सच पानी के नीचे दफन हो जाएगा। लेकिन कुदरत को शायद इस लूट को बेनकाब करना था। इस साल उम्मीद के मुताबिक बारिश नहीं हुई, और जैसे ही आसमान साफ रहा, वन विभाग के इस खोखले ‘जल संरक्षण’ महाभियान की कलई पूरी तरह खुल गई।

 

*जनाब! ये तालाब हैं या सिर्फ खानापूर्ति की ‘फोटो गैलरी’?*

नियम कहते हैं कि सरकारी मापदंड के अनुसार तालाबों का एक निश्चित पैमाना होना चाहिए। लेकिन धरातल पर जो तस्वीरें सामने आई हैं, वे किसी भद्दे मजाक से कम नहीं हैं। न तो कहीं तालाब का सही मेड़ (पार) है और न ही आवश्यक गहराई। सिर्फ दिखावे के लिए जमीन को कुरेद कर ‘खानापूर्ति’ की तर्ज पर तस्वीरें खिंचवाई गईं, फाइलें तैयार की गईं और रेंजर साहब ने ऊपर के अधिकारियों से कथित ‘सांठगांठ’ के दम पर सीना तानकर पैसों का आहरण करने की भी तैयारी है।

ग्रामीणों का आरोप है कि रेंजर इस पूरे मामले में “यह विभागीय काम है” का राग अलाप कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या “विभागीय काम” होने का मतलब यह है कि नियमों और मापदंडों की अर्थी निकाल दी जाए?

 *भ्रष्टाचार की इस ‘सुनियोजित पटकथा’ पर खड़े होते सुलगते सवाल:*

 

 *. मजदूरों का हक मार कर इतनी हड़बड़ी क्यों?*

 इस भीषण बेरोजगारी के दौर में जहाँ ग्रामीणों को मनरेगा और अन्य योजनाओं के जरिए रोजगार की सबसे ज्यादा जरूरत थी, वहाँ मशीनों का साम्राज्य क्यों स्थापित किया गया? भारी-भरकम मशीनें और ट्रैक्टर लगाकर आखिर किस बात की जल्दबाजी थी? क्या इसलिए कि इंसानों से काम कराने पर पोल खुलने का डर था या फिर मशीनों के जरिए कमीशन का खेल ज्यादा आसान और तेज होता है?

 

 *तालाब की गुणवत्ता का पैमाना क्या है?*

कागजों में लाखों रुपये डकारने वाले इन तालाबों की असलियत क्या है? सरकारी मापदंडों को ताक पर रखकर बिना किसी नाप-जोख के तालाब कैसे खड़े कर दिए गए? न तो पानी रोकने का कोई वैज्ञानिक तरीका अपनाया गया और न ही जलभराव की कोई उचित व्यवस्था की गई। क्या सिर्फ कागजी फाइलों में शानदार फोटो चिपका देना ही वन विभाग की गुणवत्ता का पैमाना रह गया है?

 

 *तालाब हैं या किसानों का समतल बहरा खेत?*

मौके पर जाकर देखने पर ये तालाब कम और किसानों के समतल किए हुए ‘बहरा खेत’ ज्यादा नजर आते हैं। बिना गहराई और मजबूत मेड़ के बनाए गए ये ढाँचे पहली तेज बारिश में ही बह जाएँगे। जब यह ढांचा न तो बेजुबान वन्यजीवों की प्यास बुझाने के काम आ सकता है और न ही इंसानों के, तो फिर जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों रुपये इस अनुपयोगी तमाशे पर क्यों बहाए गए?

 

 *क्या वन विभाग ने सारी मर्यादाएं त्याग दी हैं?* 

शासन का स्पष्ट आदेश है कि 15 जून के बाद मिट्टी संबंधी कोई भी कार्य नहीं होगा। इसके बावजूद मानसून की दस्तक के बीच खुलेआम मिट्टी का काम चलता रहा। आखिर वन विभाग को शासन-प्रशासन के नियमों की धज्जियां उड़ाने की यह असीमित शक्ति और छूट किसने दी? क्या विभाग खुद को कानून और नियमों से ऊपर समझता है?

 

*नए रेंजर से उम्मीदें थीं, पर क्या आने से भ्रष्टाचार और बढ़ गया?*

 

सोनहत की जनता को नए रेंजर साहब की तैनाती से उम्मीद थी कि शायद अब क्षेत्र के जंगलों और आदिवासियों का भला होगा। लेकिन उनके आते ही भ्रष्टाचार ने जो रफ्तार पकड़ी है, उसने जनमानस को निराश कर दिया है। क्या नए मुखिया के संरक्षण में ही यह सारा खेल खेला जा रहा है? या फिर साहब खुद इस व्यवस्था के आगे घुटने टेक चुके हैं?

 

 *रेंजर के अधीनस्थ कर्मचारियों की बेलगाम ‘मलाई मारो’ नीति*

 रेंजर के नीचे काम करने वाले कुछ चुनिंदा अधीनस्थ कर्मचारी इस समय मलाई काटने में व्यस्त हैं। बिना किसी भय के धरातल पर भ्रष्टाचार को अंजाम दिया जा रहा है। स्थानीय ग्रामीणों की मानें तो इन छोटे कर्मचारियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे सीधे मुंह बात तक करना पसंद नहीं करते। क्या इन पर नकेल कसने वाला कोई नहीं है?

 

*जिम्मेदार मौन, जनता में आक्रोश*

 

हद तो तब हो गई जब इस पूरे घोटाले पर न तो काम वाली जगह पर कोई सूचना पटल (बोर्ड) लगाया गया और न ही किसी को यह पता है कि यह काम किस मद से स्वीकृत था। यहाँ तक कि स्थानीय वन समिति के अध्यक्ष निरंजन को भी इसकी कोई भनक नहीं लगने दी गई। जिला पंचायत कोरिया जन सहयोग समिति के उपाध्यक्ष राजू साहू ने भी इस पर गहरी नाराजगी जाहिर करते हुए उच्चस्तरीय जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

अब देखना यह होगा कि कुंभकर्णी नींद में सोया वन विभाग का उच्च प्रबंधन इस “कागजी तालाब कांड” पर क्या कार्रवाई करता है, या फिर हमेशा की तरह लीपापोती कर इस महाघोटाले की फाइल को भी हमेशा के लिए बंद कर दिया जाएगा।

 

*भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा बना वन विभाग-पुष्पेंद्र*

 

यह वन विभाग का जल संरक्षण अभियान नहीं, बल्कि अधिकारियों और बिचौलियों के संरक्षण में चलाया गया ‘जेसीबी और कमीशन राज’ है। जब क्षेत्र का गरीब आदिवासी और मजदूर दो वक्त की रोटी के लिए रोजगार को तरस रहा है, तब सोनहत वन विभाग रात के अंधेरे में गुपचुप तरीके से मशीनें चलवाकर मजदूरों का हक डकार रहा था। आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि सारा काम मजदूरों को दूर रखकर रातों-रात मशीनों से ही निपटाना पड़ा? साफ है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।”​राजवाड़े ने आगे वन विभाग की कार्यप्रणाली को आड़े हाथों लेते हुए कहा

​”सरकारी नियमों के मुताबिक 15 जून के बाद मिट्टी के कार्यों पर पूरी तरह प्रतिबंध रहता है, लेकिन सोनहत में ‘साहब’ की शह पर नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए धड़ल्ले से काम जारी रहा। न मौके पर कोई सूचना पटल (बोर्ड) लगाया गया, न स्थानीय वन समिति को भरोसे में लिया गया। यह सीधे तौर पर तानाशाही और शासकीय राशि की डकैती है। जो तालाब बनाए गए हैं, वे वन्यजीवों की प्यास क्या बुझाएंगे, वे तो पहली बारिश में ही बह जाने वाले मिट्टी के ढेर हैं।” हम इस घोटाले पर खामोश नहीं बैठेंगे। कोरिया जन सहयोग समिति इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच और मौके के भौतिक सत्यापन की मांग करती है। तालाबों की गहराई, मेड़ और स्वीकृत राशि की पाई-पाई का हिसाब होना चाहिए। अगर जल्द ही दोषी रेंजर और उनके बेलगाम अधीनस्थ कर्मचारियों पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई, तो समिति ग्रामीणों और मजदूरों को साथ लेकर सड़क से लेकर उग्र आंदोलन तक के लिए बाध्य होगी।

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