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पेड़ कटा तो बजी आरी, कैमरा दिखा तो उड़ी नींद: अब सच पर भी ‘नोटिस’ का पहरा?

18 Jul 2026, 09:56 AM • Vande Bharat Live TV News
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आरी लकड़ी को काटती है, और कलम व्यवस्था के भ्रम को!

अजीत मिश्रा (खोजी)

  • चौथा स्तंभ बनाम नोटिस: सवाल पूछने वाली पत्रकारिता पर बढ़ता दबाव
  • रुधौली की गवाही: क्या ‘आरोप’ का सहारा लेकर सच की आवाज दबाई जा रही है?
  • पर्यावरण की बलि और सवालों का गला: एक खोजी नजरिया

​पेड़ बेचारा कट गया, मगर कटघरे में कैमरा आ गया। व्यवस्था का नया नियम बन चुका है: आरी चलाओ, और अगर सवाल उठे तो आरोप लगाओ!

​लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है, मगर आजकल ऐसा लगता है कि इस स्तंभ पर भी नोटिस चिपकाने की तैयारी है। पेड़ कट जाए तो व्यवस्था के कान पर जूं तक नहीं रेंगती, लेकिन पत्रकार कैमरा लेकर पहुंच जाए, तो कई लोगों की नींद तुरंत उड़ जाती है।

​कागजी दुनिया का खेल

​जंगलों की भी अपनी एक किस्मत है। पेड़ जब तक खड़ा रहता है, वह पर्यावरण, छाया और जीवन देता है। जैसे ही वह गिरता है, वह लकड़ी बन जाता है और ‘कागजों की दुनिया’ में प्रवेश कर जाता है। ये कागज इतने ताकतवर होते हैं कि कभी-कभी हरे-भरे पेड़ को भी सिद्ध कर देते हैं कि वह ‘वैध’ तरीके से मरा है। आरा मशीनों की दुनिया भी बड़ी निराली है। वहां लकड़ी आती है, कटती है और बाजार में गायब हो जाती है। लेकिन अगर कोई पत्रकार पूछ ले कि “यह लकड़ी आई कहां से?”, तो अचानक सवाल पूछने वाले की नीयत पर ही सवाल उठने लगते हैं।

​सवाल पत्रकार का नहीं, व्यवस्था का है

​रुधौली क्षेत्र में पत्रकार ब्रह्म देव पाण्डेय के विरुद्ध दर्ज मुकदमा इसी व्यवस्था का एक उदाहरण है। आरोप लगाया गया कि वीडियो बनाकर रुपये मांगने का दबाव बनाया गया। पुलिस शिकायत के आधार पर जांच कर रही है, कानून अपना काम करेगा। लेकिन इतना तय है कि केवल आरोप लग जाने से कोई दोषी नहीं हो जाता।

​आजकल “पैसा मांगने” का आरोप एक सुविधाजनक हथियार बन गया है। पहले सवालों का जवाब देना पड़ता था, अब सवाल पूछने वाले को ही जवाबदेह बनाया जा रहा है। खबर रोकने का सबसे आसान तरीका यही है कि खबर लिखने वाले पर ही खबर बना दी जाए।

​विभाग और पुलिस की भूमिका

​वन विभाग की भूमिका भी कम मजेदार नहीं है। पेड़ कटते समय अक्सर जिम्मेदारी कहीं दिखाई नहीं देती, लेकिन कटान की खबर आने के बाद जांच की फाइलें जरूर निकल आती हैं। ऐसा लगता है जैसे जंगल की रखवाली पेड़ों के खड़े रहने से नहीं, उनके कट जाने के बाद शुरू होती है।

​दूसरी ओर पुलिस के सामने भी चुनौती है। शिकायत पर कार्रवाई करना उसका कर्तव्य है, लेकिन निष्पक्ष जांच करना उसकी पहचान। पुलिस को यह सुनिश्चित करना होगा कि कहीं कानून का इस्तेमाल किसी को बचाने के लिए तो नहीं हो रहा और कहीं किसी निर्दोष को फंसाया तो नहीं जा रहा।

सवाल जो व्यवस्था से पूछे जाने चाहिए –

1. सवाल पूछने पर नीयत पर सवाल क्यों?
आरा मशीनों की दुनिया निराली है। वहां लकड़ी आती है, कटती है और बाजार में चली जाती है। लेकिन जैसे ही कोई पत्रकार पूछ ले कि “यह लकड़ी आई कहां से, किस पेड़ की है और किस अनुमति से आई है?” तो अचानक सवाल पूछने वाले की नीयत पर ही सवाल उठने लगते हैं।

2. ‘पैसा मांगने’ का सुविधाजनक हथियार
आजकल खबर रोकने का सबसे आसान तरीका यही बन गया है कि खबर लिखने वाले पर ही खबर बना दो। “पैसा मांगने” का आरोप एक ऐसा ब्रह्मास्त्र बन गया है जिससे पहले जवाब देना पड़ता था, अब सवाल पूछने वाले को ही जवाब देना पड़ता है।

3. वन विभाग कब जागता है?
वन विभाग की भूमिका भी कम मजेदार नहीं है। पेड़ कटते समय अक्सर जिम्मेदारी दिखाई नहीं देती, लेकिन कटान की खबर आने के बाद जांच की फाइलें जरूर निकल आती हैं। ऐसा लगता है जैसे जंगल की रखवाली पेड़ों के खड़े रहने से नहीं, उनके कट जाने के बाद शुरू होती है।

4. पुलिस के सामने अग्निपरीक्षा
पुलिस का कर्तव्य है शिकायत पर कार्रवाई करना, लेकिन उसकी पहचान है निष्पक्ष जांच करना। पुलिस को यह तय करना होगा कि कहीं कानून का इस्तेमाल किसी को बचाने के लिए तो नहीं हो रहा और कहीं किसी निर्दोष को फंसाया तो नहीं जा रहा।

यदि आरा मशीन संचालक और लकड़ी ठेकेदार पूरी तरह नियमों के अनुसार काम कर रहे हैं तो उन्हें डरने की जरूरत नहीं है। बस कागज दिखा दें। लेकिन समस्या तब होती है जब कागज दिखाने से ज्यादा आसान आरोप लगाना लगने लगे।

आखिर में वही बात –

सवाल जो व्यवस्था से पूछे जाने चाहिए –

1. सवाल पूछने पर नीयत पर सवाल क्यों?
आरा मशीनों की दुनिया निराली है। वहां लकड़ी आती है, कटती है और बाजार में चली जाती है। लेकिन जैसे ही कोई पत्रकार पूछ ले कि “यह लकड़ी आई कहां से, किस पेड़ की है और किस अनुमति से आई है?” तो अचानक सवाल पूछने वाले की नीयत पर ही सवाल उठने लगते हैं।

2. ‘पैसा मांगने’ का सुविधाजनक हथियार
आजकल खबर रोकने का सबसे आसान तरीका यही बन गया है कि खबर लिखने वाले पर ही खबर बना दो। “पैसा मांगने” का आरोप एक ऐसा ब्रह्मास्त्र बन गया है जिससे पहले जवाब देना पड़ता था, अब सवाल पूछने वाले को ही जवाब देना पड़ता है।

3. वन विभाग कब जागता है?
वन विभाग की भूमिका भी कम मजेदार नहीं है। पेड़ कटते समय अक्सर जिम्मेदारी दिखाई नहीं देती, लेकिन कटान की खबर आने के बाद जांच की फाइलें जरूर निकल आती हैं। ऐसा लगता है जैसे जंगल की रखवाली पेड़ों के खड़े रहने से नहीं, उनके कट जाने के बाद शुरू होती है।

4. पुलिस के सामने अग्निपरीक्षा
पुलिस का कर्तव्य है शिकायत पर कार्रवाई करना, लेकिन उसकी पहचान है निष्पक्ष जांच करना। पुलिस को यह तय करना होगा कि कहीं कानून का इस्तेमाल किसी को बचाने के लिए तो नहीं हो रहा और कहीं किसी निर्दोष को फंसाया तो नहीं जा रहा।

यदि आरा मशीन संचालक और लकड़ी ठेकेदार पूरी तरह नियमों के अनुसार काम कर रहे हैं तो उन्हें डरने की जरूरत नहीं है। बस कागज दिखा दें। लेकिन समस्या तब होती है जब कागज दिखाने से ज्यादा आसान आरोप लगाना लगने लगे।

आखिर में वही बात –
आरी लकड़ी को काटती है, लेकिन सच की कलम व्यवस्था के भ्रम को काटती है। और शायद इसी कारण कुछ लोगों को पेड़ों से ज्यादा डर उस कैमरे से लगता है जो कटते हुए जंगल की तस्वीर दिखा देता है।

​अंतिम प्रश्न

​सवाल पत्रकार का नहीं, उस व्यवस्था का है जिसमें पेड़ कटने की खबर से ज्यादा चर्चा खबर दिखाने वाले की होने लगती है। याद रखिए—आरी लकड़ी को काटती है, लेकिन सच की कलम व्यवस्था के भ्रम को काटती है। और शायद इसी कारण कुछ लोगों को पेड़ों के गिरने की आवाज से ज्यादा डर उस कैमरे से लगता है जो कटते हुए जंगल की तस्वीर दिखा देता है।

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