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भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि के दिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है

03 Sep 2026, 06:26 PM • Vande Bharat Live TV News
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भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि के दिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है - नागपूर, महाराष्ट्र

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व प्रति वर्ष भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि के दिन मनाया जाता है ।श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का यह पावन पर्व प्रतिवर्ष भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य उत्सव के रूप में मनाया जाता है। भगवान श्री विष्णु जी ने भूलोक में अधर्म अनाचार, आसुरी शक्ति का दमन करने के लिए श्रीकृष्ण के रूप में वासुदेव और देवकी के यहां अवतार धारण किया था।

भगवान श्रीकृष्ण जी का जन्म मध्यरात्रि के समय हुआ था। श्रीकृष्ण के जन्म के समय रोहिणी नक्षत्र और चंद्र वृषभ राशि में था।.इस दिन श्रीकृष्ण तत्व पृथ्वी पर नित्य की तुलना में हजार गुना अधिक होता है।

हमारे भारतदेश में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का यह पावन पर्व बड़े ही उत्साह, ऋदधा भक्ति पूर्वक मनाया जाता है। प्रेमी भक्तजन श्रीकृष्ण को बहुत ही प्रेम से चित्त चोर ,मनमोहन, माखनचोर आदि नामों से पुकारते हैं।

श्रीकृष्ण का रूप सौन्दर्य वास्तव में चित्त, मन को मोहने वाला होता है। जन्माष्टमी के दिन जब छोटे छोटे बच्चों को मोर मुकुट पहनाकर मुरली उनके हाथों में देतें हैं ,तो उनका यह यह श्रीकृष्ण स्वरूप वास्तव में हमें श्रीकृष्ण की ओर आकर्षित कर लेता है।

भगवान श्रीकृष्ण सर्वगुण संपन्न, सोलह कलाओं से परिपूर्ण थे । उनके अनुपम रूप सौन्दर्य, गुणों के कारण ही श्रीकृष्ण की प्रतिमा भी मनमोहक बन जाती है।

श्रीकृष्ण का यह आकर्षण केवल बाहरी सौन्दर्य तक ही सीमित नहीं था, बल्कि श्रीकृष्ण के जीवन जीवन की आत्मिक आभा, उनकी पवित्रता प्रत्येक मन को भीतर तक स्पर्श कर जाती है। परंतु आज के इस कलयुगी सृष्टि में एक भी ऐसा मानव नहीं होगा, जिसका मन में क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, मोह, दंभ का से न भरा हो।

श्रीकृष्ण ही ऐसे थे जिनकी दृष्टि ,चित्त, कलुषित नहीं था, जिनके मन पर कभी क्रोध का प्रहार नहीं हुआ। श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन निर्विकारी है, जिस तन की मूर्ती सजाकर मंदिरों में रखी जाती है, वास्तव में उनका मन भी मंदिर की मूर्ति के समान अतीत सुंदर रहा होगा श्रीकृष्ण तन से ही देवता नहीं थे,उनके मन में भी देवत्व था।

क्या ? ,श्रीकृष्ण जन्म से ही महान थे, उन्होनें पूर्व जन्म में कोई महान पुरूषार्थ किया था ?, यह प्रश्न हमें उनके पूर्व जन्म की साधना ,पुरूषार्थ की ओर ले जाता है।

हर आत्मा अपने कर्मों के बीज से ही अपने आने वाले भविष्य का निर्धारण करती है। श्रीकृष्ण जी का जीवन भी इसी नियम का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

आज भी इस धरती पर जब कोई बच्चा जन्म लेता है ,तो अक्सर लोग कहतें हैं यह भी अपना भाग्य साथ में लेकर आया है। क्या श्रीकृष्ण भी अपना देवत्व भाग्य साथ लाएं होंगे ?,एक छंद भी प्रसिद्ध है " हे राधे तुमनें कौन सा ऐसा पुरूषार्थ किया था, जो कि बैकुंठधाम के स्वामी तुम्हारे अधिन हो गए, "।

वह कौन सा सर्वश्रेष्ठ पुरूषार्थ था जिससे श्रीकृष्ण ने सर्वश्रेष्ठ देवत्व पद को और राज्य भाग्य को प्राप्त किया था । महाभारत में लेख है कि श्रीकृष्ण योगीराज थे, वे सदा योग ध्यान किया करते थे,।

श्रीकृष्ण तो पूर्णत: तृप्त थे,उन्हें धर्म, धन, जीवन मुक्ति सभी श्रेष्ठ फल प्राप्त थे । यह विचार स्वयं में एक संकेत देता है कि श्रीकृष्ण जो दिव्य विशेषताएं, सोलह कलाओं, की पूर्णता श्रेष्ठ प्राप्तियों थी, वे सब उनके पूर्व जन्म की तपस्या, योग, गहन ज्ञान साधना, का ही फल है।

विकारों को जीतना ही सबसे बड़ा युद्ध होता है। मनुष्य मात्र को सदैव सदाचारी, श्रेष्ठ, और योगयुक्त रहना चाहिए ।

ईश्वरीय ज्ञान द्वारा ही नर से नारायण, और नारी को स्त्री से श्रीलक्ष्मी पद की प्राप्ति होती है।स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण जी अपने नारायण पद की प्राप्ति से पूर्व वाले जन्म में उन्होनें ने भी ज्ञान की धारणा की होगी ।आज के इस भौतिकवादी परिवेश में विचार करने की बात है कि क्या ?, श्रीकृष्ण जी जैसे आज के इस कलुषित दूषित वातावरण में जन्म ले सकतें हैं?। आज के समय में तमोगुण की प्रधानता है,सभी मानव क्रोध, ईर्ष्या, अहंंकाा, दंभ, द्वेष, के जाल में फंसे हुए हैं।

हर ओर भ्रष्टाचार, अनीति, धर्म ग्लानि, को देखकर एकबार फिर से श्रीकृष्ण जैसों के प्रकट होने के आशा रखतें हैं। गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण जी का वाक्य है- जब जब इस धरती पर अनाचार, अत्याचार, अधर्म बढ़ेगा, धर्म की ग्लानी होगी, तब तब धर्म की स्थापना के लिए मैं अवश्य आऊंगा।

वास्तव में ही इस कलयुगी अपवित्र, भ्रष्टाचारी ,सृष्टि में देवता भी अपना पांव रखने में घबराएंगे। श्रीकृष्ण जैसे तो सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर के आरंभ में ही जन्म लेते हैं, प्रकट होतें हैं, उन्हें स्वयंवर के पश्चात श्री नारायण कहतें हैं, श्री राधे को श्रीलक्ष्मी, और त्रेतायुग में जानकी जी को स्वयंवर के पश्चात सीताजी कहतें हैं।

जब जब पाप,अधर्म, अनाचार, भ्रष्टाचार का अंत और श्रेष्ठाचार की पुन: स्थापना करनी होती है, तब -तब श्रीकृष्ण जैसे जन्म लेतें हैं। श्रीकृष्ण की महानता को समझने के बाद मन में यह विचार और भी अधिक गहराता है कि क्या?

आज के इस परिवेश में ऐसा पुरूषार्थ फिर से संभव हो पायेगा?,आज कलयुगी परिवेश में हम देखते हैं कि मंदिरों में हर तरह से स्वच्छता रखी जाती है,शुद्ध भोजन का भोग लगाया जाता है, फिर मंदिरों में धूप दीप जलाकर वातावरण को सुगंधित-आलोकित किया जाता है, यह सब बातें यह दिखातीं है कि जैसे मंदिरों में के वातावरण को शुद्ध स्वच्छ, आलोकित रखा जाता है, वैसे ही हमारे मन और आत्मा रूपी मंदिर को भी अंदर से स्वच्छ, सुंदर पवित्र रखना आवश्यक है। आज के समय में जन्माष्टमी आदि पर्वों के अवसर पर भौतिक बिजली के बल्बों को जलाकर खूब रोशनी से सजाने का प्रयत्न करतें हैं, परंतु आज के इस भौतिकवादी परिवेश में .मनुष्य की आत्मा रूपी बल्ब का तो जैसे फ्यूज ही उड़ चुका है।.बाहरी रोशनी तो खूब की जाती है ,किंतु स्वयं आत्मा रूपी चिराग तले अंधारा रहता है।

आज इस बात की आवश्यकता है और ध्यान देने की बात है कि श्रीकृष्ण जी ने गीता ज्ञान राजयोग, कर्मयोग, के सतत अभ्यास से ही परमपद को प्राप्त किया था। आज के समय में लोग गायन पूजन तो बहुत करतें हैं किंतु जिस सर्वोत्तम पुरूषार्थ के द्वारा श्रीकृष्ण जी महान बनें, उस पुरूषार्थ पर अथवा ज्ञानयोग रूपी साधना पर ध्यान नहीं दिया जाता है।

हमारा सबका यह कर्तव्य यह है की ह। सभी श्रीकृष्ण जी के श्रेष्ठ जीवनशैली से प्रेरणा लेते हुए यथार्थ पुरूषार्थ करें, और दूसरों को भी प्रेरित करे।

हमारा कर्तव्य है कि हम भी श्रीकृष्ण जी के उच्च कोटि जीवन से सीखते हुए अपना और दूसरों का जीवन स्तर को भी उच्च कोटि का बनानें के लिए पुरूषार्थ करें। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल एक त्योहार, उत्सव, पर्व ही नहीं है, बल्कि यह आत्मा के जागरण का एक महत्वपूर्ण अवसर शुभ अवसर भी है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हमें यह याद दिलाता है कि जैसे श्रीकृष्ण जी ने अपने परम पुरूषार्थ से देवत्व को प्राप्त किया, हम भी ज्ञानयोग, कर्मयोग, योग आदि के परम पवित्र मार्ग पर चलकर अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर सकतें हैं। हर आत्मा यदि चाहे तो स्वयं को फिर से चैतन्य कृष्ण बना सकती है, इसके लिए संकल्प, साधना, सिद्धी के साथ चाहिए परमात्मा के साथ सत्य प्रेम ।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर ईश्वरीय संदेश भी है कि श्रीकृष्ण जी के अंदर जो मूल्य विशेषताएं हैं, उन्हें हम भी अपने इस जीवन में उतारने का सच्चा प्रयत्न करें, और गीता में वर्णित मनुष्य के अंदर छुपे हुए शत्रुओं- काम, क्रोध, अहंकार, दंभ, द्वेष, आदि का दमन करें, तो निश्चित रूप से ही श्रीकृष्ण जी जन्माष्टमी का यह पावन पवित्र पर्व सार्थक बन सकता है। आईए हम सब मिलकर इस पावन पवित्र जन्माष्टमी पर्व पर अपने अंर्तमन में भी आत्मिक प्रकाश को प्रज्ज्वलित करें, ज्ञानयोग, कर्मयोग, योगाभ्यास, और सेवाभाव का योग और पवित्रता के सुगंधित दीपों से अपने भारतभूमि को जगमगाएं।

।। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर सभी को हार्दिक हार्दिक बधाई, शुभकामनाऐं ।

सभी को खूब धन समृद्धि मिले, सबको उत्तम स्वास्थ्य मिले, सब दीर्घायु हों, ।। जय श्रीकृष्ण।

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