बस्ती में सियासी वादों की बौछार या चुनावी वैतरणी पार करने का हथकंडा? ‘बेस से स्पेस’ के दावों पर उठे गंभीर सवाल!

अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती में सियासी वादों का बाजार: ‘बेस से स्पेस’ के दावों के पीछे छिपी हकीकत क्या है?
👉100 युवाओं को रोजगार और 10,000 रुपये की आर्थिक सहायता: चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता का अता-पता नहीं!
👉36 जांचों वाली एंबुलेंस और घर-घर मुफ्त इलाज का दावा: स्वास्थ्य क्रांति या कागजी चुनावी स्टंट?
👉सिलाई मशीन और साड़ियों के वितरण से स्थायी विकास का दावा कितना जायज? बिना रोडमैप के हो रहे खोखले प्रचार!
👉विज्ञापनों और होर्डिंग्स की चमक-दमक बनाम ज़मीनी
हकीकत: नारों की सियासत से कब जागेगी बस्ती की जनता?
बस्ती जनपद की सियासत इन दिनों बड़े-बड़े विज्ञापनों, होर्डिंग्स और लोकलुभावन दावों से पटी पड़ी है। एक तरफ जहाँ राष्ट्रीय और प्रांतीय शीर्ष नेतृत्व के चित्रों से सजे पोस्टरों के सहारे राजनीतिक जमीन मजबूत करने की होड़ मची है, वहीं दूसरी तरफ आम जनता के बीच कुछ ऐसे दावे उछाले जा रहे हैं जो जितने आकर्षक हैं, उतने ही गंभीर सवाल भी खड़े करते हैं। सवाल यह है कि क्या यह जनता की वास्तविक सेवा का अभियान है या फिर चुनावी वैतरणी पार करने का एक और सुनियोजित हथकंडा?
सबसे बड़ा सवाल उन 100 युवाओं को लेकर है जिन्हें स्वरोजगार के नाम पर बैंक खातों में 10,000-10,000 रुपये देने और रोजगार उपलब्ध कराने का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। आखिर इस तथाकथित चयन प्रक्रिया का पारदर्शी पैमाना क्या था? क्या यह आर्थिक सहायता बिना किसी भेदभाव के समाज के हर अंतिम पात्र व्यक्ति तक पहुँची या यह प्रक्रिया चंद चहेतों और नजदीकियों तक ही सिमटकर रह गई? इस बात का कोई सार्वजनिक और स्पष्ट ब्योरा जनता के सामने क्यों नहीं लाया जाता?
इसी कड़ी में महिलाओं को सिलाई मशीन और साड़ियां वितरित कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। लेकिन क्या महज कुछ उपकरण बांट देने से महिलाओं का जीवन स्तर स्थायी रूप से बदल जाता है? क्या उनके कौशल विकास, उत्पादन के विपणन और उन्हें वित्तीय रूप से मजबूत करने का कोई ठोस ढांचा धरातल पर मौजूद है? यह सवाल हर उस नागरिक को पूछना चाहिए जो खोखले प्रचार और वास्तविक विकास के बीच का अंतर समझना चाहता है।
इन तमाम घोषणाओं के बीच सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला दावा ’36 प्रकार की जांच’ करने वाली उस विशेष एंबुलेंस का है, जिसके जरिए डॉक्टर और नर्स द्वारा घर-घर जाकर निशुल्क इलाज करने की बात कही जा रही है। सुनने में यह किसी स्वास्थ्य क्रांति जैसा प्रतीत होता है, लेकिन क्या ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की बुनियादी बदहाली के बीच यह मोबाइल वैन नियमित और निरंतर रूप से संचालित होगी या यह सिर्फ विज्ञापनों और सोशल मीडिया की सुर्खियों तक ही सीमित एक चुनावी स्टंट है?
बस्ती को ‘बेस से स्पेस’ तक पहुँचाने और इसे एक नई ऊंचाइयों पर ले जाने की जो बड़ी-बड़ी अभिलाषाएं जताई जा रही हैं, उनके समर्थकों को पहले यह जवाब देना होगा कि जिले की मूल समस्याओं—जैसे बेरोजगारी, पलायन और लचर स्वास्थ्य व्यवस्था—का उनके पास दीर्घकालिक रोडमैप क्या है? जनता अब सिर्फ नारों, होर्डिंग्स की चमक-दमक और कागजी दावों से बहकने वाली नहीं है। विकास विज्ञापनों के पन्नों पर नहीं, बल्कि धरातल पर दिखना चाहिए और हर वादे का हिसाब जनता मांगना जानती है।
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