केशवपुर का अनसुलझा रहस्य: महेश सिंह की मौत का सच सामने आएगा या फाइलों में दबकर रह जाएगा इंसाफ?

अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती में न्याय की मुंडेर पर लटका सवाल: क्या परशुरामपुर पुलिस ने महेश सिंह की मौत को ‘सुसाइड’ कहकर दफना दिया?
- बस्ती में खाकी की लीपापोती: क्या परशुरामपुर पुलिस ने महेश सिंह की संदिग्ध मौत को ‘सुसाइड’ कहकर दबा दिया?
- घुटनों के बल मिला शव और गले में फंदा: पुलिस की थ्योरी पर खड़े हो रहे कई गंभीर सवाल
- चौकी प्रभारी पंकज त्यागी पर गंभीर आरोप, आरोपियों को बचाने के लिए उच्चाधिकारियों को गुमराह करने का दावा
- दो बाइक सवार घर से बुलाकर ले गए थे, सुबह मिली लाश की खबर—फिर भी मुकदमा दर्ज करने से क्यों कतरा रही पुलिस?
बस्ती। 21 मार्च की रात परशुरामपुर थाना क्षेत्र के केशवपुर गांव में जो हुआ, वह महज़ एक आत्महत्या नहीं, बल्कि खाकी की कार्यप्रणाली पर गहराता एक ऐसा सवालिया निशान है जिसका जवाब देने से स्थानीय पुलिस कतरा रही है। पेड़ से फंदे के सहारे लटके होने का दावा करने वाले महेश सिंह का शव जब जमीन पर घुटनों के बल मिला, तो उसी वक्त से इस पूरी थ्योरी पर शक की सुई घूम गई थी। क्या कोई व्यक्ति इस अवस्था में खुदकुशी कर सकता है जहां उसके घुटने जमीन को छू रहे हों? यह वह बुनियादी सवाल है जो पहली नजर में ही हत्या की बू साफ दे रहा था, लेकिन परशुरामपुर पुलिस की आंखें इस शारीरिक और तार्किक विसंगति को देखने में असमर्थ साबित हुईं।
मृतक की मां का यह बयान इस मामले की रीढ़ को झकझोर देता है कि उस मनहूस रात दो बाइक सवार उनके घर आए थे और महेश को साथ बुलाकर ले गए थे। सुबह जब महेश की मौत की खबर गांव में फैली, तो पूरा इलाका सन्न रह गया, लेकिन उससे भी बड़ा आघात परिजनों को तब लगा जब पुलिस ने न्याय की गुहार सुनने के बजाय मामले को दबाने की अनधिकृत मुहिम छेड़ दी।
आखिर क्या वजह है कि परिजनों के चीख-पुकार और ठोस संदेह के बावजूद अब तक इस मामले में मुकदमा दर्ज नहीं किया गया? उंगली सीधे तौर पर घघौवा चौकी प्रभारी पंकज त्यागी पर उठ रही है। परिजनों का गंभीर आरोप है कि एसआई पंकज त्यागी ने आरोपियों को बचाने के लिए उच्चाधिकारियों को गुमराह किया और बिना किसी वैज्ञानिक या फॉरेंसिक पड़ताल के इसे आनन-फानन में आत्महत्या करार दे दिया। क्या एक खाकीधारी का काम सच की तह तक जाना है या फिर संदिग्ध मामलों की फाइल को बिना रीढ़ की हड्डी के बंद कर देना?
जांच के नाम पर पुलिसिया खानापूर्ति ने कई और अनसुलझे सवाल खड़े कर दिए हैं। उन दो अज्ञात बाइक सवारों की पहचान करने के लिए अब तक कौन से ठोस कदम उठाए गए? क्या उनकी मोबाइल लोकेशन और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) खंगालने की जहमत उठाई गई? यदि नहीं, तो यह सुस्ती नहीं बल्कि किसी बड़े संरक्षण की ओर इशारा करती है। जब प्राथमिक स्तर पर ही सबूतों को सहेजने के बजाय उन्हें नजरअंदाज किया जाए, तो पुलिस की नीयत पर शक होना लाजिमी है।
केशवपुर का यह प्रकरण महज़ एक युवक की संदिग्ध मौत का मामला नहीं है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था की संवेदनहीनता और पुलिसिया लीपापोती का जीवंत दस्तावेज बन चुका है। महेश सिंह के परिजनों का दर्द और गांव में सुलगती सुगबुगाहट इस बात की गवाही दे रही है कि सच्चाई को भले ही कुछ समय के लिए दबाया जा सके, पर उसे मिटाया नहीं जा सकता। अब निगाहें उच्चाधिकारियों पर टिकी हैं कि वे इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए चौकी प्रभारी की भूमिका की निष्पक्ष जांच कराएंगे या फिर महेश की मौत का सच परशुरामपुर थाने की किसी धूल फांकती फाइल में दम तोड़ता रहेगा।
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