हर्रैया तहसील घमासान: लेखपालों के आंदोलन के आगे झुका जिला प्रशासन, एसडीएम उमाकांत त्रिपाठी हटाए गए!

अजीत मिश्रा (खोजी)
🛑प्रशासन झुका या समझौता हुआ? हर्रैया एसडीएम के तबादले ने खड़े किए गंभीर प्रशासनिक सवाल🛑
👉प्रशासनिक नीति पर सवाल: क्या दबाव की राजनीति के आगे झुका प्रशासन, या यह एक सोची-समझी कार्रवाई थी?
👉बस्ती में ठप पड़े राजस्व कार्य: 550 गांवों में आम जनता पिसती रही, और अधिकारी कुर्सियां बचाते रहे!
👉तबादले के बाद नए सवाल: क्या अब लेखपालों के स्थानांतरण आदेश की भी होगी समीक्षा या ठंडे बस्ते में जाएगा फैसला?
👉हठधर्मिता बनाम सुशासन: विरोध के बस्तों और धरनों के साये में क्या अब तय होगी प्रशासनिक व्यवस्था?
बस्ती जिले की हर्रैया तहसील इन दिनों प्रशासनिक खींचतान और अफ़रा-तफ़री का मुख्य केंद्र बन चुकी है। लेखपालों के लंबे धरना-प्रदर्शन और कार्य बहिष्कार के बाद आखिरकार जिला प्रशासन को उपजिलाधिकारी (SDM) उमाकांत त्रिपाठी को पद से हटाना पड़ा।

यह कार्रवाई जितनी तेजी से हुई, उतने ही तीखे सवाल प्रशासनिक व्यवस्था और कार्यशैली पर खड़े होने लगे हैं। क्या यह निर्णय पूरी तरह प्रशासनिक आवश्यकता के तहत था, या फिर यह हठधर्मिता और दबाव की राजनीति के आगे शासन का समर्पण है?
दबे पांव झुकता प्रशासन या मजबूर व्यवस्था?
लेखपालों का यह आंदोलन केवल एक अधिकारी के तबादले तक सीमित नहीं था, बल्कि यह प्रशासनिक निर्णयों और कार्यप्रणाली पर सीधा प्रहार था। जब लंबे समय से एक ही तहसील में जमे लेखपालों के स्थानांतरण के आदेश जारी हुए, तो असंतोष बढ़ना स्वाभाविक था।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि वह स्थानांतरण आदेश पूरी तरह नियमों और प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता के तहत था, तो क्या कुछ दिनों के धरने और बस्ते जमा करने भर से हालात ऐसे बदल गए कि अधिकारी को ही हटाना पड़ गया? यदि शासन अपने ही फैसलों पर दृढ़ नहीं रह सकता, तो आम जनता के बीच उसकी साख का क्या संदेश जाता है?
जनता की परेशानी का ज़िम्मेदार कौन?
इस रस्साकशी के बीच सबसे बड़ी कीमत आम जनता को चुकानी पड़ी है। बस्ती जिले के करीब 550 गांवों में राजस्व संबंधी कार्य बुरी तरह प्रभावित हुए:
आय, जाति और निवास प्रमाणपत्रों का सत्यापन रुक गया।
वरासत, खतौनी और सीमांकन जैसे ज़रूरी काम ठप हो गए।
ग्रामीण और आम नागरिक तहसीलों के चक्कर काटते रहे, लेकिन उनकी सुधि लेने वाला कोई नहीं था।
क्या अधिकारियों और कर्मचारी संघों की इस लड़ाई में आम जनता को पिसने के लिए छोड़ देना ही आधुनिक सुशासन की परिभाषा है?
वे तीखे सवाल, जिनका जवाब प्रशासन को देना होगा
💫क्या लेखपालों के आंदोलन और कार्य बहिष्कार के दबाव में आकर प्रशासनिक निर्णय बदला गया?
💫यदि स्थानांतरण शासनादेश और प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर हुआ था, तो अब अचानक उसकी समीक्षा की नौबत क्यों आई?
💫यदि वर्षों से एक ही स्थान पर जमे रहना नियमों के विरुद्ध था, तो क्या वह आदेश अब पूरी तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
💫तहसील में ठप रहे राजस्व कार्यों और आम जनता की परेशानी के नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
एसडीएम उमाकांत त्रिपाठी को हटाए जाने के बाद अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जिला प्रशासन अपने अगले कदम में क्या रुख अपनाता है। यदि व्यवस्था इसी तरह दबाव के आगे झुकती रही, तो कानून का राज स्थापित करना और प्रशासनिक अनुशासन बनाए रखना असंभव हो जाएगा।
जिला प्रशासन को अब स्पष्ट करना होगा कि क्या व्यवस्था नियमों के अनुसार चलेगी या फिर विरोध के बस्तों और धरनों के साये में तय होगी?
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