यूपी में रेस्टोरेंट और कैफे में हुक्का परोसना पूरी तरह गैरकानूनी: इलाहाबाद हाईकोर्ट का कड़ा फैसला

अजीत मिश्रा (खोजी)
धूएं के छल्ले में उड़ते भविष्य पर हाईकोर्ट का कड़ा प्रहार: यूपी में हुक्का बारों की आड़ में चल रहे खेल का अंत
💫’स्मोकिंग जोन’ या उपकरण किराए पर देने का बहाना नहीं चलेगा, हाईकोर्ट ने खारिज की हुक्का बार संचालकों की दलीलें
व्यापार के अधिकार से बड़ा नागरिकों का स्वच्छ हवा में सांस लेने का हक: कोर्ट
💫एफएसडीए और नगर निगम के पास हुक्का बार का लाइसेंस देने का कोई अधिकार नहीं: हाईकोर्ट
💫यूपी में हुक्का बारों पर न्यायिक प्रहार: सभी याचिकाएं खारिज, अवैध संचालन पर होगी सख्त कार्रवाई
उत्तर प्रदेश के रेस्टोरेंट, कैफे और लाउंज की आड़ में युवाओं के फेफड़ों को धुएं से पाटने वाले कारोबारियों के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ का यह फैसला एक कठोर और ऐतिहासिक संदेश है। अदालत ने साफ कर दिया है कि व्यापार की स्वतंत्रता के नाम पर सार्वजनिक स्वास्थ्य और नई पीढ़ी की जिंदगी के साथ खिलवाड़ अब किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह फैसला उन तमाम व्यावसायिक अड़गड़ों और कानूनी पैंतरों पर करारा तमाचा है, जिनकी आड़ में हुक्का बार संचालक खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ा रहे थे।
हुक्का बार संचालकों के हर बहाने और झूठ की हवा हवाई
लंबे समय से हुक्का बार संचालक कुछेक स्थापित नियमों से बचने के लिए भ्रामक तर्कों का सहारा लेते आए हैं। हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया है:
👉’स्मोकिंग जोन’ का बहाना खारिज: अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि सार्वजनिक स्थानों पर निर्धारित धूम्रपान क्षेत्र (Smoking Zone) होने का हवाला देकर हुक्का परोसना सीधे तौर पर 2017 के संशोधित धूम्रपान निषेध नियमों का उल्लंघन है।
👉संचालकों का यह तर्क कि वे केवल हुक्का उपकरण किराये पर देते हैं, तंबाकू नहीं बेचते—अदालत ने पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि हुक्का तैयार करना, उसमें सामग्री भरना और ग्राहक तक पहुंचाना एक पूरी ‘सेवा’ (Service) है, जिसे केवल उपकरण किराए पर देने की गतिविधि नहीं कहा जा सकता।
👉न्यायालय ने दो टूक शब्दों में कहा कि खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) और नगर निगमों के पास हुक्का बार संचालन के लिए लाइसेंस जारी करने का कोई अधिकार नहीं है।
व्यापार का अधिकार बनाम स्वच्छ हवा में सांस लेने का हक
🎯एक तरफ जहां बार संचालक अपने व्यावसायिक हितों और मुनाफे का हवाला देते हैं, वहीं अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 का दायरा स्पष्ट करते हुए याद दिलाया कि स्वच्छ हवा में सांस लेना और तंबाकू के धुएं के अनैच्छिक संपर्क से बचना नागरिकों का मौलिक अधिकार है।
🎯किसी भी प्रतिष्ठान के कमर्शियल प्रॉफिट के आगे वहां मौजूद गैर-धूम्रपान करने वाले आम नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार को कमतर नहीं आंका जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 47 के तहत लोक स्वास्थ्य की रक्षा करना राज्य का प्राथमिक दायित्व है, और कोर्ट ने उसी दायित्व को पूरी दृढ़ता से लागू किया है।
प्रशासनिक मिलीभगत पर सवाल और सख्त कार्रवाई का रास्ता
यह फैसला सिर्फ एक न्यायिक आदेश नहीं, बल्कि उन सुस्त प्रशासनिक तंत्रों और स्थानीय निकायों के लिए एक चेतावनी है, जिनकी नाक के नीचे शहरी इलाकों में अवैध हुक्का बार पनप रहे थे। जब लाइसेंस देने का कानूनी अधिकार ही इन विभागों के पास नहीं है, तो এতদিন इन पर नरमी क्यों बरती गई? अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद पुलिस और प्रशासन के पास यह पुख्ता कानूनी आधार है कि वे नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी करें, सामान जब्त करें और कड़ी दंडात्मक कार्रवाई को अंजाम दें।
युवाओं के लिए एक गंभीर सबक: शौक से लत तक का सफर
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ द्वारा साझा किया गया निजी संस्मरण आज की युवा पीढ़ी के लिए एक बड़ा आईना है। लॉ स्कूल के दिनों में मजाक-मजाक में लिया गया सिगरेट का एक कश किस तरह एक लाइलाज आदत में बदल गया, यह कहानी आज के हर उस युवा की है जो कूल दिखने या ट्रेंड के चक्कर में हुक्के या सिगरेट के धुएं में अपना जीवन झोंक रहा है। पहली गलती को मामूली समझकर नजरअंदाज करना आगे चलकर किस कदर भारी पड़ता है, यह अनुभव युवाओं को झकझोरने के लिए काफी है।
निष्कर्ष: इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला उत्तर प्रदेश में पनप रही उस जहरीली संस्कृति पर लगाम लगाने के लिए मील का पत्थर साबित होगा, जो युवाओं को खोखला कर रही थी। अब प्रशासन, पुलिस और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है कि वे बिना किसी ढिलाई के इस आदेश को जमीन पर उतारें, ताकि हमारे पार्क, रेस्टोरेंट और सार्वजनिक स्थल जहर मुक्त और सुरक्षित बन सकें।
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