17 साल में सिर्फ 23 दिन का काम! नरेगा के ‘गारंटी’ वाले दावों की खुली पोल

अजीत मिश्रा (खोजी)
नरेगा में धांधली या गरीबों के हक पर डाका? 17 सालों में मजदूर को मिले केवल 23 दिन का काम!
- कागजों में रोजगार का ढोंग: ग्राम सभा दौलत चक में नरेगा बना गरीबों के लिए छलावा!
- जब अधिकार मांगने पर मिली खामोशी: जॉब कार्ड धारक बुद्धि सागर का हक मार रहा कौन?
- बहादुरपुर ब्लॉक में नरेगा घोटाला? 2009 से अब तक मजदूर को तरसाया काम के लिए
- 100 दिन की गारंटी बनाम 17 साल में 23 दिन: दौलत चक के प्रधान और तंत्र पर उठे सवाल!
- नरेगा की फाइलों में भ्रष्टाचार का खेल! ग्राम फेटवा के पीड़ित मजदूर ने खोली व्यवस्था की कलाई
बस्ती (बहादुरपुर)। केंद्र व राज्य सरकारें जहां ग्रामीण अंचल के निर्धन और असहाय परिवारों को रोजगार की गारंटी देने के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का बढ़-चढ़कर ढिंढोरा पीटती हैं, वहीं बस्ती जिले के बहादुरपुर ब्लॉक स्थित ग्राम सभा दौलत चक में इस योजना का कड़वा सच उजागर हुआ है। ग्राम फेटवा के रहने वाले जॉब कार्ड धारक बुद्धि सागर उपाध्याय के साथ जो हुआ, वह नरेगा के दावों और स्थानीय ग्राम पंचायत प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

17 साल पुराना जॉब कार्ड, काम के नाम पर सिर्फ छलावा
प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम फेटवा (पोस्ट गौसपुर, थाना कलवारी, ब्लॉक बहादुरपुर) निवासी बुद्धि सागर उपाध्याय (पिता- रामबहादुर) का नरेगा जॉब कार्ड संख्या 315301201800137 वर्ष 2009 (12-12-2009) में पंजीकृत किया गया था।
हैरत की बात यह है कि बीते लगभग 17 वर्षों की लंबी अवधि में इस कार्डधारक को पूरी जिंदगी में मात्र 23 दिन का काम दिया गया है! जॉब कार्ड के पन्नों पर दर्ज विवरण खुद इस बात की तस्दीक करता है कि किस तरह गरीब मजदूर को काम के अधिकार से वंचित रखा गया है।
काम मांगने पर साधी जाती है चुप्पी
पीड़ित बुद्धि सागर उपाध्याय का आरोप है कि उन्हें कभी भी नरेगा में कार्य हेतु पंचायत या प्रधान प्रतिनिधि द्वारा नहीं बुलाया जाता। जब भी वे अपने अधिकार के तहत काम की मांग करने जाते हैं, तो उन्हें कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया जाता और टालमटोल कर भगा दिया जाता है।
ग्राम सभा दौलत चक के प्रधान संतराम चौधरी और संबंधित पंचायत स्तर के जिम्मेदार अधिकारियों की इस बेरुखी ने मजदूर को भुखमरी और हताशा की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। सवाल यह उठता है कि:
- जब शासन प्रतिवर्ष 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देता है, तो 17 वर्षों में केवल 23 दिन का काम कैसे मिला?
- क्या कागजों में फर्जी मस्टररोल भरकर काम का बजट खपाया जा रहा है या वाकई गरीब मजदूरों की अनदेखी की जा रही है?
जवाबदेही से कब तक बचेंगे जिम्मेदार?
नरेगा अधिनियम के तहत यदि जॉब कार्ड धारक काम मांगता है और उसे काम नहीं दिया जाता, तो वह बेरोजगारी भत्ते का हकदार होता है। लेकिन यहाँ न तो मजदूर को काम दिया जा रहा है और न ही किसी प्रकार की जानकारी।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल एक बुद्धि सागर उपाध्याय का मामला नहीं हो सकता, अगर निष्पक्ष जांच की जाए तो कई ऐसे जॉब कार्ड निकलेंगे जो सिर्फ सरकारी फाइलों और अलमारियों की धूल चाट रहे हैं। अब देखना यह होगा कि खंड विकास अधिकारी (BDO) बहादुरपुर और जिला विकास अधिकारी इस गंभीर लापरवाही और धांधली पर क्या संज्ञान लेते हैं।
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