सियासत के साये में डूबी गाढ़ी कमाई: टाइम सिटी ग्रुप और पूर्व विधायक पर धोखाधड़ी के गंभीर आरोप

अजीत मिश्रा (खोजी)
सियासत के साये में डूबी गाढ़ी कमाई: टाइम सिटी ग्रुप और पूर्व विधायक पर लगे धोखाधड़ी के गंभीर आरोप
- भरोसे का सौदा या राजनीतिक साजिश? बस्ती में टाइम सिटी कंपनी के निवेशकों का फूटा गुस्सा
- पूर्व विधायक की कंपनी पर लगा जमीनों की हेराफेरी और धोखाधड़ी का आरोप, निवेशकों ने मांगी निष्पक्ष जांच
- ‘राजनीतिक षड्यंत्र’ बनाम ‘जनता की लूट’: टाइम सिटी विवाद में घिरे पूर्व विधायक चंद्र प्रकाश शुक्ला
- सहकारी निवेश के नाम पर बड़ा फर्जीवाड़ा? निवेशकों का दावा— न पैसे मिले, न जमीन
बस्ती।। राजनीति में जनता का भरोसा ही राजनेता की सबसे बड़ी पूंजी माना जाता है। लेकिन जब यही भरोसा निजी कंपनियों के जरिए जनता की गाढ़ी कमाई को हड़पने का जरिया बन जाए, तो लोकतंत्र की नींव हिल जाती है। बस्ती जनपद की कप्तानगंज विधानसभा सीट से पूर्व विधायक और चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) चंद्र प्रकाश शुक्ला एक बार फिर ऐसे ही गंभीर विवाद के केंद्र में हैं। ‘टाइम सिटी ग्रुप’ के निवेशकों द्वारा लगाए गए धोखाधड़ी के आरोप और पूर्व विधायक का इसे ‘राजनीतिक षड्यंत्र’ बताना, इस पूरे मामले को एक पेचीदा मोड़ दे रहा है।
भरोसे के नाम पर ठगी का जाल?
वर्ष 2010 में स्थापित ‘टाइम सिटी मल्टी स्टेट क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड’ ने जब अपने पैर पसारने शुरू किए थे, तब आम जनता को यह अंदाजा नहीं था कि उनकी बचत का यह सफर धोखे की एक लंबी दास्तान बन जाएगा। निवेशकों का आरोप है कि कंपनी के सीएमडी/एमडी रहे चंद्र प्रकाश शुक्ला के 2017 में विधायक बनने के बाद, उनके राजनीतिक रसूख और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को देखकर लोगों ने अंधाधुंध निवेश किया।
सवाल यह उठता है कि क्या राजनेताओं की लोकप्रियता का इस्तेमाल जनता को आर्थिक जाल में फंसाने के लिए किया जाता है? जब निवेशकों ने अपनी पूंजी वापस मांगी, तो उन्हें पैसे लौटाने के बजाय जमीनों के जरिए ‘निवेश सुरक्षित करने’ का झांसा दिया गया। लेकिन असली खेल इसके बाद शुरू हुआ—बस्ती में खरीदी गई जमीनों को कथित रूप से कूटरचित (फर्जी) दस्तावेजों के सहारे अन्य लोगों को बेच दिया गया।
धमकाने के आरोप और सवालों के घेरे में प्रशासन
प्रेसवार्ता में मऊ और गोरखपुर से आए निवेशकों (जैसे आलोक श्रीवास्तव और राजेंद्र यादव) के दर्द ने व्यवस्था की पोल खोल दी है। उनका आरोप है कि न्याय मांगने पर उन्हें डराया-धमकाया गया और अभद्र भाषा का सामना करना पड़ा। बोर्ड बदलकर जमीनों का अवैध तरीके से हस्तांतरण करना इस बात की ओर इशारा करता है कि मामले की जड़ें काफी गहरी हैं।
यदि पूर्व विधायक 2017 में ही कंपनी से इस्तीफा दे चुके थे, जैसा कि उनका दावा है, तो क्या कंपनी के कागजातों और शेयरहोल्डिंग में यह बदलाव कानूनी रूप से पारदर्शी था? क्या केवल इस्तीफा दे देने से जनता के प्रति नैतिक जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?
‘राजनीतिक षड्यंत्र’ का पुराना हथकंडा
हर बार की तरह, इस बार भी आरोपों के घेरे में आए राजनेता ने इसे अपनी छवि धूमिल करने का ‘राजनीतिक षड्यंत्र’ करार दिया है। राजनीति में जब भी कोई गंभीर आर्थिक या आपराधिक आरोप लगता है, तो उसे तुरंत विरोधी दलों की चाल बताकर मामले की गंभीरता को पाटने की कोशिश की जाती है। यदि पूर्व विधायक बेकसूर हैं, तो वे कानूनी लड़ाई की बात करने के साथ-साथ निवेशकों के डूबे हुए पैसे और जमीनों का हिसाब सार्वजनिक करने से क्यों कतरा रहे हैं?
सच्चाई सामने लाने की अग्निपरीक्षा
यह मामला केवल एक कंपनी या एक राजनेता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सैंकड़ों छोटे निवेशकों की उम्मीदों का सवाल है जिन्होंने पाई-पाई जोड़कर अपना भविष्य सुरक्षित करने का सपना देखा था। अब जरूरत इस बात की है कि जिला प्रशासन और सहकारिता विभाग बिना किसी राजनीतिक दबाव के इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच करे।
जमीन की खरीद-बिक्री के दस्तावेज, कंपनी के बोर्ड में हुए फेरबदल और पैसों के लेन-देन के पुख्ता सबूत ही तय करेंगे कि सच क्या है। अगर जनता के विश्वास का इस तरह सौदा करने वाले चेहरों पर बेनकाब होने का डर नहीं होगा, तो लोकतंत्र में आम आदमी का भरोसा हमेशा के लिए टूट जाएगा।
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