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उत्तर प्रदेश

मखौड़ाधाम अंत्येष्टि स्थल: प्रशासनिक लापरवाही और बदहाली की भेंट चढ़ी मानवीय संवेदनाएं

16 Jun 2026, 11:38 AM • Vande Bharat Live TV News
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अजीत मिश्रा (खोजी)

अंतिम संस्कार में भी ‘तमाशा’: मखौड़ाधाम प्रशासन की असंवेदनशीलता का शर्मनाक चेहरा

संपादकीय

  • अंतिम विदाई भी मुश्किल: सुविधाओं के अभाव में मखौड़ाधाम में खुले आसमान के नीचे खड़े होने को विवश लोग
  • धार्मिक महत्व के मखौड़ाधाम में बदहाली का तांडव: अंत्येष्टि स्थल पर न छाया, न बैठने की व्यवस्था
  • मखौड़ाधाम अंत्येष्टि स्थल की सुध लेने वाला कोई नहीं; क्या प्रशासनिक संवेदनशीलता मर चुकी है?

​धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण मखौड़ाधाम का अंत्येष्टि स्थल इन दिनों घोर बदहाली का सामना कर रहा है। यहाँ अंतिम संस्कार के लिए आने वाले शोकाकुल परिजनों को न केवल अपने प्रियजन को खोने का दुख झेलना पड़ रहा है, बल्कि मूलभूत सुविधाओं के अभाव में भीषण धूप और अव्यवस्था के बीच समय बिताना पड़ रहा है। अक्सर कहा जाता है कि इंसान के जीवन का अंतिम पड़ाव सम्मानजनक होना चाहिए। लेकिन उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले मखौड़ाधाम में आज स्थिति यह है कि जीवित तो छोड़िए, मृतक और उनके परिजनों को भी सम्मान मिलना दूभर हो गया है। मखौड़ाधाम के अंत्येष्टि स्थल की बदहाली और वहां मौजूद प्रशासनिक उदासीनता न केवल व्यवस्था की विफलता को दर्शाती है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं के पूरी तरह मर जाने का प्रमाण है।

टिनशेड उखड़ने के बाद से बदहाल स्थिति

क्षेत्र में आई तेज आंधी-पानी के कारण अंत्येष्टि परिसर में लगा टिनशेड उखड़कर गिर गया था। इस घटना को बीते कई दिन हो चुके हैं, लेकिन जिम्मेदार विभागों द्वारा इसकी मरम्मत या पुनर्संथापना के लिए अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। इसके परिणामस्वरूप, दाह संस्कार में शामिल होने वाले लोग खुले आसमान के नीचे खड़े रहने को विवश हैं। भीषण गर्मी और तेज धूप में परिजन अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार के दौरान खुले आसमान के नीचे खड़े होने को मजबूर हैं। कुछ दिन पहले आई आंधी-पानी में वहां लगा टिनशेड उड़कर गिर गया था। एक अत्यंत साधारण टिनशेड की मरम्मत न कर पाना प्रशासन की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

परिजनों की पीड़ा और सुविधाओं का घोर अभाव

  • धूप और गर्मी की मार: शव के पूर्ण दाह संस्कार की प्रक्रिया में करीब ढाई घंटे का समय लग जाता है, जिसके दौरान शोकाकुल परिवार को तेज धूप और गर्मी में खड़ा रहना पड़ता है।
  • छाया का अभाव: दाह स्थल के आसपास कोई छायादार वृक्ष नहीं है, जिससे लोगों को तनिक भी राहत नहीं मिल पाती।
  • स्वच्छता और बैठने की कमी: स्थानीय निवासी रामपूजन, पंकज, और अवधेश कन्नौजिया के अनुसार, यहां न तो बैठने की पर्याप्त व्यवस्था है और न ही स्वच्छता पर कोई ध्यान दिया जा रहा है।

​स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि प्रशासन पूरी तरह से बेखबर है। अंतिम संस्कार में शामिल होने आए लोगों को धूप और गर्मी में घंटों खड़ा रहना पड़ता है, और वहां राहत के लिए कोई छायादार वृक्ष तक उपलब्ध नहीं है। जब किसी भी मृतक के दाह संस्कार में ढाई घंटे तक का समय लग सकता है, तब ऐसी अव्यवस्था परिजनों के दुख को और भी गहरा कर देती है।

ग्रामीणों और स्थानीय लोगों में आक्रोश

मखौड़ाधाम आने वाले लोगों का कहना है कि यह स्थान भगवान श्रीराम के जन्म प्रसंग से जुड़ा है, जहाँ प्रतिदिन भारी संख्या में श्रद्धालु और आमजन आते हैं। इसके बावजूद, सुविधाओं के नाम पर केवल घोर उपेक्षा देखने को मिल रही है। स्थानीय ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि:

  • अंत्येष्टि स्थल पर तत्काल टिनशेड की मरम्मत कराई जाए।
  • परिसर की साफ-सफाई और बैठने की उचित व्यवस्था की जाए।
  • छाया के लिए परिसर में छायादार वृक्षों का रोपण किया जाए, ताकि शोक में डूबे परिवारों को कुछ मूलभूत राहत मिल सके।

स्थानीय निवासियों ने व्यवस्था को ‘असंवेदनशीलता’ की पराकाष्ठा बताया है। यह मखौड़ाधाम की गरिमा के साथ सीधा खिलवाड़ है, जहाँ हर रोज बड़ी संख्या में लोग आते हैं।

प्रशासन का पक्ष

इस मामले पर बीड़ीओ (BDO) विनोद कुमार सिंह ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि इस समस्या का जल्द ही समाधान कराया जाएगा। अब देखना यह है कि प्रशासन के दावों को धरातल पर उतरने में कितना समय लगता है।

​बीड़ीओ विनोद कुमार सिंह ने समस्या का जल्द समाधान करने का आश्वासन तो दिया है, लेकिन क्या प्रशासन को यह तभी याद आता है जब मीडिया में सुर्खियां बनती हैं? एक धार्मिक स्थल पर मूलभूत सुविधाओं का ऐसा अभाव प्रशासन के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के दावों की हवा निकाल देता है।

​समय आ गया है कि जिम्मेदार अधिकारी कागजी आश्वासनों से बाहर निकलकर धरातल पर काम करें। मखौड़ाधाम के अंत्येष्टि स्थल पर न केवल टिनशेड की तत्काल मरम्मत होनी चाहिए, बल्कि वहां स्वच्छता और बैठने की उचित व्यवस्था भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। क्या हम इतने असंवेदनशील हो चुके हैं कि अब अंतिम संस्कार के लिए आए लोगों को भी मूलभूत सुविधाएं नहीं दे सकते?

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