मनोरमा जनजागृति यात्रा बनाम जिला प्रशासन: आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच फंसा न्याय का सवाल

अजीत मिश्रा (खोजी)
प्रशासनिक तानाशाही या संवादहीनता? ‘मनोरमा जनजागृति यात्रा’ के सवालों पर मौन क्यों जिला प्रशासन?
- क्या बस्ती प्रशासन जनता की आवाज से भाग रहा है? एक प्रशासनिक विफलता की कहानी
- लोकतंत्र में जवाबदेही का अभाव: मनोरमा जनजागृति यात्रा के साथ प्रशासन का ‘असंवेदनशील’ रवैया
- “जो धूप में 150 किमी चल सकते हैं, वो झूठे नहीं” – प्रशासन को चंद्र मणि पांडेय का खुला चैलेंज!
- बस्ती प्रशासन की ‘खेला’ नीति: ज्ञापन लेने से बचते रहे अधिकारी, अब आर-पार की तैयारी
बस्ती। चिलचिलाती धूप में 150 किलोमीटर की मोटरसाइकिल यात्रा कर न्याय की मांग करने वाले सैकड़ों लोग क्या महज ‘झूठे’ हो सकते हैं? यह सवाल चंद्र मणि पांडेय ने जिला प्रशासन की कार्यशैली पर उठाते हुए कहा है कि जो लोग इतने संघर्ष के साथ अपनी आवाज उठाने पहुंचे, उन्हें खारिज कर देना प्रशासन की संवेदनहीनता को दर्शाता है।
हाल ही में ‘मनोरमा जनजागृति यात्रा’ के दौरान हुए घटनाक्रम पर जिला प्रशासन द्वारा सफाई दी गई, जिसे चंद्र मणि पांडेय ने सिरे से नकारते हुए साक्ष्यों के साथ प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया है।
प्रशासन के दावों की सच्चाई और साक्ष्यात्मक जवाब
प्रशासन द्वारा लगाए गए आरोपों पर विस्तृत खंडन करते हुए चंद्र मणि पांडेय ने बिंदुवार अपना पक्ष रखा है:
- संवाद की स्थिति: प्रशासन का दावा है कि वे ज्ञापन लेने को तत्पर थे। इस पर पांडेय का कहना है कि हम जिलाधिकारी को सार्वजनिक रूप से ज्ञापन देकर अब तक की गई कार्यवाही का ब्योरा मांग रहे थे, न कि बंद कमरे की खानापूर्ति।
- विकास भवन प्रकरण: प्रशासन का कहना है कि उन्होंने हमें विकास भवन नहीं भेजा। जबकि, वीडियो साक्ष्यों में स्पष्ट है कि सीआरओ बस्ती, डीसी मनरेगा और उपजिलाधिकारी ने स्वयं हमें विकास भवन सभागार जाने और वहां संबंधित अधिकारियों से वार्ता करने का निर्देश दिया था। हम तो यह वार्ता कलेक्ट्रेट सभागार में करने की मांग कर रहे थे।
- सभागार की बिजली: प्रशासन का तर्क है कि लाइट काटी नहीं गई, बल्कि कट गई थी। सवाल यह है कि यदि तकनीकी खराबी थी, तो क्या विकास भवन में जनरेटर की कोई व्यवस्था नहीं थी? या फिर जनजागृति यात्रा में शामिल सैकड़ों लोगों के लिए पीने के पानी तक पूछने की शिष्टता प्रशासन ने क्यों नहीं दिखाई?
- अधिकारियों की अनुपस्थिति: प्रशासन के अनुसार जिलाधिकारी कार्यालय में अधिकारी जा चुके थे। वहीं पांडेय का कहना है कि सीसीटीवी फुटेज इसकी सच्चाई खोल देगा। जब हम कार्यालय पहुंचे, तब भी वहां अधिकारी मौजूद थे। हमने गार्डों से संपर्क किया, दरवाजा खटखटाया, लेकिन प्रशासनिक अधिकारी पिछले रास्ते से निकल गए। कलेक्ट्रेट के सामने घंटों तक हमारे साथी फर्श पर बैठे रहे, लेकिन किसी भी अधिकारी ने सुध लेना उचित नहीं समझा।
’अधिकारी खुदा नहीं, जनता के नौकर हैं’
चंद्र मणि पांडेय ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि प्रशासन का यह रवैया आम जनता के प्रति उनकी जवाबदेही पर बड़े प्रश्नचिह्न लगाता है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा, “अधिकारी का अर्थ ‘खुदा’ नहीं, बल्कि ‘जनता का नौकर’ होता है।”
अंतिम चेतावनी:
प्रशासन को यह स्पष्ट किया गया है कि यदि आगामी शनिवार तक ‘मनोरमा जनजागृति यात्रा’ की मांगों पर ठोस कार्यवाही नहीं की गई, तो जिला प्रशासन के विरुद्ध एक बड़ा और उग्र आंदोलन शुरू करने के लिए वे बाध्य होंगे।
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