उत्तर प्रदेशबस्ती

बस्ती चीनी मिल नीलामी: 85 करोड़ की संपत्ति 41 करोड़ में कैसे बिकी? गंभीर अनियमितताओं के आरोप

बस्ती चीनी मिल नीलामी: 85 करोड़ का आरक्षित मूल्य 41 करोड़ में कैसे बदला? मचा हड़कंप चीनी मिल नीलामी में बड़ा भ्रष्टाचार: एमएलसी देवेन्द्र प्रताप सिंह ने मांगा 7 दिन में हिसाब

अजीत मिश्रा (खोजी)

संपादकीय: ‘बस्ती’ चीनी मिल की नीलामी: विकास का सौदा या भ्रष्टाचार का खुला खेल?

  • बस्ती में ‘कौड़ी के भाव’ बिक गई चीनी मिल! नीलामी प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल
  • क्या चीनी मिल की संपत्ति का हुआ बंदरबांट? नीलामी से मिले 41 करोड़ के खर्च का मांगा गया ब्योरा
  • बस्ती चीनी मिल विवाद: अधिकारियों की भूमिका संदेह के घेरे में, किसानों के बकाये पर मची तनातनी

बस्ती। जनपद की ऐतिहासिक ‘बस्ती चीनी मिल’ का वजूद अब केवल यादों में सिमटकर रह गया है, लेकिन इसके अवसान की कहानी जिस तरह से सामने आई है, वह सरकारी तंत्र की पारदर्शिता पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है। जिस मिल को कभी इस क्षेत्र की आर्थिक रीढ़ माना जाता था, आज उसकी नीलामी ‘कौड़ी के भाव’ में होने के बाद मचे बवाल ने कई गंभीर संदेहों को जन्म दे दिया है।जनपद बस्ती की ऐतिहासिक चीनी मिल की नीलामी प्रक्रिया एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गई है। विधान परिषद सदस्य (MLC) देवेन्द्र प्रताप सिंह ने इस पूरी नीलामी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े करते हुए बस्ती मंडल के आयुक्त को पत्र लिखकर जवाब-तलब किया है। उन्होंने इस मामले में 7 दिनों के भीतर साक्ष्यों के साथ विस्तृत ब्योरा माँगा है।

85 से 41 करोड़ का सफर: पारदर्शिता या मिलीभगत?

सबसे बड़ा और चौंकाने वाला सवाल यह है कि जिस संपत्ति का आरक्षित मूल्य 85 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया था, वह आखिर किन परिस्थितियों में घटकर 41 करोड़ पर आ गया? क्या यह कोई सामान्य प्रक्रिया थी या फिर किसी खास चहेते को लाभ पहुँचाने की सोची-समझी साजिश? करोड़ों रुपये की इस भारी कटौती का आधार क्या था, इसका जवाब प्रशासन को देना ही होगा।

नीलामी प्रक्रिया पर उठे मुख्य सवाल

एमएलसी देवेन्द्र प्रताप सिंह ने इस मामले में सात मुख्य बिंदु उठाए हैं, जो प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गहरा संदेह पैदा करते हैं:

  • मूल्य में भारी कटौती: मिल का आरक्षित मूल्य पहले 85 करोड़ रुपये तय किया गया था, जिसे बाद में घटाकर मात्र 41 करोड़ रुपये कर दिया गया। एमएलसी ने इस कटौती के आधार और संबंधित शासनादेश की मांग की है।
  • मूल्यांकन की प्रक्रिया: लगभग 300 करोड़ रुपये की संपत्ति का मूल्यांकन क्या किसी अधिकृत सरकारी एजेंसी द्वारा किया गया था? यदि हाँ, तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करने को कहा गया है, अन्यथा इसे भारी अनियमितता माना गया है।
  • संपत्ति का गायब विवरण: 41 करोड़ रुपये की नीलामी में किन मशीनों, कल-पुर्जों और उपकरणों को शामिल किया गया था, इसका कोई स्पष्ट ब्योरा नहीं है। प्रबंधन से इन वस्तुओं की प्रमाणित सूची मांगी गई है।
  • भवनों को तोड़ने का मामला: नीलामी के बाद समय-सीमा समाप्त होने के बावजूद मिल के भवनों की ईंटें तक निकाली जा रही हैं। सवाल यह है कि क्या भवन ईंट और चौखट नीलामी का हिस्सा थे, और यदि नहीं, तो किस आदेश से उन्हें तोड़ा जा रहा है?
  • धनराशि का खर्च: नीलामी से प्राप्त 41 करोड़ रुपये का खर्च किस मद में किया गया है, इसका वाउचर सहित पूरा ब्योरा मांगा गया है।
  • अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका: मिल प्रबंधन के आरसी पाड़ी, एनके शुक्ल और बजाज हिंदुस्तान शुगर रुधौली के स्टीम इंजीनियर सुभाष चौधरी की भूमिका की जांच की मांग की गई है। आरोप है कि नीलामी में सबसे बड़ा भ्रष्टाचार इन्हीं के द्वारा किया गया है।
  • किसान-मजदूरों के बकाये पर चुप्पी: रुधौली स्थित चीनी मिल के मौसमी और नियमित कर्मचारी, किसान व व्यापारी पिछले लगभग 360 दिनों से अपने बकाया भुगतान के लिए धरना दे रहे हैं। नीलामी से मिली राशि से उनका भुगतान न होने पर सवाल उठाया गया है।

सवालों के घेरे में ‘मूल्यांकन’ और ‘प्रबंधन’

एमएलसी देवेन्द्र प्रताप सिंह ने इस मामले में जो सवाल उठाए हैं, वे आम जनता की चुप्पी को तोड़ने वाले हैं। यदि मिल की संपत्ति लगभग 300 करोड़ रुपये की थी, तो क्या इसका मूल्यांकन किसी अधिकृत सरकारी एजेंसी से कराया गया था? यदि नहीं, तो इस ‘सस्ते सौदे’ के पीछे की मंशा क्या थी? मशीनरी, उपकरण और यहां तक कि मिल के भवनों की ईंटें तक जिस तरह से बेची या हटाई जा रही हैं, वह नीलामी प्रक्रिया की सत्यनिष्ठा को कठघरे में खड़ा करती है।

किसानों-मजदूरों का हक कब मिलेगा?

सबसे हृदयविदारक पहलू यह है कि मिल के हजारों किसान, मजदूर और कर्मचारी आज भी अपने बकाया भुगतान के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। 360 दिनों से अधिक समय से धरना दे रहे ये लोग केवल अपना मेहनत का पैसा मांग रहे हैं। यदि नीलामी से 41 करोड़ रुपये प्राप्त हुए, तो उस धन से सबसे पहले इनका भुगतान क्यों नहीं किया गया? क्या इन गरीबों की आजीविका से बड़ा ‘भ्रष्टाचार का तंत्र’ है?

अब आर-पार की लड़ाई

प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका पर उठते सवाल और ‘बजाज हिंदुस्तान शुगर’ के साथ जुड़ाव, एक बड़ी जांच की मांग करते हैं। यह केवल एक चीनी मिल के बिकने का मामला नहीं है, बल्कि जनपद के आर्थिक हितों के साथ खिलवाड़ है। एमएलसी ने 7 दिनों के भीतर साक्ष्यों सहित जवाब मांगा है। यदि समय रहते जवाब नहीं मिला, तो यह मुद्दा सदन से लेकर सड़क तक सरकार की कार्यप्रणाली को झकझोरने का काम करेगा।

बस्ती की जनता अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। विकास के नाम पर सरकारी संपत्तियों की बंदरबांट का यह खेल बंद होना चाहिए। जांच निष्पक्ष हो, दोषियों पर कार्रवाई हो और सबसे महत्वपूर्ण—किसान-मजदूरों के हक का पाई-पाई उन्हें वापस मिले। वरना, इतिहास इस नीलामी को विकास नहीं, बल्कि एक ‘ऐतिहासिक लूट’ के रूप में याद रखेगा।देवेन्द्र प्रताप सिंह का कहना है कि यह मुद्दा हजारों किसानों, मजदूरों और जिले के आर्थिक हित से जुड़ा हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि 7 दिनों के भीतर तथ्यों के साथ जवाब नहीं मिलता है, तो वे इस मामले को विधान परिषद में जोर-शोर से उठाएंगे।

Show More
Back to top button
error: Content is protected !!